प्राकृतिक हालात चुनावी मुद्दा क्यों नहीं?
| -Rituparna Dave - Mar 30 2019 1:13PM

               काश इस चुनाव पर्यावरण और प्रदूषण भी अहम चुनावी मुद्दा हो पाता तो भविष्य की चिन्ता करने की ईमानदार पहल जरूर कहलाती। लगता है कि चुनावी चकल्लस और नेताओं के लुभावने वादों के बीच न तो कोई धरती की चिन्ता करने वाला है और न कोई भूगर्भ और आसमान को लेकर ही गंभीर दिख रहा है। शायद इनका चुनावों से सीधा वास्ता जो नहीं है। यही बड़ी भूल पूरी मानवता के लिए यक्ष प्रश्न है जिसे वैज्ञानिकों तक सीमित कर कर्तव्यों की इतिश्री ली गई है। राजनीतिक दल, उनके आकाओं, जनप्रतिनिधियों तथा नुमाइन्दगी का ख्वाब देखने वालों को तेजी से बदल रही प्रकृति और उसके कारणों के बारे में कितना पता है यह भी चुनावी एजेण्डा होना चाहिए। सच तो यह है कि राजनीति की बिसात में हर बार वही प्रकृति गच्चा खा जाती है जिसके चलते ही हर किसी का वजूद है। ऐसे में सवाल लाजिमी है और उठना भी चाहिए कि पर्यावरण-प्रदूषण की चिन्ता राजनीति से ऊपर है जिसको लेकर सभी राजनैतिक दलों ने खामोशी ओढ़ी हुई है।

                क्या बाढ़, धरती की तपन, घटते जंगल, रेत से चलते छलनी होती नदियाँ, गिट्टियों में तब्दील होते पहाड़, अंधाधुंध प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हमारी भविष्य की पीढ़ी के लिए बड़ा अभिशाप नहीं है? उससे भी दुखद यह है कि सबको पता है लेकिन कोई इस पर गंभीर नहीं है। शायद यही कारण है कि देश के किसी भी राजनैतिक दल के अहम मुद्दों में ऐसे विषय शामिल ही नहीं है। प्रदूषित होती नदियां जितनी चिन्ता का विषय हैं उससे बड़ी चिन्ता मानव निर्मित वो कारण हैं जो इनका मूल हैं। भारत में अब ‘जल क्रान्ति’ की जरूरत है। लोग स्वस्फूर्त इस पर सोचें, जागरूक हों और कुछ करें तभी सकारात्मक नतीजे निकलेंगे वरना आयोग, बोर्ड, ट्रिब्यूनल बनते रहेंगे। बहस, सुनवाई, फैसले होंगे, महज औपचारिकताओं की पूर्ति होगी और हर गांव, कस्बे, शहर, महानगर की आबादी की गंदगी का आसान और निःशुल्क वाहक बनीं नदियां दिन-प्रतिदिन प्रदूषित होंगी, सूखेंगी और मरती रहेंगी।

               30 बरसों से जारी गंगा की सफाई चर्चाओं में है। सुप्रीम कोर्ट भी तल्ख टिप्पणी कर चुका है कि मौजूदा कार्ययोजनाओं से क्या गंगा 200 साल में भी साफ हो पाएगी ? कदम वो हो जिससे गंगा अपनी पुरानी भव्यता यानी प्रिस्टीन ग्लोरी हासिल कर सके। यह दशा उस गंगा की है जो मोक्ष दायिनी है, खुद अपने मोक्ष को तरस रही है। नर्मदा और भी श्रेष्ठ मानी गयी है। पद्म पुराण में लिखा है ‘पुण्या कनखले गंगा, कुरुक्षेत्रे सरस्वती। ग्रामे वा यदि वारण्ये, पुण्या सर्वत्र नर्मदा ।।' अर्थात गंगां को कनखल तीर्थ में विशेष पुण्यदायी माना जाता है, सरस्वती को कुरुक्षेत्र में, किन्तु नर्मदा चाहे कोई ग्राम हो या फिर जंगल सर्वत्र ही विशेष पुण्य देने वाली है। ऐसी पवित्र नर्मदा अपने उद्गम अमरकण्टक कुण्ड से ही प्रदूषित होने लगती है। ऐसे ही 27  राज्यों में 150 नदियां प्रदूषित हैं इसकी किसे चिन्ता है?

              दो साल पहले ही देश में धान का कटोरा कहा जाने वाला छत्तीसगढ़ उसमें भी खास पहचान लिया बिलासपुर। 23 मई 2017 को बेहद तेजी से, एकाएक 50 डिग्री सेल्सियस को छूते तापमान से चर्चाओं में आ गया। वायुमण्डल में घुली कार्बन डाई ऑक्साइड पराबैंगनी विकरण के सोखने और छोड़ने से हवा, धरती और पानी गर्म होते हैं। पिछली आधी सदी में कोयला-पेट्रोलियम के धुंएं ने वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और दूसरी ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा खतरनाक हदों तक पहुंचा दिया। सामान्यतः, सूर्य की किरणों से आने वाली ऊष्मा का एक हिस्सा वायुमण्डल को जरूरी ऊर्जा देकर, अतिरिक्त विकिरण धरती की सतह से टकराकर वापस अन्तरिक्ष को लौटता है। लेकिन यहां मौजूद ग्रीनहाउस गैसें, लौटने वाली अतिरिक्त ऊष्मा को भी सोख लेती हैं जिससे धरती की सतह का तापमान बढ़ जाता है।

             वर्षा जल संचय के लिए ठोस प्रबंधन और जनजागरूकता की कमीं से देश में पहले ही पेयजल की स्थिति विकारल है। नए हिमखण्डों के लिए उचित वातावरण नहीं हैं। जो हैं वो पर्यावरण असंतुलन से पिघल रहे हैं। पृथ्वी पर 150 लाख वर्ग कि.मी. में करीब 10 प्रतिशत हिमखंड बचे हैं। ठण्ड के साथ गैस चैम्बर बनते महानगर, झील से सड़कों तक फैलता केमिकल झाग, सूखे तालाब, लापता होते पोखर, समतल होते सूखे कुएँ उसके बावजूद अंधाधुंद प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भारत में बड़ी चिन्ता का विषय है। 

               बीमार धरती को सेहतमंद बनाने और स्वस्थ जीवन के लिए पहाड़, जंगल, नदी, तालाब, पोखरों को बनाने, बचाने, जिन्दा रखने के जतन करने होंगे वरना खुद के बनाए क्रंक्रीट के जंगल, कल-कारखानों, पॉवर प्लाण्ट की चिमनियों और धुंए के गुबार के बीच मानव निर्मित हिरोशिमा-नागासाकी से भी बड़ा सच चुपचाप, बिना आवाज कम से भारत में सभी के मुंह बाएं तैयार खड़ा है। दुनिया भर के विकसित और विकासशील देशों में इसको लेकर चिन्ताएं दिखती हैं लेकिन भारत में पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर कितनी ईमानदार कोशिशें की जा रही हैं यह खुली किताब है। काश इस चुनाव यह भी मुद्दा होता और भारत के माथे को ऊंचा करने का दावा करने वाले एक-एक राजनीतिक दल इसे समझ पाते! क्या यह चुनावी बहस का मुद्दा नहीं है और यह क्यों किसी राजनीतिक दल के घोषणा पत्र का कभी मुख्य एजेण्डा नहीं बन पाया और क्या अब बन पाएगा?



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