अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ता कानून ‘शिक्षा का अधिकार’
| - Saleem Raza - Apr 27 2019 4:26PM

बच्चे देश का भविष्य होते हैं ये बात सुनते चले आ रहे हैं,लेकिन देश का भविष्य कहे जाने वाले नौनिहाल सरकार के अधूरे संकल्प और दिशाहीनता के चलते खुद बेहाल हैं। हिन्दुस्तान ऐसे बड़े और साधन संपन्न देश में अगर बचपन नकारा सिस्टम और दिशाहीन सरकार की भेंट चढ़ जाये तो फिर कैसे संवरेगा भविष्य और कैसे अपने पैरों पर दौड़ेगा बचपन ? बच्चों के भविष्य को लेकर हर मां-बाप की आंखों में सुनहरे सपने होते है कि उनका बच्चा पढ़-लिखकर एक अच्छा इंसान बने, लेकिन इस सपने को साकार करने के लिए बेहतर शिक्षा बहुत जरूरी है और अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिला पाना हर किसी के बस की बात नहीं है इसके लिए बेहतर शिक्षा और अच्छे स्कूल के साथ मंहगी फीस उनके सपनों को साकार नहीं होने देती है।

 हमारे देश में मध्यमवर्गीय और निम्न मध्यमवर्गीय की संख्या ज्यादा है इसी को देखते हुए सरकार ने गरीब बच्चों को अच्छे स्कूल में शिक्षा दिलाने के मकसद से आज से नौ साल पहले यानि 10 अप्रैल 2010 में शिक्षा के अधिकार का कानून बनाया था। इस कानून के तहत निजी स्कूलों में 25 फीसद गरीब बच्चों को प्रवेश दिलाये जाने और उन्हें पूर्णत्या मुफत शिक्षा दिलाये जाने का प्रावधान है, साथ ही इस कानून में ये भी प्रावधान है कि जो स्कूल ऐसे बच्चों के प्रवेश पर आनाकानी करेगा उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही अमल में लाई जायेगी यहां तक की उनकी मान्यता भी रद्द की जा सकती है। ये कानून उन लोगों के लिए किसी आक्सीजन से कम नहीं है जिनके बच्चों में प्रतिभा और कौशल की कोई कमी नहीं है लेकिन धनाभाव में उनके सपनों को पंख नहीं लग पाते थे। यहां तक तो सरकार की मंशा पर जरा सा भी शक नहीं होता साथ ही सरकार की दूरदर्शिता पर भी दाद देने का मन करता है। अन्ततः सरकार ने 2010 में इस कानून को अमलीजामा पहना दिया। कहा जाने लगा कि सरकार ने इस कानून को लागू करके महान सवतंत्रता सेनानी गोपाल कृष्ण गोखले का सपना साकार करा है।

 दरअसल गोपाल कृष्ण गोखले ने सौ साल पहले इम्पीरिरयल एसेम्बली में बच्चों के शिक्षा के अधिकार की मांग करी थी। उनका ये वो सपना था जिसमें हर भारतीय को अच्छी शिक्षा दिलाने की कोशिश थी। जिससे आज का नौनिहाल अच्छी शिक्षा प्राप्त करके कल का प्रबुद्ध नागरिक बनकर देश की मुख्य धारा में जुड़े। ये बात किसी से भी नहीं छिपी है कि आज भी भारत में शिक्षा व्यवस्था पटरी से उतरी हुई है। हालात ये हैं कि शिक्षा बदहाल और शिक्षा के मंदिर खस्ताहाल हैं फिर कैसे देश का भविष्य बनें नौनिहाल। इसे संयोग कहें या दुर्भाग्य कि देश में शिक्षा के अधिकार अधिनियम को बने 10 वीं साल चल रही है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता हो या शिक्षण संस्थानों की स्वायतता केन्द्र सरकार पर सवालिया निशान जरूर लगाती है। अब हाल ये है कि शिक्षा का अधिकार देने वाली सरकार ही अपनी जिम्मेदारी से बच रही हैं,। 

शिक्षा के अधिकार कानून में 6 साल से लेकर 14 साल तक के बच्चों को मुफत में शिक्षा प्राप्त करने का मौलिक अधिकार दिया गया था , जबकि इस कानून के तहत विकलांग बच्चों की उम्र सीमा 18 साल थी। इस कानून के तहत अनिवार्य और मुफत शिक्षा देकर बच्चों के भविष्य को ही सुनहरा नहीं बनाना था वल्कि देश की जड़ों को भी मजबूत किये जाने का संकल्प नजर आ रहा था। यदि इस कानून का अवलोकन करें तो पायेंगे इसको ड्राफट करने वाली कमेटी सच में देश के उन बच्चों की हितैषी थी जिनके अभिभावक अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में अच्छी शिक्षा तो दिलाने का ख्वाब संजोते हैं लेकिन आर्थिक मजबूरी उनके ख्वाब को चकनाचूर कर देती है।

 शिक्षा के अधिकार कानून में कई ऐसे महत्वपूर्ण बिन्दु हैं जो शिक्षा को स्तरीय बनाने की तरफ इशारा करते हैं। आज जब इस देश में शिक्षा के अघिकार कानून लागू करके ये बताने की कोशिश करी जा रही है कि सरकार ने गोपाल कृष्ण्र गोखले के अधूरे सपने को पूरा करने का काम किया है तो ये सिर्फ एक मिथक साबित हुआ है, हाल ये है कि इन नौ सालों में हमारी सरकार न तो बच्चों को मुफत शिक्षा प्राप्त करने का हक दिला पाई और न ही शिक्षा का स्तर ही बढ़ाने में कामयाब हुई वल्कि दिनों दिन शिक्षा का स्तर तेजी के साथ गिरता चला जा जा रहा है। आज हाल ये है कि राज्य के बहुत सारे प्राथमिक स्कूल ऐसे हैं जिनके भवन या तो गिरासू हैं या फिर जर्जर हाल में है बच्चों को खुले मैदान में शिक्षा दी जा रही है। कहीं शिक्षक ज्यादा और बच्चे कम तो कहीं बच्चे ज्यादा और शिक्षक कम यानि कानून मे बनाये गये पी.टी.आर. छात्र शिक्षक अनुपात की अवहेलना नजर आती है , दूसरी सबसे बड़ी और अहम बात ये है कि प्राथमिक स्कूलों के बच्चों में ज्ञान का अभाव है।

