कार्यकर्ताओं के अभाव से जूझ रही कांग्रेस अपनों को सहेजने में जुटी
| Santosh Dev Giri - Apr 12 2019 11:45AM

अस्थिरता के दौर से गुजरती कांग्रेस को अपनों से भी जूझना पड़ रहा है। कार्यकर्ता कम नेताओं की संख्या अधिक होने से पार्टी, संगठन को विस्तार देते हुए लोकसभा चुनाव में मुकाम हासिल करने में भी कांग्रेस के दिग्गजों को पसीने छूट रहे हैं। पार्टी में मठाधीश 'नेता' बन कार्यकर्ताओं को पीछे छोड़ते चले आ रहे हैं। जिसका असर यह है कि यहां कार्यकर्ता कम नेता ज्यादा दिखाई दे रहे हैं। पिछले 5 साल से केंद्र की सत्ता से बेदखल हुईं कांग्रेस लोकसभा चुनाव के जरिए सत्ता में पुनर वापसी के लिए हाथ पैर मार रही है जिस की छटपटाहट 'अपनों' को एक करने को लेकर साफ देखी देखी जा सकती है।

       कभी कांग्रेस के गढ़ रहे उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में कांग्रेस की मनोदशा इन दिनों कुछ ऐसी ही बनी हुई है। देश को सर्वाधिक प्रधानमंत्री देने की चर्चा होती है तो बरबस ही जुबान पर पूर्वांचल का ही नाम होता है। मसलन, पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर सिंह इत्यादि ऐसे प्रमुख नाम रहे हैं जो पूर्वांचल की राजनीत से देश के शीर्ष राजनीति के केंद्र बिंदु पर अपने को स्थापित कर देश की सर्वोच्च सत्ता की रहनुमाई किए हैं। उन दिनों कार्यकर्ताओं की एक अच्छी खासी समर्पित और मजबूत टीम हुआ करती थी,  जो कालांतर में गुम हो चुकी है। अब कार्यकर्ता कम नेताओं की भीड़ ज्यादा देखने को आती है। कालांतर में इससे कांग्रेस आज अछूती नहीं है।

      बूथ से लेकर गांव स्तर पर पार्टी संगठन की मजबूत टीम हुआ करती थी, लेकिन अब वह दिन नहीं रहे कांग्रेस के लिए आज बूथ और सेक्टर वार अपने जमीनी कार्यकर्ताओं को खड़ा कर पाना भी मुश्किल भरा कार्य साबित हो रहा है। पिछले दिनों कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव व पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रभारी प्रियंका गांधी वाड्रा का पूर्वांचल का दौरा हुआ था इस दौरान उन्होंने संगम नगरी प्रयागराज से काशी के बीच की दूरी तय करते हुए पार्टी संगठन की जमीनी हकीकत को आंकने के साथ ही साथ पार्टी को धार देने और मतदाताओं का रूख भांपने का भरसक प्रयास किया था, लेकिन यहां भी कार्यकर्ताओं की फौज कम नेताओं की फौज ज्यादा दिखलाई दी है। पूर्वांचल दौरे के दौरान प्रियंका का कोई खास जादू भी कारगर साबित होता दिखाई नहीं दिया है। पूर्वांचल के चुनावी दौरे के दौरान कांग्रेस की पूर्वांचल प्रभारी ने प्रयागराज से अपनी चुनावी यात्रा प्रारंभ कर भदोही, मिर्जापुर के बाद वाराणसी संसदीय क्षेत्र का दौरा किया था।

       इस दौरान कांग्रेस के कुछेक जमीनी नेताओं को छोड़ बड़े नेताओं के 'जेब' के बन के रहने वाले नेताओं की फौज भी ज्यादा प्रियंका के आगे पीछे नजर आई जो अपने आप को नेता जी के संबोधन को सुन काफी गौरवान्वित महसूस करते रहे। उन्हें इस बात का जरा भी भान नहीं रहा कि 2019 का लोकसभा चुनाव पार्टी और उनकी तकदीर भी तय करने वाला है। कहना गलत नहीं होगा कि किसी भी दल के लिए चुनाव जीतने के लिए एक मजबूत संगठन और कार्यकर्ताओं के समर्पित टीम का होना आवश्यक होता ही नहीं नितांत आवश्यक होता है, जो फिलहाल कांग्रेस के पास नहीं है। थोड़े बहुत जो समर्पित कार्यकर्ता जिन्हें कांग्रेस के जड़ से जुड़ा हुआ कार्यकर्ता कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी अभी उपेक्षित होने के कारण दूर ही बने हुए हैं। पूर्वांचल में कांग्रेस के गढ़ के रूप में चिन्हित कई ऐसे क्षेत्र और कार्यकर्ता अभी भी लोकसभा चुनाव से दूरी बनाए हुए हैं। उनकी ना तो उम्मीदवार में दिलचस्पी दिखाई दे रही है और ना ही चुनाव के प्रति ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं आखिरकार कांग्रेस किस के बलबूते लोकसभा चुनाव में फतह का दिशा स्वप्न देख रही है? 

