सलीम रज़ा की कहानी- आंचल की छांव में 
| - Saleem Raza - Apr 17 2019 3:09PM

कालोनी के अन्दर निर्मला एक ऐसा नाम था, जिसे हर कोई जानता था। जो मृदुल व्यवहार की प्रतिमूरत थी। कालोनी के अन्दर सुबह-सुबह सब की कुशल क्षेम पूछना निर्मला की दिनचर्या बन गई थी। अपने इसी व्यवहार की वजह से निर्मला सब की चहेती थी। उसके जीवन में सारे सुख थे, अगर कोई सुख न था तो वो था संतान का। शादी के 19 साल बाद भी निर्मला संतान सुख से वंचित थी। निर्मला के पति नरेन्दर बिजली दफ्तर में अच्छे पद पर आसीन थे और वो भी निर्मला की तरह मृदुभाषी थे। इसलिए कालोनी के हर एक शख्श को उनसे हमर्ददी थी। कालोनी के छोटे-बड़े सब बच्चे निर्मला को मौसी कहा करते थे। नरेन्द्र के जाने के बाद निर्मला घर के कामों को निपटाने में व्यस्त हो जाती। दोपहर के वक्त कालोनी के छोटे-छोटे बच्चे निर्मला के घर आ जाते थे। 

निर्मला ने एक कमरे में हर छोटा बड़ा बेशकीमती खिलौना सजा रखा था, जिससे दिन भर बच्चे खेला करते थे। शाम को बच्चों के अपने-अपने घर चले जाने के बाद निर्मला बिखरे खिलौनों को करीने से सजाती, इसी काम में उसका दिन कट जाता था। कालोनी के बच्चे निर्मला के इसी दुलार की वजह से मौसी कहकर पुकारते थे। निर्मला को बच्चों के इस उद्बोधन में ही मातृत्व सुख की अनुभूति होती थी। इसी कालोनी में कुछ दिन पहले सिंह साहब के यहां किराये पर भटनागर परिवार रहने आया था। भटनागर जी आयकर विभाग में मुलाजिम थे, जिनके पास दो बच्चे थे मुकुल और विशाल। मुकुल 5 साल का था और विशाल 3 साल का। मिसेज भटनागर के चेहरे से घमंड साफ झलकता था। उन्हें अपने स्टेटस का ख्याल रहता था, इसलिए वो कालोनी में किसी से घुली-मिली नहीं थी।
कालोनी के बच्चों के साथ मिसेज भटनागर का छोटा बेटा भी निर्मला के घर खेलने चला आता था। मिसेज भटनागर के इस व्यवहार की चर्चा कालोनी की हर औरत की ज़ुबान पर थी। मिसेज भटनागर के बारे में तो ये भी बात होती थी कि मिसेज भटनागर तंत्र-मंत्र जादू-टोने में भी यकीन रखती है। इसलिए खुद भी और अपने बच्चों को कहीं भी खिलाने में परहेज करती हैं। इक्कीसवीं सदी के दौर में तंत्र-मंत्र और जादू-टोने की ये सारी बातें दकियानूसी हैं, लेकिन फिर भी तंत्र-मंत्र, जादू-टोने से छुटकारा दिलाने वालों की मण्डी गर्म है। बाकायदा ऐसे लोगों ने बड़े-बड़े साईन बोर्ड लगा रखे हैं। भले ही इसमें सत्यता कुछ भी न हो। निर्मला औरतों की बात सुनकर मुस्कुरा देती, जबकि मिसेज भटनागर का छोटा बेटा विशाल भी कालोनी के बच्चों के साथ निर्मला के घर चला आता था। निर्मला अपने घर आने वाले बच्चों को उनकी मन पसन्द का खाना बनाकर खिलाती। इससे उसके मन को सुखद अनुभूति होती थी। लेकिन उसके इस प्यार को न जाने किसकी नज़र लग गई थी। वृहस्पति वार का दिन था, अपनी आदत के मुताबिक निर्मला ने बच्चों से पूछा, आज वो क्या खायेंगे। बच्चों ने एक साथ कहा, ‘‘मौसी आज हलवा-पूड़ी खायेंगे।’’ 
