चुनावी रैलियों और वोट देने तक ही क्यों सिमट जाते हैं युवा? 
| - Saleem Raza - Apr 10 2019 12:40PM

देश में आम चुनाव हों या विधान सभा के चुनाव हर राजनीतिक दल देश का भविष्य कहे जाने वाले युवाओं को अपनी-अपनी ओर सम्मोहित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोडना चाहते। उर्जा से भरपूर नौजवान के जोश का क्या कहना, लिहाजा कुछ बड़ी राजनीतिक पार्टियां उनके बेहतर भविष्य की कागजी और कोरी घोषणाओं का सपना दिखाकर उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करके अपनी चुनावी जमीन को मजबूती देने में लग जाती हैं। हर साल मनाया जाने वाला मतदाता दिवस का मुख्य उद्देश्य ये है कि देश के ज्यादा से ज्यादा युवा मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करके लोकतंत्र को मजबूत बनायें साथ ही देश को एक स्थिर और मजबूत सरकार भी देने में अपनी भूमिका निभायें।

अब चूंकि देश में आम चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है, पहले चरण का मतदान 11 अप्रैल को होना है लिहाजा सभी राजनैतिक दल युवाओं को अपने लोक-लुभावने भाषणों से सम्मोहित करने के काम में लग गये है। अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर चुकी मोदी सरकार के समय में देश के अन्दर बेरोजगारी का ग्राफ जिस तरह से बढ़ा है वो सचमुच सोचनीय मुद्दा है। हर बार चुनाव आने से पहले हर राजनीतिक पार्टियां अपने चुनावी घोषणा पत्र में युवाओं को रोजगार और उनके करियर से मुत्तालिक बड़े-बड़े वायदे करती ह,ै लेकिन क्या ये वायदे चुनावी घोषणा पत्र के हाशिये के लिए बनाये जाते है या फिर युवाओं को सिर्फ अपनी स्वार्थ सिद्धि किये जाने का फन्डा।

इस वक्त अगर देश के अन्दर कोई ज्वलन्त समस्या है तो वो है रोजगार जिसके चलते देश का युवा हताश और निराश है, और वो देश के अन्दर देख भी रहा है जिसका ताजा उदाहरण इी.एस.एन.एल के तकरीबन 54 हजार कर्मचारियों की सेवायें समप्त होने का फरमान। फिर भी अपने तूफानी चुनावी दौरे में राजनीतिक पार्टियां जाति,धर्म,राष्ट्रवाद जैसे मुद्दों पर ही मुखर है, जबकि देश का युवा इन मुद्दों में कोई दिलचस्पी नहीं रखता उसे तो सिर्फ अपने सपनों को साकार करने वाला मुद्दा रोजगार ही चाहिए जो इन राजनीतिक पार्टियों के घोषणा पत्र की शोभा तो जरूर बना हुआ है लेकिन धरातल पर इसके अमल पर कोई भी राजनीतिक पार्टी कृतसंकल्प नहीं है, ये देश के अन्दर बढ़ती बेरोजगारी के आंकड़े बताते हैं।

ये बात सभी राजनैतिक दलों को सोच लेनी चाहिए कि देश का युवा उस ही पार्टी को अपना मत देने का मन बना चुका है जो भी राजनैतिक दल उनके इस मुद्दे पर उन्हें आश्वस्त करेगा। अपने पांच साल मुकम्मल कर चुकी मोदी सरकार ने उन मुद्दों को भुनाने की कोशिश करी जो भावनात्मक और आस्था से जुड़े थे लेकिन हालिया जारी आंकड़े बताते हैं कि मौजूदा सरकार के वक्त में बेरोजगारी का ग्राफ पांच के मुकाबले  3.17 से घटकर 2 .15 तक पहुच गया है जो इस बात का संकेत है कि वर्तमान सरकार के समय में रोजगार की दशा और दिशा दोनों बिगड़ी है। मोदी सरकार सिर्फ और सिर्फ बहुसंख्यकों की आस्था का प्रतीक राम मंदिर मुद्दे पर ही उलझी रही।

