पांच साल में कुछ दिन का रोजगार
| -Raj Shekhar Bhatt - Apr 10 2019 12:42PM

चेहरे में वीर रस के भाव और जुबां में तीर-कमान  

गिरगिट प्रजाति के नेतानन्द जी

खुल जा सिम-सिम  

हर बार चुनाव तो निपट चुके होते हैं, लेकिन इस बात का पता नहीं कि कौन निपटता है और कौन रपटता है। चुनावी कुरूक्षेत्र में सभी योद्धा जुबानी तीर-कमान भी छोड़ आते हैं। उसके बाद सभी योद्धा आरामतलब अवस्था में रहते हैं, लेकिन दिमागी बीपी बढ़ा हुआ रहता है। क्योंकि अधिकांश योद्धा तो यह सोचते हैं कि ‘‘बटोरने तो गये थे वोट, कहीं लग न जाये पराजय की चोट’। कुछ ऐसा भी सोचते, कि ‘‘मैंने बंटवाये हैं बहुत नोट, मुझे ही पड़ेंगे सारे वोट’। लेकिन सत्य यह भी है कि न योद्धाओं के नोट काम आते हैं और न ही इनके जुबानी तीर-कमान। ये पब्लिक है, ये सब जानती है। वैसे भी डिजिटलाईजेशन होने के बाद से सारी काली और गोरी करतूत जनता के सामने रहती है।

दरअसल, चुनाव का टाईम आया नहीं कि नेतानन्द जी मंच पर आ गये। सामने माईकानन्द महाराज हैं और मैदान में जनता की भीड़। पुलिस वाले सुरक्षा में लगे हैं और मीडिया वाले फोटो की खीचम-खांच कर रहे हैं। चेहरे पर खुशियों के साथ वीर रस के भाव और जुबां गरजने को तैयार होती है। आंखों में विपक्षियों के लिए क्रोध की ऐसी ज्वाला धधक रही होती है, जैसे किसी ने इनकी भैंस खोल दी हो। फिर क्या होना, नेतानन्द जी गरजने लगते हैं। इसने नहीं किया, मैं करूंगा। चारों ओर विकास होगा, बेरोजगारी हटेगी और महंगाई कम होगी। यही समय ऐसा समय है, जब नेतानन्द जी सबसे मिलते हैं। सभी का आदर होता है। हर-हर की सुनी जाती है। चुनावी रैलियों में अच्छे व्यंजन और गिफ्ट भी बांटे जाते हैं। क्योंकि नेतानन्द जी को पता है, अगर जनता जनार्दन का सपोर्ट मिल गया तो पांच साल तक इनको ही तो पीछे भगाना है।

यही वो समय है, जब इनकी आवाज बुलंद रहती है और आसमान छूती है। इन दिनों इनके बयान ‘जननी जन्मभूमिश्च, स्वर्गादपि गरीयसी’ की भावना समेटे रहते हैं। इन्हीं दिनों जन-जन अमीर और नेतानन्द जी फकीर होते हैं। क्योंकि चुनावी प्रचार के समयान्तराल में अधिकांशतः एक ही चुनावी फाॅर्मूला है। ‘‘शराब, कबाब, नोट का परिणाम है वोट’’। यही वो दिन हैं जब नेतानन्द जी के पिछलग्गू प्रचार में जुट जाते हैं और कमाई शुरू। नेतानन्द जी की ईमानदार छवि के होती हैं और बाद की छवि का कुछ भरोसा नहीं। भ्रष्टाचार और घोटालों में भी इनका नाम आ सकता है। कर्मठ, जुझारू, संघर्षशील और मेहनती भी इनको बना दिया जाता है। लेकिन चुनाव जीतने के बाद इसके विपरीत की स्थिति सामने आती है। 

वैसे भी नेतानन्द जी होते हैं गिरगिट प्रजाती के। कब कौन सा रंग बदल लें, कोई नहीं जानता। प्रचार-प्रसार कम भी हो तो कौन जाने गुपचुप तरीके से क्या हो रहा है। समर्थक, पिछलग्गू, बेरोजगारों और गरीब लोंगों की भी बल्ले-बल्ले होती है। इनको पांच साल में कुछ दिन की जाॅब और अच्छा खाना जो मिल रहा होता है। अंत में तो उपसंहार होना ही है। प्रचार बंद हुआ तो वोटिंग शुरू। वोटिंग खत्म हुयी तो वोटों की गिनती शुरू। अंततः गिनती की समाप्ति के बाद ‘‘खुल जा सिम-सिम’’ की स्थिति सामने आती है। यही वो स्थिति है, जो किसी परिस्थिति को आसमान तो किसी को सूनसान करती है। 

-राज शेखर भट्ट



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