डेढ़ मिनट में डेढ़ दर्जन कट्स.....प्रोपेगंडा वीडियो शेयर करने से बचें : परमेन्द्र मोहन
| Rainbow News - Mar 2 2019 5:13PM

परमेन्द्र मोहन (वरिष्ठ पत्रकार)

सुबह से शुरू हुआ इंतजार रात सवा नौ बजे जाकर खत्म हुआ, जब विंग कमांडर अभिनंदन का हिंदुस्तान ने दीदार किया। इसके ठीक पहले अभिनंदन का एक वीडियो पाकिस्तानी मीडिया में चलाया गया, डेढ़ मिनट में डेढ़ दर्जन कट्स लगे थे, ये कट्स वो होते हैं, जिन्हें वीडियो एडिटिंग के दौरान जो दिखाना होता है, उस हिस्से को रखने और जो नहीं दिखाना होता है, उसे हटाने के लिए लगाया जाता है। जिन्हें हम कट्स कहते हैं, उनमें जर्क्स होते हैं, जिससे पता चलता है कि कहां-कहां एडिट किया गया है, फिल्मों या टीवी में वीडियो एडिटर्स अपनी कुशलता से इन्हें दिखने नहीं देते, लेकिन इसमें वक्त लगता है।

जाहिर है, अभिनंदन का वीडियो जल्दी में बनाया औऱ दिखाया गया, जिससे उन्हें भारत की मिट्टी पर कदम रखने में देरी भी हुई। इस वीडियो में अभिनंदन से ये कहलाया गया कि पाकिस्तानी फौज बहुत दोस्ताना है, पाकिस्तानियों से उनकी जान बचाई, उनके साथ सैन्य सम्मान से पेश आए। ये भी कहलाया कि भारतीय मीडिया बातों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाता है। सीधा मतलब ये कि पाकिस्तान को सीधे तौर पर लगता है कि भारत में अगर पाकिस्तान के खिलाफ माहौल है तो वो भारतीय मीडिया की वजह से है। बिल्कुल सही बात है, भारतीय मीडिया पाकिस्तान के हिंदुस्तान में आतंकवाद के खिलाफ भारतीय जनता को एकजुट करता रहा है औऱ करता रहेगा। हम पाकिस्तान के मंसूबों की मुखालफत करते हैं और करते रहेंगे, तब तक करेंगे जब तक वो हमारे देश में आतंकवाद से तौबा नहीं कर लेता।

हमारे खुद के देश में इन दिनों कुछ लोग ज्ञान बघार रहे हैं कि आतंकवाद है, शहादतें हुई हैं, फिर भी युद्ध कोई रास्ता नहीं है, कोई दूसरा विकल्प तलाशना चाहिए। ये लोग उस तथाकथित दूसरे रास्ते या विकल्प के बारे में कोई ज्ञान नहीं देते और इसलिए नहीं देते कि ये दूसरा कुछ है ही नहीं। ये कोई मुरलीधरन की गेंदबाज़ी नहीं है जनाब, दूसरा रास्ता कूटनीतिक मोर्चाबंदी की है, जो वक्त लेता है और ये वक्त सब्र की सीमा के पार पहुंच चुका है। 1987 में श्रीनगर में हलवाई की दुकान पर पहली बार पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद ने बम धमाका कराया था, उस वक्त भी पाकिस्तान ने सबूत देने पर जांच की बात कही थी। उसके बाद से श्रीनगर विधानसभा, संसद, अक्षरधाम, संकटमोचन, कनाट प्लेस-पहाड़गंज-सरोजनी नगर, मुंबई, पठानकोट और अब पुलवामा जैसे दर्जनों बड़े आतंकवादी हमले हुए, करगिल भी हुआ, सबके सबूत दिए गए, हर बार जांच की बात पाकिस्तान ने की और भारत कूटनीतिक रूप से रिश्ते तोड़ता-बनाता, पाकिस्तान को अलग-थलग करता रहा।

मनमोहन ने आतंकवाद खत्म होने तक बातचीत रोकी, वाजपेयी खुद बस में गए, मोदी ने तो अपने शपथ में भी बुलाया और घर जाकर शॉल तक भेंट की नतीजा क्या निकला-शून्य बटा सन्नाटा। हमारी सरकारों ने एक वक्त कश्मीर में अमन बहाली कर भी ली थी, वादियों में फिर से केसर-गुलदार की खुशबू आने लगी थी, लेकिन पाकिस्तानी आतंकवाद ने यहां के अलगाववादियों को साथ लेकर फिजाओं में बारूदी दुर्गंध फिर से भर दी। भारतीय सेना, अर्धसैनिक बलों, राज्य पुलिस बल में भर्ती के लिए लाइन लगाकर खड़े रहने वाले कश्मीरी युवाओं को पाकिस्तानपरस्तों ने एके 47 थमा दिया, पत्थर थमा दिए, भारतीय मीडिया ने अगर एक-एक करके इनको बेनकाब किया है तो क्या ये नहीं करना चाहिए था? मीडिया को अपना काम करने दें, देश से बढ़कर कुछ नहीं है, जिन्हें शांति चाहिए, वो या तो दूसरा विकल्प सुझाएं या फिर ये मान कर चलें कि पाकिस्तान को या तो अपना वजूद बचाना है या फिर आतंक मिटाना है, अंतिम विकल्प यही है।



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