कुशीनारा से गुज़रते : दर्शन का काव्यरूप
| - Ajay Chandravanshi - Apr 27 2019 5:09PM

              सभ्यता के विकासक्रम में जब मनुष्य ने प्रकृति को समझना शुरू किया, उसके प्रपंचो के बारे में सोचना शुरू किया; सोच की मुख्यतः दो दृष्टियां रही. एक ने प्राकृतिक शक्तियों के पीछे किसी अलौकिक शक्तिं की  कल्पना की और माना कि कोई और है जो इस दुनिया को चलाता है. दूसरे ने माना कि इस दुनिया के होने के पीछे कोई अलौकिक शक्ति नही है, यह दुनिया चल रही है, कोई चलाता नही.इन्ही दोनों विचारधाराओं ने आगे चलकर दर्शन के दो रूप लिये जिन्हें भाववाद और यथार्थवाद कहा गया.
                भाववादी दर्शन चेतना के स्वतन्त्र अस्तित्व को मानती है और पदार्थ को इसका प्रतिफल.इसके अनुसार इस दुनिया के प्रपंचो का परिचालन किसी अलौकिक शक्ति के द्वारा होता है और मनुष्य की नियति किसी और के हांथों में है. इस कल्पित शक्ति को ईश्वर का नाम दिया गया, और फिर उसको खुश रखने के लिए विभिन्न पूजा पद्धति और कर्मकांड का विकास हुआ.इसके प्रतिनिधि के रूप में पुरोहित वर्ग अस्तित्व में आया.बाद में धीरे-धीरे इसने संस्था का रूप लिया जिसे धर्म कहा गया.सभ्यता के शुरुआती दौर में  मनुष्य का इस दर्शन से प्रभावित होना स्वाभाविक था, क्योकि उस समय मनुष्य का तकनीकी ज्ञान बहुत सिमित था और न ही आधुनिक विज्ञान का विकास हुआ था; इसलिए वह प्रकृति के प्रपंचो के रहस्य को समझ नही पाता था और किसी अलौकिक शक्ति की कल्पना करता था.

               यद्यपि वैज्ञानिक ज्ञान के आभाव में मनुष्य जिस समय प्रकृति के रहस्यों को समझ नही पाता था और किसी अलौकिक शक्ति की कल्पना करता था, फिर भी जैसे-जैसे समाज में वर्ग विभाजन शुरू होने लगा, और कुछ लोग बिना श्रम किए श्रमजीवी वर्ग से अधिक सुविधा भोगने लगें, कुछ लोगों को शंका हुई कि इस व्यवस्था के पीछे कोई अलौकिक शक्ति नही है वरन मनुष्य ही है.उनके इंद्रियबोध और जीवनानुभव भी इस ओर इशारा करतें थें कि यह भौतिक दुनिया ही हकीकत है  और मरने के बाद सब समाप्त हो जाता है. इससे उस समय के यथार्थवादी चिंतन का विकास हुआ जिसे लोकायत कहा गया.चार्वाक का मत, सांख्य दर्शन, कपिल, बृहस्पति इसी दर्शन परंपरा के हैं, हालांकि इनके भौतिकवाद की अपनी सीमाएं है, जो उस युग की भी सीमा है. मगर पुरोहितवाद की व्यापकता और सत्ता के साथ उसके गठजोड़ से ये दर्शन के मुख्यधारा नही बन सकें और भाववादी दर्शन ही हावी रहा.यह उस युग की सीमा भी थी.
