क्या वर्तमान में लिखा जा रहा साहित्य समदर्शी है?
| Dr. Arpan Jain 'Avichal' - Feb 2 2019 4:47PM

-डॉ. अर्पण जैन 'अविचल'/ खोज और शोध के बीच झुलती विचारक्रांति आज इस बात पर जा अटकी है कि क्या जो वर्तमान में लिखा जा रहा है वह धैर्यशील या कहें समाज के सभी वर्गों पर समान अनुपात में दृष्टि डालने वाला, सभी में वैचारिक खुराक का बीज बोने वाला समदर्शी साहित्य है? सवालों के घेरे में आती जा रही रचनाधर्मिता इस बात से आहत हो या न हो परन्तु वैचारिक महासमर और पाठक समुदाय जरूर इस बात से कही कुंठित नज़र आ रहा है कि उसे पोषित और समदर्शी उन्नत लेखन पढ़ने के लिए कम मिल रहा हैं।

पाठक को प्राप्त होने वाली कविताएँ, किस्से-कहानीयाँ, गज़ल, कथाएँ और आलेख यदि चिन्तन के तराजू से तौले जाएँ तो यक़ीनन कमतर नज़र आएंगे क्योंकि वह सृजन परिवर्तन और समाज को दृष्टि देने में कमजोर ही साबित हो रहे है। लेखन का उद्देश्य केवल प्रकाशन या सम्मान तक सीमित होगा तो यह समस्या पैदा होना स्वाभाविक है। इसके बजाए लेखन का उद्देश्य समाज को दृष्टि प्रदान करना, चिंतन का बिरवा रोपना होगा तो निश्चित तौर पर वह लेखन सार्थक भी होगा और कालजयी भी। हिन्दी के लेखकों की लाजमी समस्या है कि किताबें बिकती नहीं, तो पाठक भी यही कहता है कि वैचारिक क्रांति या समाधान प्रदान करने वाली किताबें लिखी भी कहा जा रही है।

वर्तमान दौर में लिखे जाने वाले काव्य संग्रह, कहानी संग्रह, गज़ल, सज़ल, लघुकथाओं से समाधान गौण है और उसके बाद भी वह इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध है पढ़ने के लिए तो फिर क्यों कर एक पाठक उन्ही सामग्री को पढ़ने के लिए खर्च करें? यदि सवाल के जवाब की खोज हर लेखक करने लग जाए को बेहतरीन सृजन पाठक तक पहुँचेगा और विश्वास रखें कि पाठक भी उसे खरीदना ही चाहेगा। आज का पाठक व्यामोह से ग्रसित है इसमें कोई संशय नहीं है पर ये भी कटु सत्य है कि वो पाठक तब ही लेखक को बड़ा मान लेता है जब उस लेखक का सृजन पाठक के मानस पर छाप छोड़ जाता है लेखक के पास मनोभावों को लिखने के अतिरिक्त भी सामाजिक दायरा होता है, नवाचार होता है, नए विषय, नया दृष्टिकोण होता है पर उस पर लिखना भी होता है। नया लिखेंगे, उपयुक्त माध्यम से प्रचारित-प्रसारित होगा तब ही वो बिकेगा अन्यथा ढाक के तीन पात।

बहरहाल हिन्दी को पेट की भाषा बनाने का उत्तरदायित्व साहित्य समाज पर तो है ही इसके लिए साहित्य जगत को चिंतन की दौर से पुन: एक बार वैसे ही गुजरना चाहिए जैसे बाज समय आने पर एकांत में जाकर अपनी चोंच स्वयं तोड़ कर नई चोंच का इंतजार करता है उसके बाद शुरु करता है आगे का सफर। हर दौर में परिवर्तन आवश्यक है, और परिवर्तन ही संसार का नियम भी है। अच्छा लेखन वहीं है जो पाठक की मानसीक खुराक और मूलसमस्या का समाधान बनें, जब वो लिखा जाने लगेगा तो तय है कि वो खूब सराहा भी जाएगा और बिकेगा भी। रूसी कथाकार और नाटककार एंटोन चेखव लिखते है कि 'लेखक को वही लिखना चाहिए जो उसने देखा और भोगा है, पूरी सच्चाई और ईमानदारी के साथ। मुझसे अक्सर पूछा जाता है कि किसी कहानी के पीछे मेरा अभिप्राय क्या था।

ऐसे प्रश्नों के उत्तर मैं कभी नहीं देता। मेरा काम है लिखना,मैं जिस विषय पर कहो लिख सकता हूँ। जीवन का अनुभव विचार को जन्म दे सकता है लेकिन विचार अनुभव को जन्म नहीं दे सकता।'' वर्तमान दौर के लेखक अनुभव न लेते हुए केवल स्वांतय सुखाय हेतु लिखते है, पढ़ना उनकी आदत कम दिखावा ज्यादा हो गया है, और कड़वा सच तो ये भी है कि जब आपने पढ़ा ही नहीं उस विषय पर तो आप उसके आगे तो लिखने की बात भी नहीं कर सकते। क्योंकि मानव के दिमाग का स्वभाव होता है कि जितना वो पढ़ता है उसका 50% से कम ही दिमाग में याद रख पाता है,और लिखते वक्त तो 20% तक ही लिख पाता है, ऐसे हाल में जब पढ़ना शुन्य होगा तो लेखन में नवाचार असंभव है।

लेखकों को अन्य रचनाकारों को पढ़ना चाहिए ये आदत भी गौण हो गई है। एक अखबार में 10 रचनाएँ 10 लोगों की प्रकाशित हुई उसमें शामिल रचनाकार अपने अतिरिक्त अन्य की रचना पढ़ने में भी समय नहीं खपाना चाहता है। जब हालात ऐसे है तो कोई आपको क्यों पढ़ेगा और फिर आप या अन्य भी क्या बेहतर लिखोंगे ये विचारणीय है।लेखक बनने से पहले किरदार को जीना होगा, समाज को चिंतन देना होगा, व्यवस्था पर सोचना होगा तब जाकर लेखन पाठकों के मानस पर छपेगा और बाज़ार तक पहुँचेगा अन्यथा गुंजाईश नहीं कि वो साहित्य गौरव बन पाएं।



Browse By Tags



Other News