जूता आक्रमण का बढ़ता प्रचलन
| -Rainbow News Feature Desk - Apr 24 2019 3:34PM

लोकसभा चुनाव 2019 के समर में इन दिनों जहां हमारे राजनेता अपने प्रतिद्वंद्वियों पर तीखे राजनीतिक हमले कर रहे हैं वहीं कुछ संकुचित मानसिकता से ग्रसित लोग देश के राजनेताओं पर प्रत्यक्ष वार भी कर रहे हैं। चुनाव लोकसभा के हो, विधानसभा के हो या फिर स्थानीय निकायों के। यहाँ हर बार कुछ ऐसा अप्रत्याशित घट जाता है जिससे हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था शर्मिन्दा होती है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत में चुनावी सभाओं में नेताओं पर सरेआम जूता फेंकना कोई नई बात नहीं है। बल्कि चुनावी घमासान में यहाँ जूता प्रपंच आम होता जा रहा हैं। कभी कभी ऐसा लगता है मानो जूताकांड और चुनावों का संबंध बेहद प्राचीन हो तथा वक्त के साथ यह घनिष्ठ होता जा रहा है। इसके जीवंत उदाहरण हमें विगत कुछ वर्षों से बखूबी देख रहे हैं। वर्ष 2014 के आम चुनावों में देश ने ऐसी अनेको घटनाएँ देखी। जब साधारण जन ने विशिष्ट जन पर अपने जूतो से हमला करने का प्रयास किया।

वैसे तो देश के चुनावी समर में 'मेरा जूता तेरे सिर' वाली युक्ति की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी है। परंतु लोकसभा चुनाव 2014 से यह घिनौना क्रम कुछ ज्यादा ही उग्र रूप धारण कर गया। दरअसल किसी आमसभा में जूता प्रपंच की शुरुआत वर्ष 2009 से ही शुरू हो गई थी। जब भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को मध्यप्रदेश के कटनी में एक आमसभा को संबोधित करने के दौरान चप्पल से हमला किया गया। हालाँकि आरोपी यहाँ अपने निशाने से चूक गया। लेकिन इसका जो संदेश जनमानस में गया उसके मायने हम इन दिनों बखूबी भूगत रहे हैं। कटनी में आरोपी कोई आमजन नहीं बल्कि पार्टी का पूर्व जिला अध्यक्ष पारस अग्रवाल ही था। आरोपी से पूछताछ के दौरान पता चला कि वह राज्य भाजपा में चल रही कथित गुटबाजी का शिकार हुए था। इस करतूत के कुछ दिनों बाद 26 अप्रैल को तात्कालिक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही एक सिर फिरे की भढास के शिकार हो गए। सरदार जी की पगड़ी को उछालने का दुस्साहस गुजरात के बापूनगर में एक कम्प्यूटर इंजीनियर छात्र ने किया। आरोपी हितेश चौहान की जाँच पड़ताल करने पर पता चला कि उसने यह कृत्य अपनी वाह वाही लूटने के लिए किया। 

इसी प्रकार 05 मई 2014 को तात्कालिक भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार श्रीमान नरेन्द्र मोदी पर भी चुनावी सभा में एक युवक ने जूता फेंकने का प्रयास किया। इलाहाबाद के परेड ग्राऊड में जैसे ही मोदी ने बोलना शुरू किया, पास बैठे युवक ने उन पर अपने जूते से वार कर डाला। बाद में बताया गया कि युवक भाजपा से व्यक्तिगत तौर पर नाराज था। जूताकांड की अगली कड़ी में हम पत्रकार जनरैल सिंह का नाम प्रमुखता से पुकार सकते हैं। जनरैल ने इन्हीं चुनावों में तात्कालिक गृहमंत्री पी चिदंबरम के सिर पर अपना जूता साफ करने की कोशिश की। सिख दंगों से प्रभावित पत्रकार ने ऐसी हरकत कांग्रेस पार्टी द्वारा लोकसभा चुनाव में दंगा आरोपी सज्जन कुमार को टिकट देने के विरोध में की। इसलिए आक्रोशित जनरैल ने पार्टी मुख्यालय में प्रेस कांफ्रेंस के दौरान चिदंबरम पर जूता फेंक कर अपनी प्रतिशोध की ज्वाला को शांत करना चाहा। फिर 09 अप्रैल 2016 का दिन आया। 