              बौद्ध दर्शन भारत और विश्व के यथार्थवादी चिंतन परम्परा में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है.अनीश्वरवादी दर्शन को इससे पहले इतनी व्यापक स्वीकृति कभी नही मिला था, न ही किसी ने पुरोहितवाद के समक्ष इतनी समर्थ चुनौती पहले प्रस्तुत किया था .यही कारण है कि बौद्ध धर्म को व्यापक स्वीकृति मिली और विश्व के बहुत बड़े क्षेत्र में इसका प्रसार भी हुआ. यज्ञों में पशुबलि की व्यापकता, अश्पृश्यता के जंजीर में जकड़े शुद्र्वर्ग की दयनीय स्थिति, अवतारवाद, शास्त्रवाद, पुरोहितवाद, भाग्यवाद से तत्कालीन समाज के बहुजनो की स्थिति दयनीय हो गयी थी.मुट्ठीभर लोगों का समाज के संसाधनों पर अधिकार था और वे अपनी इस स्थिति को बनाये रखने के लिए जनता को धर्म का सहारा लेकर भ्रम में रखे हुए थे. ऐसे समय में बुद्ध का आगमन मानवता और मनुष्य के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी.बुद्ध के अहिंसा और करुणा ने मनुष्य मात्र में भेदभाव नही किया और दलित, शोषित जन को सहारा दिया.बुद्ध पहले व्यक्ति थें जिन्होंने प्रखरता से वेद, शास्त्र के प्रमाणिकता और अपौरुषेयता को चुनौती दी और उसे अस्वीकार किया. यह बुद्ध ही थें जिन्होंने कहा "किसी बात को केवल इसलिए मत स्वीकार करो कि यह बात अनुश्रुत है/परंपरागत है/यह हमारे धर्मग्रंथ(पिटक) के अनुकूल है/कहने वाला श्रमण हमारा पूज्य है" (अंगुत्तर निकाय). यानि अपने विवेक से काम लेना चाहिए और अनुभव से यह देखना चाहिए कि यह सही है या गलत. यह बौद्ध दर्शन को तार्किक आधार देता है. बुद्ध ने कहा था "अप्प दीपो भव" अपना दीपक स्वयं बनो. बुद्ध ने इस संसार को परिवर्तनशील और अनित्य माना जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिचायक है. बुद्ध के अनुसार सत्य किसी दूसरी दुनिया में नही बल्कि इसी दुनिया में मिलेगा.बुद्ध का साक्षीभाव भी लौकिकता से ही जोड़ता है. बौद्ध दर्शन के इन विशेषताओं के कारण इसे समाजवाद और मार्क्सवाद के करीब माना जाता है. डॉ भदन्त आनन्द कौशल्यायन ने बहुत पहले (1973 में) 'बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद' नामक पुस्तिका लिखी थी, जो उनके भाषण का लिखित रूप था.इसमें उन्होंने दोनों में समानताओं का जिक्र किया है.राजकिशोर राजन जी भी इसे मार्क्सवाद और समाजवाद का पूर्वज मानते हैं. और हम जानते है कि आज के दलित विमर्श में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है.
             बुद्ध के जीवन और दर्शन से प्रभावित होकर रचनाएँ लिखी जाती रही हैं. मैथलीशरण गुप्त जी की 'यशोधरा' प्रसिद्द है. अज्ञेय की 'असाध्य वीणा' और 'साम्राज्ञी का नैवेद्य दान' चर्चित रही है. आज राजन जी इस पर पूरा संग्रह निकालते हैं तो, वर्तमान संदर्भ में इसका कुछ कारण अवश्य होगा. वे 'अपनी बात' में इसका उल्लेख भी करतें हैं कि बौद्ध धर्म की भीतरी भावना समाजवादी है, और वह आज के मानवता विरोधी औद्योगिकरण का विरोधी है. वे कहतें है कि आज के स्वार्थ सिद्धि पर आधारित व्यापारिक सभ्यता के इस दौर में बुद्ध की सबसे ज्यादा आवश्यकता है. संग्रह के कई कविताओं में भी इस बात के संकेत हैं, जैसे कविता 'अंधत्व', 'शस्त्र और शास्त्र', 'असंगत', 'राजनीति', 'वापसी' में.
