आधुनिकता की चकाचौंध में संस्कारों का "अन्तिम-संस्कार"
| Rainbow News - Apr 13 2019 5:55PM

विश्व में भारत एकमात्र ऐसा देश है जहाँ सभी धर्मो को मानने वाले लोगों का बसेरा है एवं सभी जातियों व संप्रदायों के अनुयायी यहाँ निवासरत है। भारत देश प्राचीनकाल में 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था क्योंकि यहाँ पर निवासरत समस्त लोगो में एकता और एकजुटता के प्रमुख गुण सहजता से मिलते थे। लोगो के लिये उनके संस्कार और संस्कृति व सभ्यता सबसे महत्वपूर्ण और सबसे जरूरी थे। उस समय लोगों में सामजिकता और सामंजस्यता के बड़े अद्भुत नजारें देखने को मिलतें थे। उस समय की लोगों के मन में दया, प्रेम एवं परोपकार के भाव बड़ी ख़ूबसूरती से विद्यमान होते थे।

-शिवांकित तिवारी 'शिवा'

सभी एकजुट होकर एक दूसरे की मदद के लिये तत्परता से आगे आते थे। लेकिन आज आधुनिकता की इस चकाचौंध भरी दुनिया में हम अपनी संस्कृति,सभ्यता और संस्कारों का अन्तिम संस्कार कर रहे है यानि की हम अपनी प्राचीनतम कला एवं साहित्य के साथ-साथ सारे संस्कारों को दरकिनार कर रहे है और इसे आधुनिकता रूपी आईने से देख रहे है जो कि हमारे संस्कारो को गर्त में पहुँचा रहा है। आज के इस आधुनिकता भरे दौर में हम अपने शिष्टाचार एवं नैतिक मूल्यों को भूलते जा रहे है जो कि हमारे जीवन की सबसे अहम चीजें है जिनसे हमारे व्यक्तित्व और संस्कारों का पता चलाता है और समाज में हमारी एक विशेष छवि निर्मित होती है।

आज के इस आधुनिकतम युग में अगर युवा पीढ़ी की बात करे तो वह सिर्फ और सिर्फ दिखावटी मुखौटे को ओढ़े हुये है उसे न तो संस्कार और सभ्यता की फिकर है  और न ही ज्ञान है वह तो बस अपनी निजी ज़िन्दगी में पूरी तल्लीनता से धुत्त है। वह न तो संस्कारों का ज्ञान लेना चाहता है और न ही अपने जीवन में अपनाना चाहता है, वह अपने जीवन में नैतिकता और शिष्टाचार को भी स्थान नहीं देना चाहता क्योंकि उसे इन चीजों के लिये समय ही नहीं है और उसे इन चीजों की कभी जरूरत भी महसूस नही होती क्योंकि न ही उसने प्राचीनतम इतिहास को पढ़ा है और न ही उसे इतिहास को पढ़ने या दोहराने का समय है।

युवा पीढ़ी सिर्फ इस वहम में जी रही है कि इस आधुनिकता भरे दौर में जो कुछ चल रहा है बस यहीं तक ही जीवन है और यहीं सब कुछ खत्म हो जाता है न अब इसके आगे कुछ नया जानना है और न ही इसके पीछे के प्रचीनतम इतिहास को दोहराना है। बस उनकी समस्या यहीं है की वह जिज्ञासु प्रवृत्ति को नहीं अपना रहे है और न ही वो कुछ जानने के लिये सीमाओं को पार करना चाहते है उन्हें यह लगता है की इस आधुनिकता भरे दौर में जो कुछ जैसा चल रहा है वह पर्याप्त है और यहीं विशेष कारण है कि आज बड़ी तेजी से नैतिकता और शिष्टाचार के साथ-साथ संस्कार,संस्कृति व सभ्यता का बड़ी तेजी से पतन हो रहा है।

अगर इस आधुनिकतम दौर मे युवा पीढ़ी ने संस्कार और संस्कृति व सभ्यता को भुलाया तो वह बस अंग्रेजी नव वर्ष दारू पीकर तो मनाते रह जायेगे लेकिन हिन्दी नव वर्ष की ओर न ही उनका कभी ध्यान जायेगा और न ही उनमें ऐसी जागरुकता होगी कि वह इसमें फर्क ढूँढ पाये। बस यहीं संस्कारों का फर्क है अगर आधुनिकता में इनका बीजारोपण युवा पीढ़ी में न किया गया तो देश की प्रगति,संस्कृति और सभ्यता का विनाश तय है।



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