स्मृति ईरानी : लीक तोड़ने की वजह होनी चाहिए
| - K. P. Singh - Apr 17 2019 3:02PM

राजनीति में पैंतरेबाजी का अभिन्न महत्व है। इस मामले में कोई दूध का धुला नही है। रणनीतिक जरूरतों के लिए कई बार पार्टिया और नेता पटरी से उतर जाते हैं। राजतंत्र में तो यह होता ही था, लोकतंत्र में भी होता है।

दिशा सूचक बिंदुओं की आम सहमति

राजनीति साम-दाम-दण्ड-भेद का खेल है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंदर जब कुछ दिशा सूचक बिंदु स्थापित हो जाते हैं तो उनके लिए सर्व सहमति कायम हो जाती है। भारतीय लोकतंत्र पश्चिमी देशों के लोकतंत्र के प्रतिमानों का पालन करता है। अमेरिका में राष्ट्रपति के मंत्रिमंडल में विभिन्न विभागों के लिए उनके क्षेत्र के विशेषज्ञों को मौका देने की परिपाटी है। दुनियां के हर समझदार देश ने अमेरिका के अनुभव के आधार पर यह मान लिया है कि व्यवस्था की बढ़ती जटिलताओं के बीच लोकप्रिय सरकार में विशेषज्ञ मंत्रियों का होना अनिवार्य तथ्य के रूप में स्थापित हो चुका है।

मंत्रिमंडल में विशेषज्ञों की नियुक्ति की शुरूआत

राजीव गांधी के समय इसकी शुरूआत हुई। वैज्ञानिक राजा रमन्ना आदि को स्थान देकर वीपी सिंह ने भी इसे आगे बढ़ाया जबकि राजीव गांधी और वीपी सिंह के बीच कितना ज्यादा बैर हो गया था यह बताने की जरूरत नही।

इसी बीच नरसिंहा राव प्रधानमंत्री ऐसे दौर में बने जबकि उनकी पूर्ववर्ती चंद्रशेखर सरकार खराब वित्तीय स्थिति के कारण देश का सोना गिरवी रख चुकी थी। उस समय सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि आर्थिक क्षेत्र में देश को कैसे दयनीय हालात से उबारकर बुलंदी पर ले जाया जाये। किसी देश का पायदान उसकी आर्थिक हैसियत के मुताबिक ही तय किया जाने लगा था।

जब राव ने मनमोहन को चुना वित्त मंत्री

नरसिंहा राव ने नौकरशाह रह चुके डा. मनमोहन सिंह का चुनाव अपनी टीम के लिए वित्त मंत्री के रूप में किया। जो दुनियां के चोटी के अर्थशास्त्री के रूप में अपने को साबित कर चुके थे।

अटल ने आगे बढ़ाई परिपाटी

नरसिंहा राव के बाद आईं एचडी देवगोड़ा और इंद्रकुमार गुजराल की सरकारों को संक्रमण काल मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। बाद में जब अटल बिहारी बाजपेयी की पूर्ण कालिक सरकार गठित हुई तो वक्त की जरूरत की इस नीति पर आगे बढ़ते हुए उन्होंने भी यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी, जसवंत सिंह सहित जटिल विभागों में विशेषज्ञ मंत्री बनाये।

जब मनमोहन सिंह ही हो गये प्रधानमंत्री

यूपीए सरकार में सोनिया गांधी ने तो प्रधानमंत्री का ही ताज मनमोहन सिंह के सर पर रख दिया। आर्थिक मंदी के वैश्विक दौर में भारतीय अर्थ व्यवस्था के सुरक्षित बने रहने के रूप में इसके सकारात्मक परिणाम सामने आये। भारत को दुनियां ने इसी समय आर्थिक महाशक्ति के रूप में नवाजा।

उच्च शिक्षा के सैक्टर की अहमियत

महत्वपूर्ण विभागों में विशेषज्ञ मंत्रियों की नियुक्ति का यह सिलसिला क्यों तोड़ा जाये इसके लिए कोई औचित्य होना चाहिए। उच्च शिक्षा भी ऐसे क्षेत्र के रूप में उभर चुका है जो किसी देश का कद बढ़ाने में योगदान करता है। अटल बिहारी बाजपेयी ने इसी के मददेनजर देश की उच्च शिक्षा को वैश्विक मानदंडों के अनुरूप तैयार करने के लिए दिग्गज उद्योगपतियों की बजाज-अंबानी कमेटी का गठन किया था।

स्मृति ईरानी का किस गफलत में उच्च शिक्षा विभाग का दायित्व सौंप दिया गया। निश्चित रूप से यह आपत्ति का विषय है और इसी कारण उनके नामांकन पत्र में इंटर तक ही उनकी शिक्षा का जिक्र आने पर यह विवाद फिर जिंदा हो गया।

संघ के शैक्षणिक विजन से भी नही था ईरानी का संबंध

शिक्षा को लेकर आरएसएस की अलग दृष्टि रही है। भाजपा की सरकार को अपने मातृ संगठन के विचारों के अनुरूप भी इस क्षेत्र के लिए सोचना पड़ सकता है। लेकिन स्मृति ईरानी उनमें से भी नही रहीं कि संघ के शिक्षा संबंधी विजन के प्रस्तोता के रूप में कभी उन्हें पहचाना गया है। ऐसा होता तो उनकी औपचारिक शिक्षा कम होते हुए भी उच्च शिक्षा विभाग के दायित्व को उनके लिए स्वीकार्य किया जा सकता था।

गवर्नेंस में कैजुअल रवैया

संघ या भाजपा में उनकी सेवाएं बहुत पुरानी नहीं हैं। जिसके कारण उन्हें समायोजित करने के लिए लीक तोड़ने की बात समझी जाती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उन्हें मानव संसाधन मंत्री नियुक्त करने का फैसला विशुद्ध रूप से निजी आधार पर था। लेकिन उन्हें इस तरह का जोखिम बिना वजह उठाने से बचाना चाहिए था। विवाद होने पर बाद में उन्हें स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विभाग से मुक्त भी करना पड़ा। लेकिन इससे सरकार चलाने के गुरुतर दायित्व का निर्वहन उनके द्वारा कैजुअल तरीके से करने की धारणा बनी।

उंगलियां उठना लोकतंत्र के जीवंत होने की निशानी

फिर भी इस पर आपत्ति करने वालों को धृष्टतापूर्वक खारिज करना हठधर्मी है। अपनी सरकार के समय गलतियों को भी जायज ठहराने की हठधर्मी कांग्रेसी भी दिखाते रहे हैं। यह रवैया न कांग्रेस के समय उचित था न आज। जिम्मेदारों की गलतियों पर तुरंत उंगली उठाने वाले जागरूक समाज का होना लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त है।



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