               मिथक पर कविता लिखना जोखिम भरा होता है, क्योकि कवि का उद्देश्य पुरानी कहानी सुनाना नही होता, वह मिथकों के माध्यम से वर्तमान की चिंता को व्यक्त करना चाहता है. चूँकि मिथक बहुश्रुत और लोकप्रिय होते हैं, इसलिए कवि को अपनी बात कहने में आसानी होती है.लेकिन इसमें सावधानी की आवश्यकता होती है. यदि कवि की दृष्टि भाववादी होगा तो कविता प्रतिक्रियावादी तक हो सकती है. राजन जी इससे सतर्क हैं, उनकी कविताओं के कथ्य और पात्रों में कहीं भी पुनरुत्थानवाद नही दिखाई देता. दूसरी बात दर्शन को कविता में सहजता से उतारना भी दुष्कर होता है.इसमें कविता के बोझिल हो जाने और पारिभाषिक शब्दों  के भरमार की सम्भावना रहती है. राजन जी यहां पर भी सफल हैं.बुद्ध के जीवन और दर्शन को उन्होंने बेहद आसान शब्दों और लहजे में प्रस्तुत किया है, जिससे उसे पाठक आसानी से समझ जाते हैं.
            बुद्ध की शिक्षाओं में एक महत्त्वपूर्ण बात इस जगत का स्वीकारबोध है.वे कहते हैं सत्य कहीं और नही इसी दुनिया में है, इसलिए सत्य के तलाश के लिए कहीं और जाने की जरूरत नही है.कवि ने कई कविताओं में इसको उल्लेखित किया है- "पृथ्वी से ऊपर नही/पृथ्वी पर ही/है/सम्भावना/मुक्ति आनंद की(दंगश्री), "इसी काया में विद्यमान/जीवन-मरण/और इसी में/पार उतरने की शक्ति भी" (काया), "संसार में रह कर ही/हो सकते ज्ञान से श्रीयुक्त (आज अगर आतें तथागत). और इस सत्य के लिए किसी और के शरण में  जाने की आवश्यकता नही है- " न मेरे, न जाओ किसी अन्य की शरण में/जाओ अपने शरण में" (प्रथम बार), "जैसे मेरा धम्म/जिसे ढूंढा मैंने/ढूंढ सकता कोई भी/ अपना धम्म (दीर्घनख से), "तुम गुरु, शिष्य भी तुम" (शास्ता). और यह भी कि "वह शिष्य क्या/जो गुरु को ढूंढे/शिष्य वह/जिसे गुरु खोजे" (स्वस्ति).
            बुद्ध की एक और महत्वपूर्ण शिक्षा अनित्यवाद है. इस संसार में कुछ भी नित्य नही है, सब कुछ परिवर्तनशील है. हम एक ही नदी में दो बार पैर नही रख सकतें.और इस परिवर्तनशील जगत में वस्तुएं नष्ट नही होती केवल अपना रूप बदलती हैं. इसलिए मृत्यु से क्या भय. बौद्ध दर्शन आत्मा को नही मानता किंतु पुनर्जन्म को मानता है. यहां पुनर्जन्म का अर्थ तत्वों के बिखर कर पुनः संयोजन से है. कवि ने कई कविताओं में इसका जिक्र किया है- "एक फूल, एक पत्ते में भी/नही जान पाए हम/कि मृत्यु अंत नही/होता नवारम्भ/अब तक रेतकण गिनते रहें/स्वर्ग, अमृत, मुक्ति की बाट जोहते रहे" (नवारम्भ), "पत्ता सूखता, झरता/फिर पनपता/जन्म लेता मनुष्य, मरता/पर कभी न होता उसका अंत" (प्रसार), "नही, यहां कुछ भी नष्ट नही होता/एक बूंद जल भी नही/यहां तक कि एक कंकड़ भी नही/हर चीज यहां/बस बदल लेती है रूप" (बीज).
              बुद्ध ने दुनिया को मध्यमार्ग का रास्ता दिखाया ;न अत्यधिक त्याग, न अत्यधिक भोग.यह संतुलित दृष्टि है, दोनों अति नकारात्मक हैं- "भोग से फूटता अहंकार/पर उससे अधिक/घुला रहता /त्याग में अहंकार" (त्याग). अन्य कविताओं में बुद्ध की करुणा, साक्षीभाव, उनके जीवन की प्रेरणादायक घटनाओं को, आसान ढंग से कविताओं में उकेरा गया है.इन सब के साथ-साथ कवि की दृष्टि बराबर वर्तमान में रही है, और वह बुद्ध के माध्यम से वर्तमान से मुठभेड़ करता रहा है.