निर्मला किचन में जाकर बच्चों के पसन्द का खाना बनाने में मशगूल हो गई। थोड़ी देर बाद निर्मला ने बच्चें को आवाज़ देकर बुलाया और सबको हलवा-पूरी परोसी। छोटा होने की वजह से विशाल खा नहीं पा रहा था। निर्मला ने बड़े प्यार से विशाल को अपनी गोद में बिठाकर अपने हाथों से खिलाना शुरू कर दिया। अभी खिला ही रही थी कि अचानक मिसेज भटनागर कमरे में दाखिल हो गईं। अपने बेटे को निर्मला के हाथों खाते देखकर उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। अपना संयम खोते हुये उन्होंने विशाल के नाज़ुक गाल पर थप्पड़ लगाये। मासूम विशाल के मुंह से पूरी का टुकड़ा निकलकर बाहर गिर पड़ा। फिर निर्मला को जो दिल में आया खरी-खोटी सुनाई। निर्मला दमखुद हो गई। साथ ही और बच्चे भी मिसेज भटनागर के व्यवहार से डर गये। इतना ही नहीं चेतावनी देती हुई मिसेज भटनागर विशाल को लगभग घसीटते हुये घर से बाहर चली गई। विशाल का रोना और मिसेज भटनागर के व्यवहार से दुखित निर्मला रोने लगी। 
निर्मला की आंखों में आंसू देखकर बच्चों की आंखें में भी आंसू आ गये। नीचे आ गये आंसुओं को निर्मला अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछने लगी। तभी एक बच्चा आगे बढ़ा और निर्मला के गालों को हाथ में लेकर बोला, ‘‘चुप जाओ मौसी।’’ सहमा हुआ तपन बोला, ‘‘मौसी आपने ऐसा क्या कर दिया कि आन्टी ने आपको बुरा-भला कहा, आपकी तो कोई गलती भी नहीं थी।’’ निर्मला ने दोनों बच्चों को सीने से लगा लिया और ना में सिर हिला दिया। शाम हो चली थी इसलिए बच्चे भी अपने घर जाने लगे। बच्चों के जाने के बाद निर्मला बिखरे हुये खिलौनों को रखने लगी। उसके दिमाग में सिर्फ मिसेज भटनागर के कड़वे असहनीय शब्द गूंज रहे थे। इस उधेड़-बुन में उसे पता ही नहीं चला कि नरेन्दर कब के आकर खड़े हुये है। अचानक घूमकर निर्मला ने देखा तो सामने नरेन्दर को देखकर आंखों से आंसू निकल पड़े। नरेन्दर को समझते देर न लगी कि कुछ अशुभ तो हुआ है। 
निर्मला को सीने से लगाया तो निर्मला फफक कर रोने लगी। नरेन्दर ने निर्मला के चेहरे को अपने हाथों में लेकर पूछा तो निर्मला ने मिसेज भटनागर के अप्रत्याशित हमले और दुव्र्यवहार की बात बताई। निर्मला की बात सुनकर नरेन्दर बोले, ‘‘निर्मला कुछ लोग संकीर्ण दिमाग के होते हैं। इनकी बातों को इतनी गम्भीरता से नहीं लेते।’’ निर्मला ने अपनी मौन सहमति जताई, फिर किचन में जाकर दो कपों में चाय बनाकर ले आई, लेकिन इस दौरान निर्मला खामोश ही रही। नरेन्दर ने भी उसे बीच में नहीं टोका। कपों को उठाकर निर्मला किचन में जाकर शाम का खाना बनाने की तैयारी में लग गई। रात में खाना खाकर निर्मला बैडरूम में जाकर सोने का असफल प्रयास करने लगी। रात गये उसे कब नींद आई पता ही नहीं चला, लेकिन जब आंख खुली तो उसे किसी महिला के रोने की आवाज़ आई। ध्यान देने पर महसूस हुआ कि वो रोने की आवाज़ मिसेज भटनागर की थी। इसी उधेड़-बुन में सुबह हो गई। 
अभी वह उठी ही थी कि डोर बैल बजी। इतनी सुबह तो कोई भी नहीं आता, मन में एक नई आशंका ज़रूर पैदा हो गई। उसने दरवाज़ा खोला तो सामने पड़ोस की कुन्ती बहन खड़ी थीं। उन्हें दरवाज़े पर देखकर निर्मला घबरा गई। कुन्ती को बैठाकर पूछा कि क्या बात है? कुन्ती ने बोला, ‘‘रात से विशाल की तबियत ज़्यादा खराब है।’’ विशाल का नाम सुनकर निर्मला का कलेजा मुंह को आ गया। अपने दिल को संभालती हुई बोली, ‘‘विशाल को क्या हुआ।‘‘ फिर कुन्ती ने कहा, ‘‘यहां से जाने के बाद विशाल को तेज़ बुखार आ गया। उसके बाद देर रात से उसकी हालत ज़्यादा खराब हुयी। बेहोशी की हालत में न जाने क्या-क्या बड़बड़ा रहा है।’’ कुन्ती के जाने के बाद निर्मला ने नरेन्दर को जगाकर सारी बात बताई। नरेन्दर ने ज़्यादा गम्भीरता से न लेते हुये निर्मला को कहा, ‘‘हिम्मत रखो, सब ठीक हो जायेगा।’’ निर्मला ने किचन में जाकर नाश्ता तैयार किया, इतनी देर में नरेन्दर भी तैयार होकर आ गये। दोनों ने नाश्ता किया और नरेन्दर आफिस चले गये। 
