देश का नेता कैसा हो?
| -Nirmal Rani - Apr 10 2019 12:34PM

        लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। तरह-तरह की तथाकथित 'विचारधाराएं' तथा भांति-भांति के वेश धारण किए हुए कथित राजनेता जनता जनार्दन के मध्य वोटों की भीख मांगने की खातिर निकल पड़े हैं। देश के मतदाताओं को बड़े ही नाटकीय ढंग से इन अभिनेता रूपी नेताओं द्वारा एक बार फिर यही समझाने की कोशिश की जा रही है कि जनकल्याण व जनसरोकार से संबंधित वादे तथा आश्वासन हैं क्या? बड़े आश्चर्य की बात है कि लगभग प्रत्येक आम चुनावों के दौरान देश के भाग्य विधाता अर्थात् मतदाता इन्हीं बहुरूपीए,स्वार्थी तथा केवल अपना राजनैतिक भविष्य उज्जवल बनाने की चाह में जीवन बिताने वाले नेताओं द्वारा निर्धारित चुनावी एजेंडे में ही उलझकर रह जाते हैं। हर बार चुनाव से पूर्व कुछ ऐसा वातावरण हमारे चारों ओर तैयार कर दिया जाता है कि राष्ट्र के विकास व जनसरोकार के ज़रूरी मुद्दों से हमारा ध्यान भटका दिया जाता है तथा विभिन्न प्रकार के गैरज़रूरी परंतु आकर्षक से दिखाई देने वाले मुद्दों में बड़ी ही चतुराई व खूबसूरती के साथ उलझा दिया जाता है।