अब वारी दिल्ली वालों के दिल में राज करने वाले केजरीवाल की थी। जो नेता हर वक्त भाजपा और कांग्रेस पर राजनीतिक हमले करता रहता है दिल्ली के वेद प्रकाश ने उसी पर अपने जूते से धावा बोल डाला। अब यदि इस कड़ी में चुनावी घमासान 2019 में अब तक घटित जूताकांड की घटनाओं का जिक्र किया जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस वर्ष का सियासी संग्राम भी इन ओच्छी घटनाओं से अच्छुता नहीं रहा है। अबकी बार बीते 18 अप्रैल को उत्तर प्रदेश में भाजपा के मुख्यालय में जूता प्रपंच का तांडव दिखा। आरोपी शक्ति भार्गव का निशाना इतना सटीक था कि उनका जूता यहाँ सीधे पार्टी प्रवक्ता जेवीएल नरसिम्हा के गाल पर लगा। पुलिस कार्रवाई से पता चला कि आरोपी पेशे से डॉक्टर है तथा उसकी माँ कानपुर में अपना अस्पताल चला रही है। भार्गव ने यह कृत्य अवसादग्रस्तता के चलते कर डाला। जबकि बीते शुक्रवार अरूण गुज्जर के आक्रोश ने सभी हदे लांघ डाली। गुज्जर संकुचित मानसिक ने गुजरात के सरेदवार जिला में पाटीदार अंदोलन के युवा नेता हार्दिक पटेल को सीधे थप्पड ही रसीद कर डाला।

चुनावी रैली को संबोधित कर रहे पटेल को पता ही नही चला कि यह सब कैसे घटित हो गया। आरोपी युवक ने हार्दिक पर आरोप लगाया कि उनके पार्टीदार आंदोलन के दौरान उसका बेटा सख्त बिमार था तथा वह उसे अस्पताल ले जा रहा था। परंतु अंदोलन के चलते वह बेटे का इलाज नहीं कर पाया। तभी से हार्दिक आरोपी अरूण गुज्जर को खटका हुआ था। इसलिए प्रतिशोध स्वरूप उन्होंने पाटीदार नेता को थप्पड जड डाला। भारत की विडंबना देखिए यहाँ एक आम इंसान अपनी व्यक्तिगत बढास निकालने के लिए उच्च पदवी पर आसीन विशिष्ट जन को सहजता से जूता जड देता है। कभी कभी तो भारत का शिक्षित कहलाए जाने वाला युवा अपनी प्रसिद्ध के लिए ऐसी घिनौनी करतूतों को अंजाम दे देता हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि राजनीति के मंच पर जूतों का बढ़ता प्रपंच लोकतांत्रिक व्यवस्था को शर्मसार करता है।

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या जूता फेंकने से हमारी आकांक्षाएं पूर्ण हो जाएगी, क्या जूता फेंकने से देश की राजनीतिक व्यवस्था सुधर जाएगी, क्या नेहरू-गांधी ने ऐसे भारत का सपना देखा था, क्या अपने निजी स्वार्थ के लिए हम किसी भी हद तक गिर सकते हैं। ये कुछ यक्ष प्रश्न हैं जो देशवासियों को बारंबार झकझोर रहे हैं। उक्त घिनौनी घटनाओं में सही जूता फेंकने वाला व्यक्ति है या जूता झेलने वाला कहना मुश्किल है। परंतु इतना तय है कि देश का विकास न तो जूता फेंकने से होगा और न ही जूता खाने से। अतः कहा जाएगा कि हमे अपनी वोट बैंक की राजनीति को छोड़ कर विकास की राजनीति को चुनना होगा तथा साथ ही देश के लोगों को चाहिए कि वे भी अपनी भावनाओं को काबू में रख कर जनसभाओ में शामिल हो। क्योंकि उनकी एक छोटी सी विकृत सोच देश को विश्व में छोटा दिखा सकती है।

रेनबोन्यूज फीचर डेस्क



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