तीखी मिर्च : चुनाव की चौकी के द्वार और "चौकीदार"
| -Raj Shekhar Bhatt - Apr 9 2019 12:19PM

वर्तमान में राजनीति को भेड़ चाल का चोला पहनाया जा रहा है। नेताजी ने बोल दिया कि ‘मैं चौकीदार हूं’, तो सब बन गये चौकीदार। सोशल मीडिया में सभी ने पोस्ट कर दिया ‘मैं भी चौकीदार’। अपने घरों को तो ढंग से देखा नहीं जाता, चले चौकीदार बनने। चुनाव जीतकर केवल अपनी विधानसभा को विकास दे नहीं सकते, चले हैं देश का चौकीदार बनने। अगर सभी नेता चौकीदार ही बनना चाहते हैं तो फौज में भर्ती हो जाओ। तब पता चलेगा कि चौकीदार क्या होता है और चौकीदारी करना क्या होता है। सिर्फ ‘मैं भी चौकीदार’ बोलने से और सोशल मीडिया में पोस्ट करने से बदलाव नहीं आयेगा।

इतने चौकीदार तब कहां थे, जब मुंबई सीरियल ब्लास्ट हुये थे। जब कोयम्बटूर में धमाके हुये। जब जम्मू कश्मीर विधानसभा में हमला हुआ। संसद पर हमला हुआ, अक्षरधाम मंदिर में हमला हुआ। इन दिनों चौकीदार छुट्टी पर थे क्या? दीवाली के खुशियों के पटाखों से पहले बम के धमाकों से रक्त की नदियां बहीं। 26ध्11 का आतंकी हमला और पठानकोट हमला हुआ। न जाने हमारे देश में कितनी बार रक्त की नदियां बहीं। रोते हुये देशवासी, लोगों की मौत और सैनिकों की शहादत पक्ष-विपक्ष में बहस का मुद्दा बनी है। लेकिन तब चौकीदारी का किसी को ख्याल नहीं।

चौकीदारों के सामने हमारे देश की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई गयी। देश का धन लूटकर भाग गये और चौकीदार आंखें खोलकर सोये रहे। न हत्यायें रूकीं है, न बलात्कार, न लड़ाई-झगड़े कम हुये, न चोरी-डकैती। गाय को अब भी काटा जा रहा है। धर्म-जाति के नाम पर लोग अब भी लड़ रहे हैं। सोशल मीडिया में लिख देने से चौकीदारी नहीं होगी। मीटू का हैसटैग पाॅप्यूलर हुआ तो सोशल मीडिया में सभी मीटू-मीटू में लग गये। अभी ‘नकलची बंदर’ होने की ताजा-तरीन टैगलाईन आई है।

सोशल मीडिया में नजर नहीं आया कि ‘मैं भी नकलची बंदर हूं’। राजशाही की ऐंठ में जब कोई मंत्री पद को खुद के लायक न समझता हो। वही, अगर फेसबुक में ‘मैं भी चौकीदार’ पोस्ट करने लगें, तो हास्यास्पद स्थिति तो बनती ही है। भेड़ चाल चलने से चौकीदार नहीं बदल जायेगा। चुनाव की चौकी का द्वार भी खुलेगा और उस द्वार के अंदर जनता भी होगी। बहरहाल, काशी हो या किच्ज्ञछा, सब है जनता की इच्ज्ञछा। चुनाव की चौकी के द्वार से कौन चौकीदार बनकर बाहर आता है।



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