हो जाओ विभोर तुम
| -Priyanka Maheshwari - Apr 10 2019 12:38PM

पुरुष अपरिभाषित नहीं है...
है वो कुछ 
उच्छृंखल सा..
उद्दंड सा...मगर है वो
मर्यादित...
देता है वो भी
अपनी भावनाओं को
विस्तार..
खामोश रहकर ही
भावों में बनता बिगड़ता..
थामता है जब
दामन...
खामोशी से देता है
संबल..
मौन ही मुखर हो जाता
जब मुसकाती आंखें..
पल पल...
राहें कितनी भी हों
जटिल...
रहता स्थिर बन वो 
गंभीर..
है निर्मल मन तुम्हारा
है प्रेम से
परिपूर्ण..
हो जाओ विभोर तुम
बनकर अनुकूल..

                                                                                                 -प्रियंका माहेश्वरी



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