हिमाचल प्रदेश के खुशहाल नौनिहाल और समृद्ध वृद्ध
| -Surendra Kumar - Apr 15 2019 6:03PM

हिमाचल प्रदेश के अस्तित्व और विकास में डॉक्टर यशवंत सिंह परमार का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है। यह डॉक्टर परमार की कर्तव्य निष्ठा और कर्तव्य परायण्ता का ही प्रतिफल था कि 15 अप्रैल 1948 को इस दूरगामी पहाड़ी राज्य हिमाचल को अपनी एक पृथक पहचान मिल पाई। पहाड़ी लोगों के वर्षों के शांति पूर्ण संघर्ष और तात्कालिक चीफ एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य सचिव श्रीमान यशवंत के राजनीतिक रसूक ने आखिर 30 पहाड़ी रियासतों को भारत का एक 39;ग39; श्रेणी राज्य का दर्जा दिलाने मे महारत हासिल कर ही ली। वक्त के साथ यहाँ परिस्थितियाँ कुछ ऐसे परिवर्तित हुई कि 25 जनवरी 1971 को हिमाचल के लोगों की आशाएँ व आकांक्षाएं इसे पूर्ण राज्य बनाने में कामयाब हो गई। तब से अब तक राज्यवासियों की कड़ी मेहनत हिमाचल को खुशहाली की राह पर निरंतर अग्रसर होने को विवश कर रही है।

देवभूमि हिमाचल में देवी-देवताओं, प्राकृतिक सौंदर्य और सादगी के अलावा भी बहुत सी ऐसी शक्तियाँ हैं जो राज्य को देशभर में अव्वल दर्जा दिलाती है। वर्ष 1951 की जनगणना के अनुसार जिस हिमाचल की जनसंख्या 23,85,981 थी। वर्ष 2011 तक पहुंचाते-पहुँचते वह बढ़कर 68,64,602 हो गई। बावजूद इसके हमारी जनसंख्या पूर्ण नियंत्रण में है। जिस राज्य की दशकीय जनसंख्या वृद्धि एक समय 23.71 फीसदी की दर से सरपट दौड़ती प्रतीत हो रही थी। वर्ष 2011 तक वह दर 12.90 फीसदी तक सिमट गई है। इसलिए हिमाचल की गणना आज भारत के प्रमुख जनसंख्या नियंत्रक राज्यों में की जाती है। अनुकूलित जनसंख्या, अपार प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण हिमाचल का लिंगानुपात भी दूसरे राज्यों से काफी बेहतर स्थिति में है। यहाँ प्रति हजार पुरुष पर 973 महिलाएँ जीवन बसर कर रही हैं। जो आस्था की वाहक देवभूमि के मेहनती एवं ईमानदार लोगों को सुखद अनुभूति का एहसास करवाता है।

पड़ोसी राज्य पंजाब, हरियाणा, दिल्ली में आज भी लड़कियों का जन्म के समय ही गला घोटा जाता है। जबकि देवभूमि हिमाचल में बालिकाओं के जन्म पर तरहा तरहा के गीत गाकर खुशियाँ मनाई जाती है। यहाँ आज भी लड़कियों को देवी की तरह पूजा जाता है। परिणामस्वरूप राज्य की संपन्न प्राकृतिक वादियों में समाज का हर वर्ग शांति से अपना जीवन जी रहा है। यहाँ के बच्चों, नौजवानों और बुजुर्गों सभी के लिए राज्य की शासन व्यवस्था बेहतर सुविधाएँ मुहैया करवा रही है। जिनसे प्रदेश का नौनिहाल खुशहाल और बुजुर्ग समृद्ध होता जा रहा है। इस कड़ी में सर्वप्रथम यदि राज्य के नौनिहालों की खुशहाली का जिक्र किया जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। राज्य में 0 से 05 वर्ष तक के बच्चों की शिक्षा और पोषण का बंदोबस्त हमारी आंगनवाडियां कर रही है तथा 05 वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों की निःशुल्क शिक्षा और पोषाहार की व्यवस्था हमारे विद्यालय कर रहे हैं।

