सलीम रज़ा की कहानी- श्वेता 
| - Saleem Raza - Apr 13 2019 1:16PM

कृष्णा नगर कालोनी की आर्शीवाद मंजिल दुल्हन की तरह से सजी हुई थी। घर उन सारे रिश्तेदारों से भरा हुआ था, जो कभी-कभार मोहित के यहां खास मौकों पर देखे जाते थे। आने वाले हर मेहमान के हाथ में उपहार था, श्वेता अपने दादा-दादी, बुआ, फूफाओं के घेरे में थी। जिसे देखो उसके मुँह पर श्वेता उवाच था। मोहित और शशि घर में आने वाले मेहमानों का स्वागत कर रहे थे। हर आने वाले मेहमान की नज़र घर के दरवाजे पर लगी नेमप्लेट पर जाती जिस पर लिखा था, श्वेता चौधरी आई पी एस....

यह उस घर की एक बेटी की कहानी है, जो रूढ़िवादी परम्पराओं को आज भी कन्धे पर ढ़ो रहे हैं। अगर हम तुलनात्मक अध्ययन करें तो आज घटते लिंगानुपात के लिये ऐसे ही परिवार दोषी है। लेकिन अपने दिल दिमाग को वाॅश करके मोहित और शशि ऐसे मां-बाप भी हैं, जो बेटे और बेटी में कोई फर्क नहीं समझते। ये उन लोगों के लिये एक सन्देश है, जिनके दिलो-दिमाग पर बेटे के मुकाबले बेटी को कमतर आंका जाता है। श्वेता इस घर का वो नाम है, जिसने सिर्फ अपने मम्मी-पापा के अलावा अपने आप को सबकी नज़रो में उपेक्षित देखा। मोहित की शादी को पांच साल हो गये थे, लेकिन अभी तक मोहित संतान सुख से वंचित था। 

शादी के कुछ दिन बाद ही अपने घर का काम करते हुये शशि का पांव फर्श पर स्लिप हो गया था। शशि उस वक्त 5 माह की गर्भवती थी। रक्तस्त्राव ज्यादा होने की वजह से शशि को फौरन अस्पताल ले जाया गया। जिन्दगी मौत के बीच झूलती हुई शशि के स्वास्थ्य में दस दिनों के उपचार के बाद सुधार आया। डाक्टर ने मोहित को बताया कि इनकी ओवरी कमजोर हो गई है। अपने रिस्क पर संतान पैदा कर सकते हो, लेकिन दूसरे की चाहत तुम्हारी पत्नी की जान का खतरा बन जायेगी। घर के हर मैम्बर को वंश की चिन्ता सता रही थी। ससुराल में मोहित की पत्नी शशि सब रिश्तेदारों के बीच बैठती तो अपने बड़े-बुजुर्गों के इन्डायरेक्टली बातों से समझ जाती कि ये व्यंग्य वाण उसी की तरफ चल रहे हैं। लेकिन शशि जानबूझ कर इन बातों को नज़र अन्दाज कर जाती।

शशि के सास-ससुर बीच में टोक देते, इससे लोगों की बात का ट्रैक चेंज हो जाता। लेकिन रात मे शशि अपने पति से दिन भर की बात शेयर करती थी। मोहित भी उसे इन लोगों की बातें दिल पर न ले जाने की सलाह देता। ये बात तो सब जानते हैं कि प्रभु की मर्जी के खिलाफ तो पत्ता भी नहीं हिलता, फिर इंसान का क्या वश है। आज घर में जश्न जैसा माहौल था, मोहित के मम्मी-पापा की शादी की 40वीं सालगिरह थी। शाम को परिवार के सभी लोग इकट्ठा होकर मम्मी-पापा को लम्बी आयु की दुआ करने के साथ-साथ शशि के गोद भरने की दुआ देना भी नहीं भूलते थे। रात को सब लोग डिनर कर रहे थे कि शशि का जी मचलने लगा। मोहित की बड़ी बहन अपनी भाभी के पास भागकर पहुंची, पीठ सहलाते हुये उसने अपनी भाभी से पूछा, ‘‘खुशखबरी है क्या।’’ शशि ने शरमाकर ‘हां’ में सिर हिला दिया। घर में सबकी खुशी का ठिकाना न था। आखिर मोहित घर का अकेला चिराग जो था। 

