प्रियंका माहेश्वरी की कहानी- शिकार...
| -Priyanka Maheshwari - Apr 11 2019 12:38PM

आज सुबह से ही ऐसा पड़ा हुआ था। रात बहुत देर हो गई थी सोने में। कल्पना से बात करते-करते 3 कब बज गए पता ही नहीं चला। विवेक लेटे-लेटे ही सोच रहा था कि कल्पना से मिले हुए कितना समय हो गया शायद छह महीने हुए होंगे लेकिन बड़ी दिलकश और जानदार औरत है। कैसी भी हो लेकिन बात मजेदार करती है, बस थोड़ी तारीफ करनी पड़ती है, लेकिन मंजू में वह बात नहीं थोड़ी मूडी और चूजी है, उससे जरा संभल कर बात करनी पड़ती है। रविवार का दिन था। छुट्टी होने के कारण किसी काम की जल्दी नहीं थी। विवेक आराम से सब काम निपटा रहा था। कल्पना को गुड मॉर्निंग का मैसेज डाला और लिखा कि "जान! रात में नींद आई कि नहीं?" थोड़ी ही देर में कल्पना का रिप्लाई आया, "तुम तो नींद में भी चैन ना लेने देते हो, तुम्हारा तो आज संडे है लेकिन मेरे पास बहुत काम है, बाद में बात करती हूं।"

तुरंत विवेक ने रिप्लाई दिया, "अरे काम तो दिन भर चलता रहेगा, जरा देर बात कर लो तो दिन सुधर जाएगा।" कल्पना बोली, "मैं ऐसे ही बीच-बीच में आती रहूंगी, तुम्हारे मैसेज का जवाब देती रहूंगी लेकिन अभी बहुत सा काम पड़ा है, तो जा रही हूं।" "ठीक है, निपटा लो काम... फिर बात करते हैं।" कल्पना से बात करके वो मंजू की वॉल देखने लगा कि वह कब ऑनलाइन थी। उसने मंजू को मैसेज किया, "हाय मोटी अभी तक सो रही है? उठ जा।" मैसेज करके विवेक अपने रूटीन से फारिग होने में लग गया। फिर तैयार होकर नाश्ता करने बैठा तो मंजू का मैसेज पड़ा हुआ था। "एक तो देर तक जगाते हो, सोने नहीं देते, आज छुट्टी है तो सोने दो बाद में बात करती हूं।" विवेक ने मंजू को फोन लगाया, रिंग जा रही थी। "हेलो", मंजू की नींद से भरी आवाज सुनाई दी। "मैं तो उठकर तैयार भी हो गया और तुम अभी तक सो रही हो, अब उठ जाओ।

"विवेक ने कहा। मंजू बोली, "आज छुट्टी है तो बस आज आराम, सब काम आराम से करूंगी, लेकिन अब उठ गई हूं फ्रेश होकर बात करती हूं।" और मंजू ने फोन कट कर दिया। "क्या करूं एक भी मैडम बात नहीं कर रही है कैसे टाइमपास करूं" एफबी चलाते चलाते विवेक सोच रहा था कि मालती नाम की अपनी एक फब  फ्रेंड को "हाय ब्यूटीफुल लेडी" का मैसेज किया। मालती ने खुश होकर जवाब दिया, "वेरी वेरी गुड मॉर्निंग"। बात आगे बढ़ाने की गरज से विवेक ने कहा, "आप बहुत सुंदर है और आपकी पोस्ट बहुत अच्छी होती है।" जवाब में "थैंक्स" लिख कर आया। "बस ऐसे ही जो अच्छा लगता है लिख देती हूं, आपको पसंद आया वो बड़ी बात है।" अब विवेक जरा खुलने लगा उसने पूछा कि "आप कहां से हो, मैं दिल्ली से हूं।" मालती ने कहा "मैं हैदराबाद से"। इस तरह धीरे-धीरे बातचीत बढ़ने लगी और फिर वीडियो कॉल भी होने लगी।

