आंदोलन की सफलता हेतु आवश्यक है प्रत्यक्ष और वास्तविक लक्ष्य की एकरूपता
| Ravindra Arjariya - May 14 2017 12:08PM

सहज संवाद

-रवीन्द्र अरजरिया/ क्षेत्रीय विकास के दावे करने वाली सरकारों की वर्तमान सोच को लेकर मन में विचारों का महाभारत अचानक होने लगा। खासकर बुंदेलखण्ड की दुहाई देने वाली सरकारों ने दो राज्यों में विभक्त इस क्षेत्र को उत्तर प्रदेश में झांसी और मध्य प्रदेश में सागर तक ही सीमित कर दिया है। पूर्व सरकारों ने सागर और झांसी के विकास को ही समग्र बुंदेलखण्ड की प्रगति के रूप में परिभाषित करके स्वयं अपनी पीठ ठोक ली और लगाने लगी ठहाके। केन्द्र की कांग्रेस सरकार द्वारा दिये गये विशेष पैकेज को दौनों प्रदेशों की तत्कालीन सरकारों ने अपने खास सिपाहसालारों को बांटकर जिस तरह से धनराशि का कागजी आंकडा तैयार किया है उससे समाज के आखिरी छोर पर बैठे व्यक्ति का पेट कल भी खाली था और आज भी खाली है। विकेन्द्रीकरण के स्थान पर सुविधाओं का केन्द्रीकरण हो जाने से शोषण की नई परिभाषायें लिखी जाने लगीं। विश्वविद्यालय से लेकर मेडिकल कालेज तक की सौगातों को विकसित शहरों की झोली में डालने वाले स्वार्थ की बुनियाद पर खडे हो रहे शीशमहल की कल्पना में ही मगन हैं। ग्वालियर, दतिया और झांसी की कम दूरी वाले वाले इलाके में तीन मेडिकल कालेज, दर्जनों उद्योग और रोजगार की भारी संभावनायें पैदा कर दी गईं हैं। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश के महोबा और मध्य प्रदेश के छतरपुर वाला क्षेत्र स्वाधीनता के बाद बनाये गये विन्ध्य प्रदेश के विलय के बाद से अपने श्रंगार की बाट जोह रहा है। चिन्तन चल ही रहा था कि टेलीफोन की घंटी ने व्यवधान उत्पन्न कर दिया।

फोन पर स्वागत कक्ष ने बताया कि बुंदेली समाज के तारा पाटकर मिलना चाहते हैं। हमारे सामने उनका दस वर्ष पुराना चेहरा सामने आ गया जब वे कलम की नोक से समाज में व्याप्त समस्या रूपी बीमारियों का इलाज करने की कोशिश करते थे। हमने उन्हें गेस्ट केबिन में बैठाने के लिए कहा। अब हम स्वागत कक्ष में बने गेस्ट केबिन में आमने-सामने थे। चपरासी के पहले पानी फिर काफी लाने के लिए कहा। कुशलक्षेम जानने-बताने की औपचारिकतायें पूरी करने के बाद हमने तारा जी से उनके एम्स आन्दोलन के बारे में पूछा। एक गहरी सांस लेकर उन्होंने कहा कि शासन-प्रशासन सत्य को दबाने की नहीं बल्कि कुचलने की कोशिश में लगा हुआ है। उत्तर प्रदेश के झांसी, उरई, बांदा और मध्य प्रदेश के ग्वालियर, दतिया, सागर, टीकमगढ जैसे स्थानों पर मेडीकल कालेज हैं तब बुंदेलखण्ड के वक्षस्थल पर एक एम्स की स्थापना अति आवश्यक है। महोबा, पन्ना, टीकमगढ जैसे जिलों के मरीजों का एकमात्र सहारा छतरपुर का जिला चिकित्सालय ही है, जहां के सीमित साधन ही गरीबों की सांसों को गतिमान किये हुई है ऐसे में सुविधाओं के अभावों में आकस्मिक मौतों का आंकडा भी निरंतर ऊपर ही जा रहा है। हमने उन्हें टोकते हुआ कहा कि छतरपुर में मेडिकल कालेज मांग उठी थी जो समय के साथ दबती चली गई। उन्होंने तत्काल कहा कि मांग करने वालों को अपने वास्तविक लक्ष्य पर कायम रहना चाहिये। प्रत्यक्ष लक्ष्य और वास्तविक लक्ष्य में अंतर होने पर ही आम आवाम का आंदोलनों के साथ जुडाव कम हो पाता है। इसमें चन्द लोग किन्हीं खास कारणों से झंडा ऊंचा करते हैं और प्रत्यक्ष लक्ष्य से हटकर वास्तविक लक्ष्य की पूर्ति होते ही झंडे में से डंडा निकाल लेते हैं।

हमने उन्हें बीच में ही रोकते हुए कहा कि आपका आंदोलन किस दिशा में चल रहा है और कब तक डंडे में झंडा लगा रहेगा। उनके चेहरे पर आत्म विश्वास भरी चमक उभर आई। उन्होंने कहा कि आप हमारे बडे भाई ही नहीं बल्कि मार्गदर्शक भी हैं। जब कलम से युद्ध करता था तब आपके आदर्श ही हमारा सम्बल थे जो आज तक जीवित है। कलम की नोक और स्याही से निकलने वाली आग से जब विकास की गंगा अवतरित नहीं हुई तो हमने धरती पर खडे होकर समाज के अंतिम छोर पर तडफ रहे व्यक्ति की आवाज बनने की कोशिश की। बुंदेली समाज गठन किया। लोगों का विश्वास हमारे साथ जुडा और बस चल पडे पथरीले ही नहीं बल्कि कटीले रास्ते पर मंजिल तक पहुंचने के लिए। विगत 15 अप्रैल 2015 के रोटी बैंक की स्थापना करके गरीब, लाचार और मजबूर लोगों तक भोजन पहुंचाने की पहल की थी, जो निरंतर चल रही है। महोबा में एम्स की स्थापना के लिए बहुचरणीय आंदोलन का बिगुल मार्च 2015 फूंका। ज्ञापन, पोस्टकार्ड प्रेषण, मौन प्रदर्शन, जन जागरूकता अभियान की सफलता के बाद 7 अगस्त 2016 से भूख हडताल शुरू की जो 23 अप्रैल 2017 को प्रशासन के आश्वसन के बाद समाप्त हुई। हमारी कथनी, करनी और चिन्तन में एकरूपता है जिसकी प्रमाणिकता के आधार पर ही जनसमर्थन प्राप्त हो रहा है। रही बात डंडे में लगे झंडे को निकालने की तो लक्ष्य पूरा होने तक तो यूं ही लगा रहेगा और उसके बाद सफलता के भाल पर कुंदन बनकर चमकेगा। तभी चपरासी ने काफी ट्रे लेकर केबिन में प्रवेश किया। बातचीत का सिलसिला रुक गया। हमें विचारों को शांत करने का साधन मिल गया था। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।

 



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