बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति...
| - Om Prakash Uniyal - Apr 17 2019 2:39PM

बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति वास्तव में चिंताजनक विषय है। फांसी लगाकर, नदी में कूदकर, विषाक्त पदार्थ खाकर, रेल के आगे कूदकर आत्महत्या करना भी बच्चों में आम बात हो गयी है। आखिर बच्चों में यह मनोवृत्ति क्यों पनप रही है। इस पर समाज के साथ-साथ हरेक माता-पिता को गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है? बच्चों का मन बहुत ही संवेदनशील होता है, कल्पनाओं की उड़ान भरने वाला। जरा-सी बात पर पल में नाराजगी या पल में खुशी जाहिर करना उनका स्वभाव होता है।

परीक्षा में कम अंक प्राप्त होने या असफल होने पर, किसी बात को लेकर माता-पिता द्वारा डांट-डपट करने, बच्चों के मन मुताबिक कोई काम न होना, किसी बात को लेकर जिद्द पकड़ लेना, पढ़ाई का दबाव होना,  जैसी छोटी-छोटी बातों को लेकर आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं। वास्तव में हर माता-पिता बच्चों की मानसिकता को एकदम समझने का प्रयास नहीं करते। जिसके कारण बच्चे यही सोचते हैं कि उनकी अनदेखी की जा रही है। या उनकी बात को नकारा जा रहा है। परीक्षा में असफल होने पर या पढ़ाई में कमजोर होने पर भी कई मां-बाप का रवैया बच्चे के प्रति नकारात्मक होता है। उसके मन को चोट पहुंचाने वाली बातें कर डांट-फटकार लगायी जाती है।

कुछ मां-बाप की आदत होती है कि सबके सामने किसी बात को लेकर बच्चे को अनावश्यक रूप से बेइज्जत कर देते हैं। जो कि बच्चे को नागवार गुजरता है। वह खुद को अपमानित महसूस करता है। और आत्महत्या जैसे कदम बिना सोचे-समझे उठा लेता है। बच्चे पर नजर रखें लेकिन उसे डांट न लगाएं, वह भी सबके सामने। माता-पिता बच्चे के दोस्त बनकर रहें। यदि वह जिद्दी स्वभाव का है या अपनी मनमानी करने वाला भी है तो उसे  प्यार से समझाएं। पढ़ाई-लिखाई के मामले में भी ज्यादा दबाव न दें। उसकी रूचि देखें, उससे पूछें कि उसकी दिलचस्पी किसमें है। मां-बाप सबसे बड़ी गलती यह करते हैं कि अति लाड-प्यार में पहले बच्चे को बिगाड़ देते हैं और जब बच्चा अपनी मनमानी पर उतर आता है फिर उसे उलाहना देने लगते हैं।

बच्चा पढ़ाई में कमजोर भी है या परीक्षा में असफल होता है तो चिंता वाली बात नहीं। उसका मनोबल गिराने के बजाय बढ़ाने का प्रयास करें। ताकि उसे बल मिले। भारतीय परिवारों अक्सर एक ही लीक पर चलने या किसी भी बात को लेकर भेड़ चाल चलने की परिपाटी होती है। बच्चे मां-बाप व समाज से ही अच्छा-बुरा सीखते हैं। उन्हें हम नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं लेकिन अपनी नैतिकता की तरफ ध्यान ही नहीं देते। जिसका प्रभाव बच्चे के मन-मस्तिष्क पर पड़ता है। बच्चों में आत्महत्या करने की प्रवृति को रोकने के लिए अपने ही घर से ही शुरुआत करनी होगी। यह एक ऐसी उम्र होती है जिसमें बच्चे सही राह भी पकड़ते हैं और गलत भी। 



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