 आज भी देश के कई राज्यों में ऐसे स्कूल हैं जहां न तो पर्याप्त शिक्षक ही हैं साथ ही जरूरी उपयोग की चीजें मसलन पीने का पानी, शौचालय, खेल का मैदान,सीखने के लिए अध्ययन सामग्री भी उपलब्ध नहीं है लेकिन उससे भी ज्यादा शर्मनाक क्या होगा कि बहुत से स्कूल ऐसे भ चल रहे हैं जिनके पास भवन ही नहीं हैं किराये के मकानों में स्कूल चलाये जा रहे हैं। बिजली की सुविधा से भी कई सारे स्कूल वंचित हैं ऐसे में मुफत किताबें और स्कूल ड्रेस की बात करना बेमानी है। जिन स्कूलों में किताबें और ड्रेस मिलती भी है तो देर सवेर जिसे लेकर बच्चों के अभिभावको में असंतोष झलकता है, आलम ये भी रहा है कि सदिर्यों में बच्चों को स्वेटर और दस्ताने भी समय से वितरित नहीं हो पाते हैं। सच्चाई ये है कि देश में तकरीबन 15 लाख सरकारी और निजी स्कूल हैं लेकिन कुछ फीसद स्कूल ही कानून के तय मानको को पूरा करते हैं। 

हमारे देश में शिक्षा की बदहाली के लिए शिक्षको की कमी भी सबसे बड़ा कारण है, आज भी तकरीबन 15 लाख अध्यापकों के पद खाली पड़े है तो वही प्रशिक्षित शिक्षकों का भी अभाव है। देखा जाये तो महज 20 फीसद प्रशिक्षित शिक्षकों के कन्धों पर ही शिाक्षा व्यवस्था को ढ़ोने का काम किया जा रहा है,आलम ये है कि औसतन 50 बच्चों पर एक शिक्षक ही नियुक्त है। इस कानून की बिगड़ी दशा के लिए घनाभाव के साथ सरकार की असंवेदनशीलता का भी बहुत बड़ा हाथ है।आपको जानकर हैरानी होगी कि कैग ने अपनी रिपोर्ट में दर्शाया है कि शिक्षा के अधिकार कानून को धरातल पर चलाने के लिए अलग से बजट का कोई प्रावधान है ही नहीं और 2001-2002 से अमल में आया सर्व शिक्षा अभियान को मिलने वाला बजट को इससे जोड़ दिया गया है। 

ये तो हम आप जानते ही हैं कि सर्वशिक्षा अभियान के लिए बजट भी पर्याप्त नहीं होता था। इस अभियान के लिए 2013-2014 में 26 हजार 608 करोड़ रूपये आवंटित किये गये थे जो 2017-2018 के बजट में घटकर 23 हजार 508 करोड़ रूपये कर दिये गये जब इस पर असंतोष जाहिर किया गया तब 2019 में इसे 26 हजार 129 करोड़ रूपये कर दिया गया था। शिक्षा के लिए केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों की हिस्सेदारी 65-35 की है केन्द्र शिक्षा के लिए 65 फीसद देगा तो राज्य सरकार 35 फीसद खर्च करेंगी लेकिन सोने पे सुहागा केन्द्र ने इसमें कटौती करके इसे 55 फीसद कर दिया उस पर राज्य सरकारें कहती है कि जो पर्याप्त रकम वो केन्द्र को प्रस्तावित करते हैं वो मिलती ही नहीं है। ऐसे में निजी स्कूलों को आर.टी.ई. के तहत दिये जाने वाली रकम धनाभाव के चलते नहीं मिल पाई जिसके चलते उन्होंने आर.टी.ई. के तहत बच्चों के प्रवेश लेने से मना कर दिया है।

 बहरहाल कहने का मतलब ये है कि देश की खुशहाली और तरककी में शिक्षा का बहुत बड़ा योगदान है। भले ही शिक्षा के अधिकार कानून के तहत आर्थिक रूप से कमजोर प्रतिभाशाली बच्चों को मुफत और बेहतर शिक्षा दिलाकर उन्हें देश का प्रवुद्ध नागरिक बनाने की सरकार की मंशा हो, लेकिन नौ साल गुजर जाने के बाद भी ये कानून अपने अधिकारों की लड़ाई में उलझ कर दम तोड़ रहा है। कमोवेश हर राज्य में शिक्षा का ऐसा ही हाल बदहाल है, कहने का मतलब है कि जब इतनी सारी खामियों से गुजर कर शिक्षा का अधिकार कानून चलाया जा रहा है जिसे चलना कम प्रचारित करना ज्यादा कहेंगे। लिहाजा सरकार की तरफ से प्रचारित इस कानून की अब हवा निकल चुकी है, आर्थिक तंगी से जूझ रहा ये कानून अपने शैशव काल में ही बूढ़ा नजर आने लगा है। कहने का मतलब है कि जब आज भी इतनी सारी खामिया है तो शिक्षा और शिक्षा के स्तर की दशा और दिशा तो बिगड़नी ही है।  



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