इसी कश्मकश में चार दिन गुजर गये, इन दिनों में कालोनी के बाकी बच्चे पहले की तरह बदस्तूर खेलने निर्मला के घर आते रहे। न तो बच्चों ने निर्मला से कुछ कहा और दिल पर पत्थर रखकर न ही निर्मला ने उनसे विशाल के बारे में पूछा। सोमवार का दिन था निर्मला ने विशाल के जल्द स्वस्थ होने के लिये भगवान शिव का उपवास रखा, लेकिन घर आने वाले बच्चों के खाने के लिए दाल-चावल बनाये थे। धीरे-धीरे बच्चों का आना शुरू हो गया। तभी एक बच्चे ने कहा, ‘‘निर्मला मौसी आपको मालूम है कि विशाल की मम्मी आपके बारे में क्या बोल रही थी।’’ निर्मला ने कहा, ‘‘क्या बोल रही थी।’’ बच्चा बोला, ‘‘मौसी वह आपको जादूगरनी बोल रही थी और पता है, कह रही थीं कि आपने हलवे में विशाल को कुछ खिला दिया है। उसी दिन से उसकी हालत खराब है और कह रही थी कि उसके बच्चे तो हैं नहीं, इसलिए जादू टोना करती है। बच्चों तुम कोई उसके घर मत जाया करो।’’ सुनकर निर्मला के दिल में टीस तो हुई, लेकिन उसने बच्चों के सामने कोई जबाब नहीं दिया। 
शाम को नरेन्दर के आने के बाद निर्मला ने उपवास तोड़ा। खाना खाकर निर्मला बोली, ‘‘नरेन्दर! क्या मैं विशाल को देखने उसके घर चली जाऊं।’’ नरेन्दर बोले, ‘‘निर्मला ये काम तो तुम्हें पहले कर लेना चाहिए था।’’ निर्मला ने जबाब दिया, ‘‘मिसेज भटनागर के डर ने मेरे पैर बांध दिये थे।’’ नरेन्दर ने कहा, ‘‘निर्मला तुम निर्दोष हो, भगवान साक्षी है कि तुम अपने घर आने बाले बच्चों को निःस्वार्थ प्यार करती हो। तुम विशाल को देखने जाओ, भगवान तुम्हारे साथ है।’’ अपने पति की सहमति पाकर निर्मला आश्वस्त हुई। दूसरे दिन नरेन्दर के आफिस जाने के बाद निर्मला ने दरवाजा बंद किया और मिसेज भटनागर के घर की तरफ चल पड़ी। अभी घर से चंद कदम ही निकली होंगी कि शिखा मिल गई। शिखा ने पूछा, ‘‘कहां जा रही हो बहन?’’ निर्मला ने बताया, ‘‘विशाल को देखने जा रही हूं।’’ शिखा बोली, ‘‘अच्छी बात है, लेकिन मिसेज भटनागर ने तो तुम्हारा नाम लेकर न जाने क्या-क्या बात कर रही है, फिर भी तुम वहां जाओगी।’’ निर्मला बोली, ‘‘उनका व्यवहार उनके साथ है, उसमें बच्चे की क्या खता है।’’ शिखा बोली, ‘‘ये तो तुम ठीक ही कह रही हो निर्मला, फिर भी चलो मैं तुम्हारे साथ चलती हूं।’’ दोनों मिसेज भटनागर के घर की तरफ चल दीं। 
जैसे ही निर्मला कमरे के अन्दर दाखिल हुई तो मिसेज भटनागर निर्मला के उपर बिफर पड़ी। सामने ही पलंग पर विशाल बेसुध सा पड़ा था। निर्मला ने गिड़गिड़ा कर मिसेज भटनागर से कहा, ‘‘बहन मुझे विशाल को देख लेने दो।’’ तभी तड़पकर मिसेज भटनागर बोलीं, ‘‘बहन कहकर मुझसे रिश्ता जोड़ने की कोशिश मत करना। मैं तुम जैसी मक्कार औरतों को अच्छी तरह से जानती हूं। कुलटा, बांझ मेरे बच्चे को खाकर तू चैन से बैठेगी।’’ निर्मला ने कहा, ‘‘नहीं बहन मेरे प्यार पर लांछन न लगाओ। मैं भले ही मां न बन पाई, इसमें मेरा क्या दोष हैं। विधाता के कानून में मेरा क्या जोर है।’’ मिसेज भटनागर का दिल था कि कोई बात सुनने को राजी नहीं था। लगभग धक्का देते हुये बोलीं, ‘‘मैने सच ही सुना था कि अपनी गोद भरने के लिये तुम जैसी औरत किसी भी हद से गुज़र सकती है। चाहे किसी बच्चे की जान ही क्यों न हो।’’ 
