धार्मिक कथानकों को चुनावी संग्राम में रेखांकित करना दुर्भाग्यपूर्ण
| Dr. Ravindra Arjariya - Apr 17 2019 3:12PM

चुनावी महासंग्राम में मर्यादाओं को तिलांजलि देने की होड लग गई है। कहीं अपशब्दों का प्रयोग तो कहीं मनमाना आचरण किया जा रहा है। अनेक दलों की षडयंत्रकारी योजनाओं का व्यवहारिकस्वरूप सामने आने लगा है। निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों को दर-किनार करके न केवल शब्द बाणों के प्रहार प्रारम्भ हो गये हैं बल्कि व्यक्तिगत आरोपों-प्रत्यारोपों का दौर भी चल निकला है। अली और बजरंगबली जैसे पवित्र नामों का चुनावी सभाओं में खुलकर प्रयोग किया जा रहा है। कहीं फतवा जारी हो रहा है तो कहीं धर्म ग्रन्थों के अंशों की व्याख्यायें की जा रहीं हैं। राजनैतिक प्रतिस्पर्धा में धर्म को घसीटे जाने की अनुमति न तो संवैधानिक व्यवस्था देती है और न ही धार्मिक अनुशासन।

इस विषय पर किसी विशेषज्ञ के विचार जानने का मन हुआ। मुम्बई प्रवास पर होने के कारण यहीं समाधान भी खोजना था। मस्तिष्क में महामण्डलेश्वर उमाकान्तानन्द सरस्वती जी का चेहरा उभर आया। उनकी विश्वस्तर पर वैदिक विज्ञान के विशेषज्ञ के रूप में खासी ख्याति है। सर्वधर्म संसद से लेकर विश्व अध्यात्मिक शोध संस्थानों तक में उनकी हमेशा सम्मानजनक भागीदारी होती है। आदिग्रन्थों के सिद्धान्तों को वर्तमान मान्यताओं की कसौटी पर उतारने के कारण उन्हें अनेक देशों ने विभिन्न उपाधियों से सम्मानित भी किया है। उनसे फोन पर ही चर्चा करने का निर्णय लिया। मारीशस स्थित उनके आश्रम से सम्पर्क किया। संयोगवश उनकी उपस्थिति मुम्बई में थी सो तत्काल मुलाकात का समय निर्धारित कर लिया। निर्धारित समय पर हम जूहू स्थिति टीओसोफीकल के आलीशान परिसर में थे। हमें महामण्डलेश्वर जी के विशेष कक्ष में पहुंचाया गया।

अभिवादन करते ही उनके मुखमंडल पर मुस्कान फैल गई। आत्मीयतापूर्ण प्रत्योत्तर पाकर हमें भी सुखद अनुभूति हुई। हमारे पहुंचते ही उन्होंने अपने कक्ष में मौजूद सभी को एकांत प्रदान करने का इशारा किया। एकांत पाते ही हमने वर्तमान चुनावी जंग के स्वरूप और राजनैतिक दावपेचों में धर्म को घसीटने पर उनके विचार जानने चाहे। राजनीति की शाब्दिक व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि राज में नीति तो होना ही चाहिये। बिना नीति के राज करना, तानाशाही को अवतरित करने जैसा ही है। नीति का अर्थ अनुशासन, मर्यादाओं और सिद्धान्तों के समुच्चय से ही छुपा है परन्तु चुनावी घमासान में न तो राज के लिए नीति का पालन हो रहा है और न ही किसी नीति से राज पाने का प्रयास। नीति को सकारात्मक स्वरूप में लेना पडेगा अन्यथा वह भी षडयंत्र की परिभाषा में विलीन हो जायेगी।

