मत प्रतिशत कम क्यों?
| - Om Prakash Uniyal - Apr 12 2019 5:11PM

17वीं लोकसभा के लिए पहले चरण का मतदान समाप्त होने के साथ ही प्रत्याशियों का भाग्य मतपेटियों में बंद हो गया। उत्तराखंड के पांच संसदीय क्षेत्रों से भी 52 प्रत्याशी चुनावी रण में हैं। हालांकि, सभी उम्मीदवार अपनी-अपनी जीत का शत-प्रतिशत दावा ठोक रहे हैं लेकिन असलियत तो चुनाव परिणामों की घोषणा से पता चल पाएगी। यहां मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच ही कड़ा मुकाबला है। लेकिन जिस हिसाब से मत प्रतिशत है वह निराशाजनक कहा जा सकता है।

केवल 58 प्रतिशत तक ही सिमट कर रह गया मत प्रतिशत। जबकि ढिंढोरा बखूबी पीटा जा रहा था मतदाताओं को जागरूक करने का। राज्य के मतदाता कितने जागरूक हुए परिणाम सबके सामने है। सरकार और निर्वाचन विभाग जबर्दस्ती चाहे अपनी पीठ थपथपा रहे हों मगर ज्यादा से ज्यादा मतदाताओं को मतदान के लिए जागरूक करने में असफल रहे। राज्य में चुनाव शांतिपूर्ण  ढंग से संपन्न हुए। कुछेक केंद्रों पर चुनाव बहिष्कार जरूर हुआ।

सत्ता पक्ष यही कहता रहा कि मतदान बहुत ही अच्छा हुआ। मतदाताओं में काफी उत्साह देखा गया। यदि मतदाताओं में उत्साह होता तो परिणाम कुछ और ही होता। साफ है कि मतदाता नेताओं के झूठे वायदों से और राजनीति के बिगड़ते स्वरूप से खिन्न हो चुका है। जिसके कारण मतदाताओं का रुझान मत के प्रति कम देखा जाता है। चुनाव कोई सा हो उसमें मतदाता की अहम भूमिका होती है। चुनाव में मत प्रतिशत बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग कुछ नया सोचना होगा।

इस प्रक्रिया का सरलीकरण किया जा सकता है। वैसे मतदान कम होने के एक कारण नहीं अपितु कई कारण भी हो सकते हैं। जैसे लंबी कतारें, मतदाता सूची में नाम न होना, अनावश्यक पूछताछ, बहिष्कार, दूसरे प्रदेशों से एकदम आना असंभव आदि। भविष्य के लिए प्रक्रिया और भी सरल की जा सकती है यदि सरकार और आयोग थोड़ा प्रयास करे। 

-ओम प्रकाश उनियाल



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