             कभी राष्ट्रवाद की दुहाई देकर तो कभी देश के टृटने का भय दिखाकर, कभी मंदिर-मस्जिद विवाद का सहारा लेकर तो कभी गाय व गंगा जैसे अनेक भावनात्मक मुद्दों को सामने रखकर। कभी क्षेत्रवाद का वास्ता देकर तो कभी हमारी संस्कृति व भाषा के नाम पर। गोया राजसत्ता के समक्ष जनसरोकारों से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौती यानी गरीबी उन्मूलन, मंहगाई, शिक्षा, स्वास्थय, सड़क, बिजली-पानी जैसे सबसे प्राथमिक मुद्दों से हमारा ध्यान भटका दिया जाता है और हमारे सीधे-सादे मतदाता इन चतुर राजनीतिज्ञों की सुनियोजित साजि़श का शिकार होकर उन्हीं विघटनकारी एजेंडों को स्वीकार कर लेते हैं जो इन समाज विभाजक नेताओं द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। अगले कुछ दिनों में संपन्न होने वाले लोकसभा चुनाव एक बार फिर हमारे समक्ष बड़ी चुनौतियां पेश कर रहे हैं। विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा जो प्रत्याशी घोषित किए जा रहे हैं तथा दलों द्वारा जिन मुद्दों को सर्वोपरि रखकर चुनाव मैदान में ताल ठोकी जा रही है इन सभी बिंदुओं को बहुत गौर से देखे जाने की ज़रूरत है। $खासतौर पर जिन-जिन संसदीय क्षेत्रों में पूर्व में निर्वाचित सांसदों को पुन: प्रत्याशी बनाया गया है, मतदाताओं को स्वयं यह सोचने-समझने व परखने का अधिकार है कि उनका सांसद विगत पांच वर्षों तक किन गतिविधियों व कार्यकलापों में व्यस्त रहा। किसी संसदीय क्षेत्र के जागरूक मतदाता यह भलीभांति जानते हैं कि चुनाव लड़ने से पूर्व उसकी संपत्ति व आर्थिक हैसियत क्या थी और आज क्या है? वे यह भी बखूबी जानते हैं कि हमारे सांसद द्वारा क्षेत्र का कितना विकास किया गया है? उन्हें यह भी भलीभांति मालूम है कि उनके प्रतिनिधि ने राष्ट्र के विकास तथा देश की एकता व अखंडता के पक्ष में काम करते हुए अपने पांच वर्ष गुज़ारे हैं या फिर वह भी मंदिर-मस्जिद, ऊंच-नीच व धर्म-जाति की निरर्थक बहसों में उलझा रहा। यहां तक कि अपने सांसद के विचार, उसके स्वभाव, उसकी छवि व प्रकृति, उसके चरित्र तथा उसकी सामाजिक व राजनैतिक पृष्ठभूमि आदि सभी बातों का ज्ञान मतदाताओं को होता है। और यदि किसी क्षेत्र में बिल्कुल ही अज्ञानी $िकस्म के मतदाता रहते भी हों तो भी जागरूक मतदाताओं का यह कर्तव्य है कि वे अपने हल्के के सभी मतदातआों को इन सभी ज़रूरी तथ्यों से अवगत कराएं।   
        देश में विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में अनेक ऐसे नेता भी मिलेंगे जिन्हें उनकी पार्टी द्वारा प्रत्याशी नहीं बनाया जा रहा है।  ऐसे लोग दूसरे दलों से सौदेबाज़ी कर अपने चेहरे पर नई विचारधारा का मुखौटा डालकर एक पेशेवर बहुरूपिए के रूप में आपके सामने अवतरित होंगे। अनेक ऐसे नेता भी चुनाव मैदान में दिखाई देंगे जिनका काम अपनी व अपनी पार्टी की उपलब्धियां बताना नहीं बल्कि दूसरे दलों की कमियां उजागर करना मात्र है। कुछ ऐसे लोग भी मिलेंगे जो महात्मा गांधी से लेकर पंडित नेहरू, इंदिरा गांधी व राजीव गांधी को देश का सबसे बड़ा नुकसान पहुचाने वाला नेता तो ज़रूर बताएंगे परंतु उनकी अपने आदर्श नेताओं की सूची में कोई एक नाम भी ऐसा नहीं होगा जिसका $कद उपरोक्त नेताओं से ऊंचा हो? अनेक नेता शब्दों व भावनाओं के जाल में उलझाने की कोशिश करेंगे। कहीं सेना के शौर्य को राजनैतिक दल के शौर्य के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा तो कहीं झूठी उपलब्धियों का अंबार खड़ा कर दिया जाएगा। हद तो यह है कि इस बार का लोकसभा चुनाव लगभग पूरी तरह से विज्ञापनों व चुनाव प्रचार के अन्य माध्यमों को आधार बनाकर लड़ा जा रहा है। टेलीविज़न को भी चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। झूठ-$फरेब और मक्कारी अपने पूरे चरम पर है। देश की सीमाएं लगभग चारों ओर से असुरक्षित हैं उसके बावजूद सत्ताधीशों द्वारा स्वयं को 'महाबलि व शक्तिमान' के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। हैरानी की बात तो यह है कि हमारे देश में ऐसे राजनेता भी अवतरित हो रहे हैं जिनका आज तक न कोई गुरू व शिक्षक नज़र आया न ही किसी व्यक्ति ने अपना सहपाठी स्वीकार किया परंतु ऐसे नेता स्वयं को पोस्ट ग्रेजुएट भी बता देते हैं व शिक्षित होने का स्वांग भी रचते हैं। कुछ नेता ऐसे भी सामने आ रहे हैं जो पिछले चुनाव में एम ए तक शिक्षा प्राप्त बताते थे परंतु इस बार वे स्वयं को इंटरमीडियट परीक्षा पास घोषित कर रहे हैं। सोचने का विषय है कि जिस व्यक्ति को अपने बारे में झूठ बोलने से कोई आपत्ति नहीं वह व्यक्ति देश या जनता के लिए झूठ क्यों नहीं बोल सकता?
        राष्ट्र के भाग्य विधाता मतदाताओं को झूठ के सौदागरों से पूरी तरह सचेत रहने की ज़रूरत है। इस प्रकार के नेता दरअसल देखने में ही नेता प्रतीत होते हैं परंतु इनके भीतर छल-कपट, मक्कारी व स्वार्थ का एक ऐसा लावा पोषित होता रहता है जिसका विस्फोट देश व समाज को कभी भी रसातल की ओर ले जा सकता है। पिछले पांच वर्षों में देश ने बहुत ही $गौर से और $करीब से यह सबकुछ देखा है। देश में कुछ राजनैतिक दलों ने धार्मिकता तथा राष्ट्रवादिता का प्रमाण पत्र बांटने का ठेका ले रखा है और ऐसी ही शक्तियां धर्म व जाति के नाम पर समाज को विभाजित भी कर रही हैं। देश में कई स्थानों पर धर्म व जाति विशेष के लोगों पर लक्षित जानलेवा हमले होते रहे हैं। पिछले पांच वर्षों में देश कई बार धार्मिक व जातीय उन्माद की चपेट में आ चुका है। हमारे देश की प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थाओं को संदेहपूर्ण व विवादित बनाने की कोशिशें की गई हैं। किसानों द्वारा रिकॉर्ड आत्महत्याएं की गई हैं। देश को दो करोड़ रोज़गार प्रतिवर्ष दिए जाने के बजाए करोड़ों लोगों को बेरोज़गार कर दिया गया है। तमाम छोटे व मंझोले उद्योग नोटबंदी की चपेट में आकर बंद हो गए हैं। लाखों लोग नोटबंदी का शिकार होकर अपने-अपने काम धंधे बंद कर अपने घरों को वापस चले गए हैं। लगभग 120 बेगुनाह लोग इस बेहूदी नोटबंदी नीति का शिकार होकर अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं। 
        2014 में बड़े ज़ोर-शोर से यह वादा किया गया था कि हम सत्ता में आए तो राजनीति से अपराधियों की छुट्टी कर दी जाएगी। परंतु ठीक इसके विपरीत न केवल राजनीति में अपराधियों की बढ़ोतरी हुई बल्कि राजनीति ही अब अपने-आप में अपराधीकरण की राह पर आगे बढ़ चली है। देश ने जिसे प्रधानमंत्री निर्वाचित किया वह स्वयं ही प्रधानमंत्री की बजाए प्रधानसेवक व चौकीदार बन बैठा और अब बड़ी ही चतुराई से स्वयं को तरह-तरह के लांछनों से बचाने के लिए देश के लोगों को भी चौकीदार बताने का स्वांग रचा जा रहा है। मतदाताओं को इस प्रकार के भावनात्मक फंदों व जालों से स्वयं को बचाकर रखने तथा अपने विवेक, ज्ञान, धैर्य तथा साहस का परिचय देते हुए देश के विकास,एकता-अखंडता सामाजिक व धार्मिक समरसता के पक्ष में मतदान करना है न कि किसी के राजनैतिक भविष्य संवारने की खातिर या किसी धर्म व जाति या मंदिर-मस्जिद आदि के नाम पर।



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