‘अंजाम-ए-सियासत’
| - Saleem Raza - Apr 9 2019 12:12PM

जंगल में सभी पशु पक्षी राजा की गुलामी प्रथा से तंग आकर विद्रोह पर उतर आये। अचानक आये इस परिवर्तन से जंगल का राजा शेर घबरा गया। आनन-फानन में उसने एक सभा बुलाई, जिसमें जंगल के सभी छोटे-बड़े पशु-पक्षी आमंत्रित किये गये। राजा ने सभा शुरू करते हुये सबसे उनके इस दुस्साहस का कारण जाना। सबने एक आवाज़ में कहा, ‘‘हम जंगल में स्वस्थ लोकतंत्र चाहते हैं, जिससे हम अपनी बात स्वतंत्र होकर कह सकें।’’ गहन विचार के बाद शेर ने सबको गुलामी प्रथा से आजाद कर दिया और लोकतंत्र स्थापित करने की इजाजत दे दी। लेकिन चुनाव अपने देखरेख में कराने का फैसला किया। सभी ने एक मत से अपनी सहमति दे दी।

जंगल पशु-पक्षियों के शोर से गुंजायमान हो गया। अब जंगल में चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गईं। पशु-पक्षियों के कबीले अपने-अपने कबीले से योग्य उम्मीद्वार उतारने की जुगत में लग गये। उल्लू ने भी अपने कबीले में जंगल के पहले लोकतंत्र चुनाव में उम्मीद्वारी के लिए अपनी जिज्ञासा प्रकट की। सब खामोश हो गये फिर कबीले के एक बुजुर्ग ने कहा, ‘‘भले ही हमारे अन्दर असमय बोलने का खौफ है, लेकिन सियासत के लिये बहुत सारी कलाओं में निपुण होना ज़रूरी है।’’ उल्लू भी हारना नहीं चाहता था। भागकर पहुंचा, मगरमच्छ के पास और उसकी कलाओं के बारे में जाना। मगरमच्छ बोला, ‘‘मेरी सबसे बड़ी कला अपने आंसू बहाकर सामने वाले को भावुक करके गुमराह रखने की है, जिसमें मैं पारंगत हूं।’’

अब उल्लू तोते के पास पहुंचा, उससे उसने उसकी कला के बारे में पूछा। तोते ने कहा, ‘‘मेरी वाकपटुता के आगे सब नतमस्तक हो जाते हैं।’’ उल्लू वहां से चलकर भंवरे के पास पहुंचा और उससे उसकी कला के बारे में जाना। भंवरा बोला, ‘‘गुलशन में खिलने वाली हर कली का सबसे पहले रसस्वादन करने में मैं निपुण हूं।’’ अब उल्लू लोमड़ी के पास पहंुचा और उससे उसकी खास कला के बारे में पूछा तो लोमड़ी बोली, ‘‘मौका देखकर शिकार करना और आंशिक खतरा देखते हुये अदृश्य हो जाने में मैं सिदहस्त हूं।’’ उल्लू आश्वस्त होकर अपने झुण्ड में आ गया और अपना नामांकन भरने की तैयारी करने लगा। नियत समय पर चुनाव की प्रक्रिया शुरू हुई और शेर की तरफ से चुनाव की तिथि घोषित कर दी गई।

सारे पशु-पक्षियों ने अपने-अपने मनपसन्द के उम्मीद्वारों को वोट दिये, लेकिन जंगल में सबसे बड़े समूह उल्लू ने वंशवाद के तहत अपने परिवार के उम्मीद्वार को एक तरफा मत देकर उल्लू को भारी मतों से विजयी बनाया। अब दल का नेता चुनने की बारी आई तो उल्लू ने भारी मतांतर का पक्ष रखकर अपना दावा पेश किया। दोबारा विद्रोह जैसे हालत उत्पन्न होते देखकर लोमड़ी शेर के पास पहुंची और उसके कान में कुछ कहा। शेर ने गम्भीर होकर उल्लू को दल का नेता बनाये जाने की औपचारिक घोषणा कर दी और इस तरह से उल्लू विधिवत दल का नेता बन गया। दुर्भाग्य है कि तब से सियासत इन पंजों में फंसी छटपटा रही है और हम आज भी असहाय से खड़े उस जर्जर हो चुकी सियासत का कोपभाजन बन रहे हैं।



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