मांद में मात
| Rainbow News - Jan 17 2019 2:56PM

-जावेद अनीस/ 16 मई 2014 के बाद 11 दिसबंर 2018 की तारीख देश की राजनीति में एक ऐसा पड़ाव है जिसे लम्बे समय तक याद रखा जायेगा. ऐसा माना जा रहा था कि इस बार पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद देश के राजनीति की दिशा बदलने वाले साबित होंगें और अब ठीक ऐसा होता दिखाई भी पड़ रहा है. 2014 के लोकसभा चुनावों में उठे मोदी लहर के बाद भाजपा को उसकी उम्मीदों से बढ़ कर अकेले ही 280 से अधिक सीटें मिलीं थीं और इसके बाद भाजपा हर चुनाव 2019 के तैयारी की तरह लड़ती रही है और कई नये राज्यों में लगातार अपना विस्तार करती गयी. इन सब से विपक्ष के खेमे में सन्नाटा पसरा था और वह पूरी तरह से पस्त था. लेकिन अब  कहानी बिलकुल ही अलग है. एक के बाद एक नया किला फतह करने के बाद आखिरकार भाजपा का बेलगाम विजय रथ अपने ही गढ़ में आकर थम गया है. तीन राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा सीधे तौर पर आपने-सामने थीं.

भाजपा के सामने चुनौती इन तीन राज्यों में अपनी सरकारों को बचाने की थी. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने इन तीनों राज्यों की कुल 65 लोकसभा सीटों में से 62 सीटों पर चुनाव जीता था. कांग्रेस के लिये तो यह एक तरह से अस्तित्व से जुड़ा हुआ चुनाव था इसलिये कांग्रेस और भाजपा दोनों के लिये यह राज्य बहुत अहमियत वाले थे. 2019 के फाइनल से ठीक पहले सेमी-फाइनल माने जा रहे पांच राज्यों के चुनावी नतीजों के हार-जीत के अलावा और भी कई राजनीतिक मायने हैं. पिछले करीब साढ़े चार साल में ये पहली बार है जब विलुप्त मानी जा रही कांग्रेस पार्टी ने सीधे मुकाबले में भाजपा को मात दिया है. यह मोदी-शाह के “कांग्रेस मुक्त भारत” के उस नारे पर भी अघात है जो सिर्फ एक पार्टी के लिये नहीं बल्कि उस विचारधारा के लिये भी थी जिसकी जड़ें भारत के बहुलतावादी परंपरा और स्वाधीनता संग्राम से उपजे मूल्यों में है. 

चुनाव परिणामों ने इस मिथ को तोड़ दिया है कि मोदी को हराया नहीं जा सकता है और राहुल गांधी हमेशा ही एक विफल नेता बने रहेंगें. इस जीत के बाद राहुल गांधी को एक नेता के तौर पर स्थापित कर दिया है. उन्होंने मृतशैया पर पड़ी कांग्रेस में जान फूंकने का काम किया है और सबसे बड़ी बात ये है कि उन्होंने कभी चुनौतीविहीन माने जा रहे नरेंद्र मोदी के मुकाबले खुद को खड़ा कर दिया है. राहुल ने ये साबित करके दिखा दिया है कि अगर नरेंद्र मोदी को चुनौती पेश की जाये तो मुकाबले में उन्हें हराया भी जा सकता है.अब 2019 में नरेंद्र मोदी हार सकते हैं जैसी बात असंभव या अजूबा नहीं लगती है. बहरहाल 2019 का चुनाव दिलचस्प हो गया है. अब यह एकतरफा नहीं होने वाला और ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है. इन तीनों राज्यों में मध्यप्रदेश की जीत कांग्रेस के लिये बहुत खास है. यह भाजपा का सबसे मजबूत किला माना जाता था और यहां शिवराजसिंह चौहान जैसे मजबूत व लोकप्रिय मुख्यमंत्री थे. गुजरात के बाद मध्यप्रदेश को भाजपा व संघ की दूसरी प्रयोगशाला कहा जाता है, दरअसल यहां जनसंघ के जमाने से ही उनका अच्छा-खासा प्रभाव है.

भाजपा इसे विकास के एक माडल के तौर पर प्रस्तुत करती रही है इसलिये मध्यप्रदेश के नतीजे का विशेष महत्त्व है. इससे वहां लगातार हार की हैट्रिक बना चुकी कांग्रेस को भाजपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने में मदद मिली है. मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने बहुत ही थोड़े समय में अपना कायाकल्प करने का चमत्कार किया है  और इसका श्रेय निश्चित रूप से राहुल गांधी को दिया जायेगा जिन्होंने कमलनाथ, सिंधिया और दिग्विजय सिंह की जिम्मेदारी तय करते हुये इन्हें एक साथ काम करने को प्रेरित किया. एक मई 2018 को कमलनाथ को मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गयी थी जिन्होंने सबसे पहले म.प्र. में पंद्रह साल से सुस्त पड़ चुके संगठन को सक्रिय करने पर जोर लगाया जिससे पार्टी बूथ स्तर तक खड़ी दिखाई पड़ने लगी. इसी तरह से सिंधिया को चुनाव प्रचार अभियान और दिग्विजय सिंह को परदे के पीछे रहकर कार्यकर्ताओं को एकजुट व सक्रिय करने की जिम्मेदारी दी गयी थी जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम दिया. लेकिन मध्यप्रदेश में असली कमान राहुल गांधी के हाथों में रही जो कमलनाथ और सिंधिया को साथ में रखते हुये खुद फ्रंट पर दिखाई दिये.

