18 साल की हो गयी हूं लेकिन मेरा नामकरण नहीं हुआ
| -Raj Shekhar Bhatt - Apr 11 2019 3:03PM

हे उत्तराखण्ड वासियों मैं अपने दर्द का किस्सा कैसे बयां करूं। 18 साल की हो गयी हूं मैं, लेकिन आज तक भी मुझे पता नहीं चल पाया है कि आखिर मेरा नाम क्या है। इन 18 सालों में 8 अलग-अलग पंडित मेरा नामकरण करने के लिए आ चुके हैं लेकिन मेरे नामकरण के लिए आपस में लड़ते रहे और नामकरण की बात धरी की धरी रह गयी। वैसे पंडितों की कमेटियां मेरे घर में बहुत हैं लेकिन नामकरण करने के लिए भाजपा और कांग्रेस के पंडित ही आ पाये।

शुरूआत से अगर मेरा किस्सा सुनेंगे तो आप भी समझ जायेंगे कि आखिर मुझे पीड़ा किस बात की है। हुआ कुछ यूं कि पहले मेरा घर उत्तर प्रदेश हुआ करता था और मेरा नाम लखनऊ हुआ करता था। मेरा परिवार फला-फूला और सोचा की एक नया घर बना लिया जाय। आखिरकार समय आ ही गया और 9 नवम्बर 2000 को मेरा नया घर बन गया, जिसका नाम उत्तरांचल रखा गया। अब मेरा परिवार उत्तरांचल बन गया और अस्थाई तौर पर मेरा नाम देहरादून रख दिया गया।

दर्द तो होना ही था ना, क्योंकि मैं पैदा भी हो गयी और नाम भी अस्थाई मिल पाया। वहीं दूसरी ओर मेरी विडम्बना तो देखिये साहब। कोई मुझे देहरादून कहके बुलाता तो कोई गैरसैंण। आखिर मैं हूं कौन, किसका जवाब दूं। जो देहरादून करके मुझे आवाज लगा रहा है या जो गैरसैंण कहकर बुला रहा है। अब और क्या कहूं मैं... दर्द रूकता नहीं एक पल भी, पंडितों की चोट खाई हुयी हूं। 

चलो, अब मेरे घर की बात करें, क्योंकि इन पंडितों को तो मेरे घर का नाम भी रास नहीं आया। लेकिन इतना जरूर है कि मेरे घर का पूर्ण रूप से नामकरण तो हो गया। क्रमानुसार देखें तो वर्ष 2000 से लेकर 2007 मेरे घर का नाम उत्तरांचल था, लेकिन मैं तब भी भटक रही थी अपनी तलाश में, अपने नाम को जानना चाह रही थी। अब जनवरी 2007 का समय आया तो स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए पंडितों ने मेरे घर का नाम उत्तरांचल से बदलकर उत्तराखण्ड रख दिया। लेकिन मैं तो तब भी भटक ही रही थी, स्वयं को पहचान पाना भी मुश्किल सा लगने लगा। बिना नाम के पहचान कैसी...?

अब आप ही बताइये कि 18 साल की मैं हो चुकी हूं और 8 पंडित मेरे घर की मुख्य कुर्सी में बैठ चुके हैं, मगर मेरा नामकरण अब तक नहीं हो पाया। आखिर इन पंडितों ने तो मेरे नाम करे दर-बदर करके रख दिया, मुझे और मेरे नाम को गुमनामी देकर मेरे नामकरण को पंडितायी का मुद्दा बनाकर रख दिया। जब से मेरा घर बना मुख्य पंडितों में नित्यानन्द स्वामी, भगत सिंह कोश्यारी, नारायण दत्त तिवारी, भुवन चन्द्र खण्डूरी, रमेश पोखरियाल निशंक, विजय बहुगुणा, हरीश रावत और त्रिवेन्द्र सिंह रावत मेरे घर आये और मेरे नाम को बस हवाईयां देकर चले गये। किसी ने यह भी नहीं सोचा कि मेरे नाम का क्या होगा, मेरी पहचान का क्या होगा।

बहरहाल अब अंत में, मैं इतना आपको बता दूं कि मेरे घर का नाम उत्तराखण्ड है और उसे इनसानी भाषा में राज्य कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर मैं उस घर का सबसे बड़ा और मुख्य कमरा हूं, जिसे इनसानी भाषा में राजधानी कहते हैं, परन्तु नाम मेरा हवा में उड़ रहा है। कुल मिलाकर इतना कहूंगी कि मैं बेबस, अबला और दुखियारी हूं। जिसकी कोई पहचान नहीं है, क्योंकि बिना नाम के मेरी पहचान हो ही नहीं सकती। 18 साल से देखती आ रही हूं और आगे भी दर्द सहते हुये देखती रहूंगी कि मेरा नामकरण होता है कि नहीं...!



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