परिवार के लोगों को औलाद से ज्यादा वंश चलने की फिक्र खाये जा रही थी। धीरे-धीरे वक्त गुजर गया, शशि को प्रसव पीड़ा हो रही थी। मोहित की मम्मी और बड़ी बहन शशि को लेकर अस्पताल पहुंच गये। रात को आठ बजे शशि ने एक सुन्दर सी कन्या को जन्म दिया। मोहित की बहन का तो चेहरा ही उतर गया। यह बात उसने अपनी मम्मी-पापा को बताई, लेकिन उनके माथे पर आई शिकन गवाह थी कि उन्हें कन्या की आमद अच्छी नहीं लगी। लड़की पैदा होने की खबर फोन पर मोहित को उसकी बहन ने दे दी थी। शाम को मोहित ऑफिस से सीधे अस्पताल पंहुचे तो देखा, सभी के चेहरे उडे़ हुये थे। मम्मी-पापा ने उसे देखकर मुंह फेर लिया, वो मम्मी-पापा जो लिंग भेद में यकीन नहीं करते थे। अन्दर जाकर मोहित ने शशि के सिर पर हाथ रखा, शशि की आंख में आंसू थे। मोहित ने शशि के आंसू पोंछते हुये कहा, ‘‘शशि जो आभूषण जिस्म की शोभा बढ़ाये, लेकिन दुख दे क्या उसे पहनना चाहिये।’’ शशि ने ‘ना’ में सिर हिलाया। मोहित ने आगे बढ़कर अपनी बेटी का माथा चूमा और कहा शशि इसे चूमने के बाद मुझे अहसास हुआ कि मेरी बेटी मेरा नाम जरूर रोशन करेगी।

मोहित की इन बातों से शशि को आत्म शक्ति मिल रही थी। अस्पताल से घर आने के बाद कुछ दिन तक तो सब सामान्य रहा, क्योंकि शशि सोबर में थी। बच्ची के नामकरण संस्कार में चंद रिश्तेदार ही शामिल हुये थे। बिटिया का नाम खुद मोहित ने श्वेता रखा था। कुछ दिन बाद घर का काम-काज नियमित तरीके से शशि करने लगी थी। मोहित ऑफिस चला जाता, उसके बाद घर का हर छोटे से बड़ा काम शशि करती थी, लेकिन इस दौरान उसकी नन्ही बिटिया पालने में पड़ी रोती रहती थी। उसके रोने की आवाज सुनकर भी घर के लोग अनसुना कर देते थे। शशि का कलेजा अपनी दुधमुंही बच्ची के रोने की आवाज से मुंह को आ जाता था। बच्ची को स्तनपान ना करा पाने की वजह से शशि के स्तनों में कसाव सा महसूस होता था। 

कई बार ऐसा भी हुआ है कि बच्ची रोते-रोते सो भी गई। जब काम से शशि को फुर्सत मिलती तब शशि उसे गोद में लेकर दूध पिलाती। रोज की इस दिन चर्या की नन्ही बिटिया भी अभ्यस्त हो गई थी। जैसे-जैसे श्वेता बड़ी होती गई, उसे भी लगने लगा कि मम्मी-पापा के उपेक्षित होने की वजह वो है। जब कभी भी उसे पढ़ाई में प्रथम स्थान मिला तो सिर्फ मां-बाप के अलावा उसे किसी का आर्शीवाद नहीं मिला। उसके खून में शशि और मोहित केे संस्कार रचे-बसे थे। कभी किसी मोड़ पर शशि उदास होती तो श्वेता अपनी मां से कहती मम्मी एक दिन देखना मैं बड़ी होकर सबके सवालों का जबाव खुद  बन जाउंगी। मम्मा आपने और पापा ने कभी मुझे महसूस नहीं होने दिया कि बेटे और बेटी में कोई अन्तर भी होता है और आज घर का कोई ऐसा रिश्तेदार नहीं था, जो श्वेता को प्यार और दुलार न दे रहा हो। जिसके लिये श्वेता को अपनी उम्र के 30 साल तक इन्तजार करना पड़ा था।



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