मोदी के सत्ता में आने के बाद देश के अन्दर इस बात की उम्मीद जगी थी कि अब इस सरकार में युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर प्रदान होंगे, बस ये ही आम जनता की प्राथमिकता थी।रोजगार के बेहतर मौके को 2014 के बाद 2017 में 30 फीसद लोगों ने माना था और फिर एक साल बाद ये बढ़कर 47 फीसद हो गई जो मौजूदा सरकार के लिए एक चिन्ता का विषय इसलिए है कि वो मतदाताओं की अपेक्षा पर खरे नहीं उतरे इसलिए 2019 का चुनाव रोजगार के मुद्ेदे के इर्द-गिर्द ही होगा। रोजगार को प्राथमिकता में रखकर 2014 के आम चुनाव में देश के युवाओं ने मोदी के समर्थन में बम्पर मतदान किया था, इस बात का उल्लेख मोदी ने अपनी पुस्तक में भी किया था जिसमें कहा था कि मुझे सत्ता तक पहुचाने में देश के युवाओं का बड़ा योगदान रहा है लेकिन एक सवाल आंखों के सामने हवा में तैर रहा है कि फिर मोदी के शासन काल में युवाओं की उपेक्षा का कारण क्या हो सकता है।

भले ही मोदी ने युवाओं के विकास को लेकर बहुत सारी योजनाओं का शुभारम्भ किया हो जो युवाओं के संवरण में सहायक थीं लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि देश का युवा सरकारी नौकरी पाने की चाहत ज्यादा रखता है। अब चूंकि भाजपा बनाम सर्वदल यानि महागठबन्धन महासंग्राम हो रहा है जिससे मोदी सरकार की दूसरी पारी पर खतरे के आंशिक बादल मंडरा रहे थे लेकिन इसी बीच एन.एस.एस.ओ की उस रिपोर्ट ने भाजपा के खेमे में और भी बेचैनी बढ़ा दी है जिसमें उल्लेख किया गया है कि पिछले 45 सालों में बेरोजगारी का फीसद 6.1 पर पहुच गया है ऐसे में ये रिपोर्ट देश के युवाओं में भाजपा के प्रति रूझान में कमी अवश्य ला सकती है , ऐसे में मोदी सरकार द्वारा चलाई जा रही येजनाओं को तगड़ा झटका लग सकता है।

इस बार भी हर राजनीतिक दल युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने में लगे हुए है इसकी वजह है युवाओं का मतदान के प्रति बढ़ता रूझान अगर हम 2009 में हुए आम चुनाव पर नज़र डालें तो देश के तकरीबन 54 फीसद युवाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। फिर 2014 के आम चुनाव में ये बढ़कर 68 फीसद तक पहुंच गया था लेकिन दिलचस्प तथ्य ये रहा कि इस चुनाव में पहली बार अपने मताधिकार का उपयेग कर रहे कुल युवा मतदाताओं का मत प्रतिशत कुल मत प्रतिशत का 66 प्रतिशत था वहीं राजनीतिक जानकारों का मानना है कि 2019 के आम चुनाव में ये प्रतिशत और भी बढ़ जाने के संकेत मिल रहे हैं। अब ऐन चुनाव से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी ने अपना संकल्प पत्र जारी किया है जिसमें शिक्षा को बजट से गायब तो रोजगार पर तबज्जो नही दिखाई है। वहीं कांग्रेस ने हर साल 22 लाख नौकरियों का वादा किया है।

इसे देखकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही युवाओं को रिझाने के लिए अपने तरकश से तीर निकाल रही हैं।कितना दुःखद है कि  इस बदलाव की राजनीति में युवाओं से जो आशा जगी थी वो उनके पास तो है लेकिन न तो राजनीति में युवाओं की भागीदारी है और न ही किसी पार्टी के चुनावी एजेन्डे में युवाओं को आगे लाने का जिक्र होता है। बहरहाल देश की सरकार ने जिस तरह से अपने पांच साल काट दिये थे उससे युवा बेहद निराश है इस बार उसने रोजगार देने वाली पार्टी को ही अपना मत देने देने का मन बनाया है आज का युवा भावनात्मक मुद्दों को उतनी तरजीह नहीं देता आज के दौर की जरूरत है कि युवा अपने हक के लिए सक्रिय राजनीति में अपनी हिस्सेदारी दें और देश के ज्वलन्त मुद्दों पर भी अपनी सक्रियता दिखायें फिर संभव है कि उनकी काबलियत, उनकी संवेदनशीलता और उनकी क्षमता देश के राजनीतिक तस्वीर को बदल सकती है। बहरहाल देश के अन्दर इस वक्त सबसे बड़ा ज्वलन्त मुद्दा बेरोजगारी है जिससे युवा ग्रस्त है लिहाजा 2019 का चुनावी महासंग्राम रोजगार पर ही केन्द्रित होगा जो मौजूदा सरकार के लिए परेशानी का सबब बनेगा। 

सलीम रज़ा



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