              राजन जी इस बात को स्वीकार करते हैं कि, बुद्ध जैसे ऐतिहासिक व्यक्तियों के साथ भी कल्पित बातें जुड़ जाती है(सम्भवतः जोड़ भी दी जाती है).वे मानते हैं कि बुद्ध ने  चोरी-छिपे नही अपितु यशोधरा की जानकारी में ही गृहत्याग किया था. वे लिखते हैं "बुद्ध, मृत्यु आदि अथवा भोग से ऊबकर भिक्षु नही बनें. उनके समय शाक्य तथा कोलिय गणराज्यों के मध्य नदी जल के बंटवारे को लेकर अक्सर तनातनी, युद्ध होता रहता था.सिद्धार्थ इस हिंसा के साथ मानव समाज में व्याप्त हिंसा का सदा के लिए अंत चाहते थे".यह सहीं दृष्टि है, किसी भी धर्म और विचारधारा जे उदय के पीछे सामाजिक आर्थिक कारण भी होते हैं. बुद्ध के समय (ईसा पूर्व छठी शताब्दी) परिस्थितियों को इतिहासकारों ने रेखाँकित किया है.डी. एन. झा (प्राचीन भारत) के अनुसार-
           "वेदोत्तर काल में सिक्कों के इस्तेमाल से व्यापार को बहुत बढ़ावा मिला........शहरों का विकास,व्यापार और मौद्रिक अर्थव्यवस्था में अभिवृद्धि हुई.....गाँवो में भी अपनी संपत्ति के सहारे एक नया सामाजिक समूह आगे आ रहा था. ज़मीन का ज्यादातर हिस्सा गहपति कहलाने वाले कृषक भूस्वामियों के हाँथो चला गया......गाँवो और शहरों में एक नया धनाड्य वर्ग के उदय से आर्थिक असमानताएं उत्पन्न हुई जिसके फलस्वरूप कौटुम्बिकता और समानता के कबायली आदर्श और भी कमज़ोर पड़ गयें...... लोगों के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन की नयी विशेषताएं वैदिक कर्मकांड तथा यज्ञ से मेल नही खाती थी. ये यज्ञ और कर्मकांड पशुधन के अंधाधुंध विनाश का हेतु बन गए थे जबकि पशुधन ही हलों से की जाने वाली नई खेती का मुख्य आधार था.वैदिक धार्मिक आचार-व्यवहारों और उदयीमान समूहों के बीच के अंतर्विरोधों के फलस्वरूप ऐसे नये धार्मिक तथा दार्शनिक विचारों की तलाश शुरू हुई जो लोगों के भौतिक जीवन में आये बुनियादी  परिवर्तनों से मेल खातें हो. इस प्रकार छठी सदी ई. पू. में गंगा की घाटी में अनेक नये धार्मिक शिक्षकों का उदय हुआ जो वैदिक धर्म के खिलाफ शिक्षा देने लगे".
इस प्रकार बुद्ध के दर्शन ने बदले परिस्थितियों का समर्थन किया.
               इसमें कोई शक नही कि बौद्ध धर्म यथार्थवादी दर्शन परम्परा की महत्वपूर्ण और विशिष्ट कड़ी है. लेकिन बुद्ध से पहले भी यथार्थवादी दर्शन की धारा रही है. इसे राजन जी 'अपनी बात' में स्वीकार करतें हैं. उन्होंने लिखा है "भारत में जनविरोधी ब्राह्मणवाद और  विश्वामित्र  के जनपक्षधर संस्कृति के बीच वैदिक युग से प्रारंभ हुआ संघर्ष इतिहास के विभिन्न चरणों में क्रमशः विकसित होता रहा, जिसका पूर्ण परिपाक बुद्ध की विचारधारा में हुआ". बुद्ध का दर्शन आज भी शोषित, पीड़ित, दलित, सर्वहारा वर्ग के अधिकारों के लिए संघर्ष में हमारा मददगार है, मगर बुद्ध का दर्शन भी धर्म का रूप ले चुका है, और धर्म के साथ कर्मकांड भी विकसित होते हैं. राजन जी ने भी उल्लेख किया है कि मूर्तिभंजक बुद्ध की आज दुनिया में सर्वाधिक मूर्तियां है. यह भी कि बुद्ध को समझ लेतें तो बौद्ध धर्म पैदा ही नही होता.