         मजे की बात है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के जरिए अपने खोए हुए जनाधार को प्राप्त करने के लिए एड़ी चोटी एक की हुए कांग्रेस ने इन दिनों  बूथ स्तर से लेकर जमीनी स्तर पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं की एक मजबूत टीम गठित करने के साथ "मेरा बूथ मेरा गौरव" नाम से अभियान भी चला रखा है। जिसके माध्यम से प्रयास है कि कार्यकर्ताओं को पार्टी संगठन से जुड़ने के साथ पार्टी के पक्ष में एक माहौल बनाया जा सके। इसके लिए सोशल मीडिया पर भी अपनों को सक्रिय कर दिया गया है। बावजूद इसके हवा का रुख रूपा ना अभी कांग्रेस के लिए कठिन ही दिखाई दे रहा है। अपने खोए हुए जनाधार को प्राप्त करने के लिए कांग्रेस हर जतन करती तो दिखलाई दे रही है पर कार्यकर्ताओं की फौज को सहज पाने में अभी इनसे दूर ही बनी हुई है।

......सूना पड़ा है "आनंद भवन", "औरंगाबाद हाउस" में है हलचल..

           कांग्रेस के पूर्वजों का गढ़ गृह रहा प्रयागराज का "आनंद भवन" सूना सूना दिखलाई दे रहा है। जबकि वाराणसी के "औरंगाबाद हाउस" में हलचल बनी हुई है। प्रयागराज का आनंद भवन कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए चुनाव के दौरान एक केंद्र बिंदु हुआ करता था। इसी प्रकार वाराणसी का औरंगाबाद हाउस भी कांग्रेसियों का गढ़ रहता था। आनंद भवन पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय पंडित जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा हुआ है तो वहीं दूसरी ओर वाराणसी का औरंगाबाद हाउस पूर्व मुख्यमंत्री दिग्गज कांग्रेसी नेता पंडित कमलापति त्रिपाठी की यादों को अपने अंदर समेटे हुए हैं दोनों का अपना एक खास महत्व और स्थान है। जिन्हें कांग्रेस के दिग्गजों का हृदय स्थल भी कहा जाता है।

            कांग्रेसी कहते हैं कि यहां हमारे नेताओं की आत्मा बसती है। दोनों ही कांग्रेस के स्वर्णिम काल के केंद्र बिंदु होने के साथ कांग्रेस और कांग्रेस के दिग्गजों से जुड़ी हुई अमिट यादों को अपने अंदर सहेजे हुए हैं। इनका अपना दबदबा हुआ करता था जिन्हें शायद ही कोई कांग्रेसी भूला हो। केंद्र और प्रदेश की राजनीति में दोनों का किसी जमाने में स्वर्णिम युग हुआ करता था। कालांतर में पूर्वजों की इस विरासत को सहेजने में औरंगाबाद हाउस काफी हद तक सफल भी है लेकिन बात जब छोड़ती है आनंद भवन की तो यह अपने आप को उपेक्षित महसूस करता करता दिखाई देता है। आखिरकार ऐसा हो भी क्यों ना लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है कांग्रेस के दिग्गज देश की सर्वोच्च सत्ता में पुनर वापसी के लिए हर संभव प्रयासों के साथ ही किसी भी सूरत में केंद्र की सत्ता पर काबिज होने का सपना संजोए हुए हैं। बावजूद इसके कांग्रेस के दिग्गजों का गढ़ रहा आनंद भवन  चुनावी कोलाहल से बिल्कुल दूर बना हुआ अपने को उपेक्षित महसूस कर रहा है जबकि वहीं दूसरी ओर वाराणसी का औरंगाबाद हाउस सक्रिय होने के साथ अपने पैर जमाने के लिए तटस्थ दिखलाई दे रहा है।



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