सामाजिक संरचना की सार्वभौमिक मान्यताओं को आज रूढियों का नाम दिया जा रहा है। अनेक स्वयंभू ठेकादार समाज की मानसिकता का ढिढोरा पीटने में जुटे हैं। वोटों के लालच में सिद्धान्त भी वर्गीकरण की भेंट चढ गये हैं। इमाम से लेकर अनेक स्वमान्य संगठनों तक के फतवे जारी होते रहे हैं। उसे उचित ठहराने वाले ही अन्य आराधना पद्धतियों के अनुयायियों के निवेदन को भी सम्प्रदायवाद का नाम देकर कोसने लगते हैं। इस तरह के विभाजनकारी उदघोषों से ही वैमनुष्यता का बीजरोपण होता है। अन्यथा सभी धर्मों ने मानवीयता को सर्वोपरि रखते हुए जीवों के कल्याणकारी कृत्यों को ही मान्यता दी है। विषय का अत्याधिक विस्तार होता देखकर हमने बीच में ही टोकते हुए अली और बजरंगबली जैसे वक्तव्यों को रेखांकित किया।

नवरात्री पर्व के अन्तिम सोपान पर शक्ति उपासना की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि परम्परागत मान्यताओं के अनुसार अली और बजरंगबली दौनों ही शक्ति के प्रतीक हैं परन्तु बजरंगअली का नाम देना कदापि उचित नहीं है। इस शब्द के प्रयोग के पहले वक्ता ने जो भूमिका दी है वह मात्र कानूनी शिकंजे से बचने की चाल है। वास्तव में यह बजरंगबली को अली बनाकर प्रस्तुत करने का प्रयास है जिससे दुश्मन की नली को तोड देने का मंसूबा पाला गया है। बजरंगबली को अली बना देना कलुषित मानसिकता का प्रतीक है। दुर्भाग्यपूर्ण है धार्मिक कथानकों को चुनावी संग्राम में रेखांकित करना। हमने धर्म और राजनीति की एक रूपता को परिभाषित करने का निवेदन किया। धर्म में राजनीति को सिरे से नकारते हुए उन्होंने कहा कि यह विडम्बना है जो धर्म ध्वजा धारण करने वाले भी सामाजिक व्यवस्था को मार्गदर्शन देने के स्थान पर स्वयं अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज करने की इच्छायें पाल लेते हैं और फिर यही लोग धर्म क्षेत्र में भी राजनीति करने लगते हैं।

इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि अतृप्त लोगों की जमात विभिन्न धर्मों की आड में अपनी लालसायें पूरी करने का अवसर तलाश रहीं है। जबकि परम सत्य के मार्ग पर पहुंचते ही भावशून्यता की स्थिति आ जाती है, आनन्द की बयार अन्तहीन झौंकों के साथ सक्रिय हो जाती है और पूर्ण तृप्ति का बोध, किलकारियां करने लगता है। दूसरी ओर राजनीति से धर्म का लोप होता जा रहा है। स्वाधीनता के बाद से निरंतर व्यक्तिवादी विचारधारा को ही पोषित किया जाता रहा है। जनतांत्रिक व्यवस्था में भी व्यक्तिगत निर्णयों को ही थोपा जाता रहा। राजनैतिक परिपक्वता, योग्यता और राष्ट्रवादी दूरदर्शिता के मापदण्डों को हाशिये पर पहुंचा दिया गया है। वंशवाद, परिवारवाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद जैसी अनेक विकृतियों ने दलों का नेतृत्व सम्हालना शुरू कर दिया है।

वास्तविक राजधर्म का अनुपालन करके राष्ट्र को पुनः विश्वगुरू की सर्वमान्य उपाधि दिलाई जा सकती है। चर्चा चल ही रही थी कि कक्ष के द्वार पर हल्की सी दस्तक हुई। उन्होंने आगंतुक को प्रवेश की अनुमति प्रदान की। एक साधक ने प्रवेश करके कुछ अतिविशिष्ट लोगों के पूर्वनिर्धारित समय पर आ जाने की सूचना दी। हमने घड़ी की ओर देखा तो आश्चर्यचकित रह गये। अपने निर्धारित समय से कहीं अधिक वक्त लिया जा चुका था। सो इस विषय पर फिर कभी इस चर्चा करने की अनुमति के साथ अनुमति मांगी। उन्होंने अपनी चिरपरचित मुस्कुराहट के साथ स्वीकृति प्रदान करते हुए प्रसाद प्रदान किया। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।



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