           अपने महत्वपूर्ण भौतिकवादी चिंतन के बावजूद भी बौद्ध दर्शन द्वंद्वात्मक भौतिकवाद नही है, इसलिए यह उसका विकल्प नही हो सकता.बुद्ध अपने समय से बंधे थें.औद्योगिक क्रांति से पहले वैज्ञानिक भौतिकवाद की उत्पत्त्ति संभव भी नही थी.इसलिए बौद्ध दर्शन की सीमा बहुत हद तक कविदृष्टि की सीमा बन जाती है. 'एक उदास मित्र के लिए' कविता में कवि कहता है "जैसे-जैसे गाढ़ा होता गया/उसका संसार से प्रेम/वह होता गया उदास/इसकी असारता सोचते". सवाल यह है कि संसार से गाढ़ा होता प्रेम उदासी क्यों पैदा करेगा? यदि मृत्यु के बाद कुछ भी नही बचता तो इस रूपमय संसार से प्रेम नकारात्मक नही हो सकता. हालाँकि कवि खुद 'क्षमा तथागत' कविता में इसका प्रतिवाद करता है "यह जानते हुए भी कि प्रेम से/जन्म होता दुःख का/ मैं मृत्युपर्यन्त चाहता हूँ पड़े रहना प्रेम में". यहां कह सकते हैं कि जिसे चिंतक स्वीकार नही करना चाहता, कवि स्वीकार लेता है.'उत्प्लवर्णा' कविता में कवि कहता है "जिसे समझते दुःख हम/ वह हमारा अज्ञान". यहां निश्चित रूप से कवि की सहानुभूति प्रताड़ित स्त्री के साथ है, मगर इस गरीबी और भूख से मारी दुनिया में उपजा दुःख अज्ञान नही हकीकत है, जिसे इस व्यवस्था में बदलाव लाकर दूर किया जा सकता है.
                 बुद्ध का अस्तित्व चिंतन(अस्तित्व का बोध) महत्वपूर्ण दर्शन है जो हमे प्रकृति से जोड़ता है. बुद्ध एक-एक फूल,पत्ती यहां तक कि खुद को साक्षीभाव (तटस्थता) से देखने को कहते हैं. इस तेज भागती दुनिया में ठहर कर, धैर्य से देखना, जीना सार्थक है.इससे स्वचिन्तन भी होता है, हम खुद को भी तो  कभी देंखें! लेकिन यदि अस्तित्ववाद रहस्यवाद में बदल जाये तो यह यथार्थवादी चिंतन से विचलन ही होगा.प्रकृति के मौन में रहस्य का आरोपण भाववाद है.कवि के कुछ चित्रण ऐसे ही प्रतीत हो रहें हैं "सिर्फ मौन, गहन मौन/वह परम् मौन ही सत्य" (ध्यान), "मौन में घटता/जो अपूर्व होता है(दीर्घनख से), "मौन से होता महामिलन/जब घटता ध्यान" (ध्यान). प्रकृति के प्रपंच यदि ख़ामोशी से घटित हो रहें है तो उसमें किसी परम् मौन की कल्पना रहस्यवाद ही है.
                इस प्रकार देखतें हैं 'कुशीनारा से गुजरते' सार्थक कृति है, जिसमे बुद्ध के जीवन और दर्शन को कवि ने आज के चुनौतियों से जोड़कर, प्रस्तुत किया है.वे अपने प्रयास में सफल लगते हैं. यहाँ मैंने उनके कुछ सीमाओं की चर्चा भी की है, यह मेरी समझ की भी सीमा हो सकती है.. मगर वाद-विवाद-संवाद ही वह रास्ता है जो प्रगतिशील कविता और जीवन दृष्टि का इष्ट है, और बुद्ध भी हमें यही सिखातें हैं.



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