आस्था और उन्माद
| - RN. Network - Apr 1 2019 3:51PM

-सलीम रज़ा/ आस्था ने विचलित होकर उन्माद को अपने पास बुलाया और कहा तुमने अपने हठ में सौहार्द को नाराज़ किया है। तुम्हें पता है वो कितना डरा सहमा हुआ है। कितनी बिडम्बना है कि जब भी कोई उत्सव आता है सौहार्द सिर्फ तुम्हारे डर से छिपकर बैठ जाता है। आखिर तुम्हारा क्या बिगाड़ा है उसने? उन्माद ने अपने चेहरे पर कुटिल मुस्कान लाते हुये कहा, ‘‘तुम भी मानव के अन्दर बसती हो, मैं भी मानव के अन्दर बसता हूं लेकिन वक्त बदलता गया सोच बदल गई हमारा दायरा बढ़ता गया और तुम अपनी जगह पर रहीं, तुम सतयुग से लेकर त्रेता तक राज करती रहीं, लेकिन कलियुग में हमारी संख्या बढ़ी है’’।  इसलिए जीतता वही है,जिसका वर्चस्व होता है।

दोनों में बहस जारी रही इतने में ही इंसानियत ने प्रवेश किया। उन्माद उसे देखकर बोला, ‘‘तुम किसका साथ दोगी, आस्था का या मेरा’’ ?  इंसानियत बोली नादान, कठोर तुमने अपने घमंड में चूर होकर मुझे तार.तार करने की सोची तुम क्या समझते हो मैं तुम्हारे साथ रहूंगी। मैं आस्था के साथ हूं।  उन्माद ने उसे अपनी जलती हुई आंखों से देखा इंसानियत सहम गई। आस्था और उन्माद की बहस अन्त की तरफ न जाते हुये देख सूर्य ने हस्तक्षेप करते हुये उन्माद से कहा, ‘माना तुम कई धर्म सम्प्रदाय में बंटे हो। भले ही धर्म जाति वर्ग के आधार पर तुम्हारा वर्गीकरण किया गया हो लेकिन तुम ये भूल गये कि सर्व.धर्म सम्भाव से भी तुम्हारा नाता हो सकता है। मुझे देखों मैं निःस्वार्थ सभी को अपने प्रकाश से सुकून पहुचाता हूं। इसी भाव से लोग मेरे आने का इन्तजार करते हैं।

उन्माद पर सूर्य की इस दलील का भी कोई असर न हुआ अलगरज चन्द्रमा, वायु ,जल सबने उन्माद को हिकारत की नजरों से देखते हुये आस्था का साथ दिया। जब बहस ज्यादा बढ़ गई तो धरा ने उन्माद से कहा, ‘‘तुम कितने हठी हो कितने अहंकारी हो, कितने निर्दयी हो तुम अपने झूठे अहंकार मे संलिप्त हो भले ही तुम धर्म.सम्प्रदाय, जाति.वर्ग में बंटकर अहंकार के घमंड में चूर होकर प्रकृति के बनाये नियमों के विरूद्ध चलने का दुस्साहस कर रहे हो। मुझे देखो मैंने प्रकृति के आदेश की अवहेलना नहीं की। मैंने अपने सीने पर तुम सबको जगह देकर सर्वधर्म सम्भाव का संदेश दिया और प्रकृति के नियम से छेड़छाड़ न करने की हिदायत दी।

अब धरा आवेश में आकर बोली, ‘‘सुन नादां अगर आस्था न रही तो सूरज, चांद, सितारे,वायु, जल सब तेरा साथ छोड़ देंगे। क्योंकि तेरा आस्तित्व इन्हीं पर निर्भर है। अब उन्माद के तेवर ढ़ीले पड़े और बोला,‘‘मैं जानता हूं धरा,कि आस्था पर ही मानव जीवन निर्भर है। मैं यह भी जानता हूं कि प्रकृति के नियम के विरूद्ध जाना प्रलय का संकेत है लेकिन ये मेरे वश में नहीं है क्योंकि मेरी फितरत फिर भी मुझे बरगलाती रहेगी’’।



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