विवेक अब कल्पना और मंजू को नजरअंदाज करने लगा था। उसकी दिलचस्पी अब मालती में बढ़ने लगी। कल्पना को काम का बहाना और मंजू तो कभी कभी रिप्लाई दे देता था। अब वह मालती के साथ ज्यादा बिजी रहने लगा था। एक दिन मालती ने पूछा कि, "विवेक मिलोगे क्या"? एक पल चुप रहकर विवेक बोला कि, "हां, क्यों नहीं जब तुम कहो, लेकिन तुम रहती तो बहुत दूर हो फिर मिलोगी कैसे?" मालती सिर्फ "हूं" करके रह गई। "सुनो, तुम हैदराबाद आ जाओ, मैं तुमसे मिलने आ जाऊंगी" मालती ने कहा। "फिर तुम पूरा दिन मेरे पास रहोगी क्या?" इस बात पर मालती चुप रही रही। अब विवेक को लगने लगा कि मालती उस पर हावी होने लगी है। उसने बातचीत जरा कम कर दी। उसे डर लगने लगा कि मालती उससे मिलकर कहीं उसे ब्लैकमेल ना करने लगे। फब क्राइम के बहुत सी खबरें उसने पेपरों में पढ़ रखे थे। फिर भी वो मालती से जुड़ा रहा। अब विवेक कभी कभी कल्पना और मंजू से बात कर लेता था। 

इन्हीं दिनों फब पर विवेक की रिचा नाम की एक नई महिला मित्र से दोस्ती हुई। बात करने में वो बहुत दिलचस्प थी। बात बात पर हंसी मजाक करना उसकी आदत में शामिल था। विवेक को रिचा बहुत भा गई और उसने अपने पुराने अंदाज उसे लुभाना शुरू कर दिया। रिचा ने समझाया कि हमारे बीच उम्र का अंतर बहुत है और हमारा कोई मेल भी नहीं। मेरा अपना एक परिवार है लेकिन विवेक ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया। विवेक ने कहा, "जो भी हो आप मुझे बहुत अच्छी लगती हो, आप के अलावा दूसरा कुछ मुझे सूझता नहीं है। मैं आपका दीवाना हो गया हूं"। रिचा मन ही मन खुश तो बहुत होती थी लेकिन प्रकट में गुस्सा जाहिर करती थी। अब उन दोनों में बातचीत लगातार चलने लगी। अब विवेक मालती से दूर रहने लगा था और रिचा में दिलचस्पी लेने लगा था। दोनों अपनी दिन भर की बातें एक दूसरे से शेयर करते। आज बाजार गई थी, किराना लाई, आज पार्लर जाना है, मूवी जा रही हूं, जैसी बातें होती रहती थी। बदले में विवेक आह भरकर कहता, "काश मैं भी होता तुम्हारे पास। तुम नहीं होगी तो मैं कैसे रहूंगा? तुम्हारे बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता।" खुश होकर रिचा "किस" वाला सिंबाल दे देती थी।

विवेक का दोस्त माही यह सब बहुत दिन से देख रहा था। एक दिन उसने उसे टोका और कहा, "क्या है यह सब?क्या नौटंकी लगा रखी है? क्यों इन बिचारियों के साथ खेल रहा है? उनके साथ टाइम पास कर के उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ क्यों कर रहा है? गलत है यह सब। कभी राज खुल गया तो क्या होगा और तेरा मन कैसे यह सब स्वीकारता है? जितना समय तू इन सब में वेस्ट करता है अगर उतना समय अपने करियर बनाने में लगा दे तो तेरा भला होगा, और यह सब बुरी आदत है, इस तरह की वाहियात हरकतें करना छोड़ दे।" विवेक एकदम से माही को रोककर बोला, "रहने दे, मुझे तेरा ज्ञान नहीं चाहिए। तेरा ज्ञान तू अपने पास रख। मुझे पता है कि मैं क्या कर रहा हूं। फब पर कोई भी सीरियस नहीं होता। और क्या हुआ जो राज खुल गया तो एक जाएगी दूसरी आएगी। यह सिर्फ टाइम पास है मेरे लिए। जब काम से थक जाता हूं तो यही एक मन बहलाने का साधन है मेरे पास। माही को बहुत बुरा लगा और वह नाराज होकर विवेक के घर से चला गया। विवेक मन को शांत करने के लिए फिर से एफबी पर एक नए शिकार की तलाश में लग गया।



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