फलस्वरूप राज्य के प्राथमिक विद्यालयों का नामांकन दर आज 100 फीसदी के करीब पहुँच चुका है। इतना ही नहीं यहाँ के अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति,अन्य पिछड़ा वर्ग और निर्धनता रेखा से नीचे जीवन बसर करने वाले परिवारों के बच्चों के लिए भी सरकार बारहवीं कक्षा तक की शिक्षा निःशुल्क उपलब्ध करवा रही है। हिमाचल के कई विश्वविद्यालय विभिन्न श्रेणियों के शिक्षार्थियों को उच्च शिक्षा मुफ्त मुहैया करवा रही है। जो अपने आप में एक बड़ी पहल है। इन सहुलियतों के बूते आज राज्य की साक्षरता दर 82.80 फीसदी से ऊपर जा चुकी है तथा वर्ष दर वर्ष बढ़ती ही जा रही है। हमारी शिक्षा व्यवस्था के उदाहरण आज पूरे देश में प्रमुखता से दिए जाते हैं। आज देश के कई दूसरे राज्य हिमाचल की शिक्षा प्रणाली का अनुसरण करने को आतुर हो रहे हैं। इसी प्रकार राज्य के युवा की स्थिति अन्य राज्यों के युवाओं से वर्तमान में कई मायनों में बेहतर है। उनकी शिक्षा प्राप्ति से लेकर जीवन स्तर तक की गुणवत्ता आम देशवासियों से कहीं उच्च है।

इसका एक उदाहरण हम प्रदेश के लोगों की बढ़ती प्रति व्यक्ति आय के रूप में देख रहे हैं। जो आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 की रिपोर्ट के मुताबिक लगभग 1,76,968 रुपये तक जा पहुँची है। जो दर्शाता है कि हिमाचल का आमजन विशेषतः युवा कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को दरकिनार करके अपनी आजीविका को अव्वल पायदान पर पहुंचा रहा है। हिमाचल की प्रति व्यक्ति आय की गणना भारत में प्रमुखता से आँकी जाती है। प्रदेश के नौनिहालों, युवाओं, आमजन के बाद अब यदि राज्य के वृद्धजनों की स्थिति का जिक्र किया जाए तो कहा जाएगा कि हिमाचल का बुजुर्ग वक्त बदलने के साथ साथ आर्थिक रूप से सुदृढ़ व समृद्ध होता जा रहा है। इसकी मुख्य वजह राज्य सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग द्वारा प्रदान की जाने वाली वृद्धावस्था पेंशन है। जिसे राज्य में सत्ताधारी सरकारें समय समय पर बढ़ाती ही रहीं हैं।

वर्तमान में प्रदेश के 60 वर्ष से अधिक उम्र वाले वृद्धजनों को सरकार प्रति माह 850 रुपये तथा 70 वर्ष से अधिक उम्र वाले अति वरिष्ठ नागरिकों को 1500 रुपये मासिक पेंशन प्रदान कर रही है। जो इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। भारत के बुजुर्गों पर इस सरकारी पहल का इतना असर हुआ है कि वे भी अपने राज्य में सामाजिक पेंशन के दायरे को हिमाचल के अनुरूप करने की माँग करने लगे हैं। इसके अलावा राज्य की कम अपराधिक घटनाएँ,कम भ्रष्टाचार, अधिक शौचालयों का इस्तेमाल, तम्बाकू व पॉलिथीन के प्रयोग पर प्रतिबंध इत्यादि साकारात्मक संकेतक भी हिमाचल के विकास में चार चांद लगा रहे हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि हमारे पूर्वजों ने इस पहाड़ी राज्य को बसाने में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। इसलिए हमारा भी यह कर्तव्य बनता है कि हम हिमाचल के विकास में अपना भरपूर योगदान दे। आओ हिमाचल दिवस की 72वीं वर्षगाँठ पर संकल्प लें कि हम अपने प्रदेश को देश का प्रथम राज्य बनाने में हरसंभव प्रयास करेंगे। जय हिमाचल!

-सुरेन्द्र कुमार



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