निर्मला ने अपनी सिसकी दबाते हुये कहा, ‘‘बहन अगर जादू-टोने, वलि और गण्डे-तावीज़ों से औरत मां बन जाती तो न जाने कितनी मांयें जवानी से लेकर बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी हैं, कब की मां बन गई होतीं।’’ निर्मला और मिसेज भटनागर के बीच ज़ोर-ज़ोर से हो रहे वार्तालाप की आवाज़ नन्हे विशाल के कानों तक पहुंची उसने आंख खोली तो सामने निर्मला को देखकर कमज़ोर आवाज़ में बोला ‘‘मौसी।’’ मिसेज भटनागर ने पलटते हुये विशाल की तरफ देखकर कहा, ‘‘मेरा बेटा बोला।’’ तब उसके पास जाकर बोलीं, ‘‘फिर से बोल मेरे लाल क्या कहा।’’ विशाल ने फिर दोहराया, ‘‘मौसी।’’ मिसेज भटनागर ने सिर पर हाथ रखते हुये कहा, ‘‘मेरे लाल तेरी मौसी को पापा ने फोन कर दिया है, आने वाली ही होंगी।’’ विशाल ने निर्मला की तरफ इशारा करते हुये कहा, ‘‘मौसी।’’ मिसेज भटनागर हतप्रभ सी कभी विशाल को तो कभी निर्मला को देखती। पलट कर गुस्से में बोली, ‘‘जादूगरनी! तूने मेरे लाल को अपने वश में कर लिया है।’’ तभी विशाल के पिता आगे बढ़कर बोले, ‘‘निष्ठा इतनी निष्ठुर न बनो, हो सकता है कि हम गलतफहमी के शिकार हो रहे हों। 
निर्मला को विशाल के पास आने दो।’’ निष्ठा ने अपनी स्वीकृति तो नहीं दी, लेकिन मना भी नहीं किया। जैसे ही निर्मला विशाल के पास आयी, विशाल ने अपनी बांहें फैला दीं। निर्मला पागलों की तरह से विशाल को चूमने लगी। विशाल को देखकर लग ही नहीं रहा था कि ये बच्चा पांच दिन से बिस्तर पर निढ़ाल पड़ा था। गोद में आते हुये नन्हे विशाल ने कहा, ‘‘मौसी मैं तुम्हारे घर जाऊंगा।’’ निर्मला मौन रही तभी विशाल के पापा बोले, ‘‘हां-हां क्यों नहीं।’’ निर्मला ने विशाल को गोद में ले लिया और कातर नज़रों से निष्ठा की तरफ देखा। करीब आकर निष्ठा बोली, ‘‘चले जाओ बेटा।’’ निर्मला को मानो पंख लग गये हों। फौरन विशाल को लेकर घर आ गई। विशाल बोला, ‘‘मौसी हलवा-पूड़ी नहीं बनाओगी।’’ निर्मला ने आधे रोते और आधे हंसते हुये कहा, ‘‘हां-हां बेटे क्यों नहीं।’’ निर्मला विशाल को लेकर किचन में गई और हलवा-पूरी बनाने लगी। 
थेड़ी ही देर में खाना तैयार करके विशाल को अपने हाथों से खिलाने ही जा रही थी, तब तक विशाल के मम्मी-पापा ने घर के अन्दर प्रवेश किया। अपने मम्मी-पापा को देखकर विशाल निर्मला के सीने से चिपट गया। जैसे ही विशाल के हाथों ने निर्मला के वक्ष स्थल को छुआ, निर्मला को लगा जैसे उसके वक्षों में रेंगन हो रही है। ऐसे जैसे किसी नवजात बच्चे की मां को होती है। निर्मला ने प्यार से विशाल को खाना खिलाया और विशाल की मम्मी की तरफ मुखातिब होते हुये बोली, ‘‘बहन भले ही मैं मां नहीं बनी, ये मेरा दुर्भाग्य है। लेकिन मेरे सीने में भी मां की ममता है। सच मानों इन बच्चों को देखकर लगता है कि मैं इनकी मां हूं।’’ निष्ठा और उसके पति की आंखों में आंसुओं की धार और चेहरे पर पश्चाताप के भाव साफ झलक रहे थे।



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