राहुल के बरक्स नरेंद्र मोदी मध्यप्रदेश के चुनाव अभियान से सेफ दूरी बना कर चलते नजर आये. जहां एक तरफ राहुल गांधी ने मध्यप्रदेश को सबसे ज्यादा समय दिया, वहीँ नरेंद्र मोदी प्रदेश के चुनाव में खुद को सीमित किये रहे. राज्य में भाजपा के चुनाव प्रचार अभियान में भी केंद्र की उपलब्धियों पर ना के बराबर फोकस किया गया, ऐसा शायद इसलिये किया गया कि अगर इन राज्यों में भाजपा की हार होती है तो इसके जिम्मेदारी मौजूदा मुख्यमंत्रियों पर टाली जा सके और 2019 लोकसभा चुनाव के लिये मोदी ब्रांड को बचाये रखा जा सके. लेकिन इन तमाम तजवीजों के बावजूद ऐसा लगता नहीं है कि मोदी ब्रांड बचा है अब कोई भी मोदी लहर और अच्छे दिनों की बात नहीं करता है, उम्मीदों की जगह उपहास ने ले लिया है और बड़े से बड़े मोदी समर्थक अपने विकास के देवता का बचाव करने में असमर्थ है. उनमें से कईयों ने तो पाला ही बदल लिया है लॉर्ड मेघनाद देसाई जैसे बड़े मोदी समर्थक आज नरेंद्र मोदी को लेकर निराशा जताते हुये कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री “मोदी टीम लीडर नहीं हैं और अब लोग उन्हें दोबारा वोट नहीं देंगे.

2014 में नरेंद्र मोदी की आसमानी जीत ने सभी को अचंभित कर दिया था. यह कोई मामूली जीत नहीं थी. ऐसी मिसालें भारतीय राजनीति के इतिहास में बहुत कम मिलती हैं. इसके बाद अगले तीन सालों तक भाजपा ने अपना अभूतपूर्व विस्तार किया, कई नये राज्यों में उनकी सरकारें बनी. लोकसभा चुनाव के बाद उतरप्रदेश में भाजपा की प्रचंड जीत ने एक बार फिर पूरे विपक्ष को स्तब्ध कर दिया था और फिर 2019 में विपक्ष की तरफ से सबसे बड़ा चेहरा माने जाने वाले नीतीश कुमार की एनडीए वापसी ने विरोधियों की रही सही उम्मीदों पर पानी फेर दिया था. लेकिन जीवन की तरह अनिश्चिताओं से भरे राजनीति के इस खेल में आज हालात बदले हुए नजर आ रहे हैं. अमित शाह और नरेंद्र मोदी का अश्वमेघ रथ अपने ही गढ़ में रुक गया है. आज स्थिति ये है कि अच्छे दिनों के सपने जमीनी सच्चाईयों का मुकाबला नहीं कर पा रहे है. पहली बार प्रधानमंत्री बैकफुट पर हैं और उनके सिपहसालार घिरे हुए नजर आ रहे हैं.

पहले मोदी की आंधी के सामने विपक्ष टिक नहीं पा रहा था लेकिन आज हालत नाटकीय रूप से बदले हुए नजर आ रहे हैं. सत्ता गंवाने के बाद पहली बार कांग्रेस खुद को एक मजबूत विपक्ष के रूप में पेश करने में कामयाब रही है और वो अब धीरे-धीरे एजेंडा सेट करने की स्थिति में आने लगी है. दरअसल अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर मोदी सरकार की विफलता और उस पर रोमांचकारी प्रयोगों ने विपक्ष को संभालने का मौका दे दिया है. भारत की चमकदार इकॉनामी आज पूरी तरह से लड़खड़ाई हुई है. बेहद खराब तरीके से लागू किए गए नोटबंदी और जीएसटी ने इसकी कमर तोड़ दी है, बेरोजगारी बढ़ रही है और कारोबारी तबका हतप्रभ है. ऐसा महसूस होता है कि आर्थिक मोर्च पर यह सरकार स्थितियों को नियंत्रित करने में सक्षम ही नहीं है. तीनों राज्यों में शिवराजसिंह चौहान, रमनसिंह या वसुंधरा राजे की हार से ज्यादा मोदी के हार की चर्चा है इसे इन तीनों से ज्यादा मोद-शाह के अहंकार की हार बताया जा रहा है.



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