काफी दिलचस्प हैं मप्र में प्रथम चरण के चुनाव
| -Rituparna Dave - Apr 29 2019 11:34AM

देश के चौथे और मध्यप्रदेश के पहले चरण यानी 29 अप्रेल के चुनाव विविधता से भरे लेकिन दिलचस्प हैं। विधानसभा चुनावों में भले ही बहुत कम अंतर से लेकिन सरकार बनाने में कामियाब काँग्रेस के लिए यह खासे मायने रखते हैं। भाजपा भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है। जिन 6 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं सभी विन्ध्य और महाकौशल की हैं। मुख्यमंत्री कमलनाथ और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष राकेश सिंह, दोनों ही महाकौशल से आते हैं ऐसे में उनकी पुरजोर कोशिश होगी कि प्रदर्शन बेहतर हो। सीधी, शहडोल, मंडला, बालाघाट, जबलपुर, छिंदवाड़ा में हो रहे चुनाव कहीं काँटे के तो कहीं रोचक बन गए हैं। 

जबलपुर (सामान्य) में काँटे का मुकाबला है जहाँ 2014 में भी आपस में दो-दो हाथ कर चुके भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह और देश के जाने-माने अधिवक्ता विवेक तन्खा फिर आमने-सामने हैं। तब राकेश सिंह ने विवेक तन्खा को हराया था। भाजपा को 56.34% यानी 5,64,609 मत मिले थे जबकि काँग्रेस को 3,55970 यानी 35.52% मत मिले थे। यूँ तो बीजेपी को 8 चुनावों में जीत मिली है जबकि कांग्रेस 7 चुनाव जीत चुकी है। मौजूदा हालात में जबलपुर लोकसभा की 8 विधानसभा सीटों में 4 बरगी, जबलपुर पूर्व, जबलपुर उत्तर, जबलपुर पश्चिम पर कांग्रेस और 4 पाटन, जबलपुर केण्ट, पनागर, सिहोरा पर बीजेपी का कब्जा है। जबकि 2013 में 6 विधानसभा सीटों पर भाजपा और 2 पर काँग्रेस काबिज थी। जाहिर है इस बार मुकाबला सीधा है लेकिन शहरी मतदाता खामोश है जबकि ग्रामीण इलाकों में पाकिस्तान पर चर्चाएं होती है। यह नतीजों को कितना प्रभावित करेगी नहीं मालूम।  
दूसरी महत्वपूर्ण सीट है सीधी (सामान्य) सीट है जहाँ पिछली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे अजय सिंह राहुल अपना भाग्य आजमा रहे हैं। राहुल का अच्छा खासा प्रभाव है तथा उनके पिता तथा काँग्रेस के कद्दावर नेता रहे स्व. कु.अर्जुन सिंह का इलाका माना जाता है। हाल के विधानसभा चुनाव में चुरहट विधानसभा से अजय सिंह की हार ने सबको चौंका दिया। यहाँ उनका मुकाबला मौजूदा सांसद रीति पाठक से है। हालांकि बीच-बीच में मौजूदा सांसद का विरोध भी दिखा। लेकिन चुनावी बेला में बीते 26 अप्रेल को प्रधानमंत्री ने सीधी में एक बड़ी जनसभा कर भाजपा की राह को आसान करने की कोशिश की है। 2014 में भाजपा की मौजूदा सांसद रीति पाठक ने जीत दर्ज की थी जिन्हें 4 लाख 75 हजार 678 मिले थे। कांग्रेस  के इन्द्रजीत पटेल दूसरे क्रम पर रहे जिन्हें 3 लाख 67 हजार 632 वोट मिले। सीधी की खासियत है कि यहाँ कभी किसी दल का दबदबा नहीं रहा। हालांकि लगातार दो बार यहां से भाजपा जीत चुकी है ऐसे में अब हैट्रिक की कोशिश होगी। अजय सिंह जैसे कद्दावर नेता के चुनाव लड़ने से बहुतों की निगाहें यहाँ हैं। काँग्रेस को चुनौती यह है कि हाल में हुए विधानसभा चुनावों में 8 में से 7 सीटें बीजेपी ने जीती थीं और केवल एक पर काँग्रेस जीत पाई थी। इसमें सीधी, सिहावल, चितरंगी, ब्यौहारी, चुरहट, धौहानी, सिंगरौली, देवसर विधानसभा क्षेत्र हैं।
शहडोल (अनुसूचित जनजाति) संसदीय सीट से पिछली बार भाजपा की विधायक रहीं प्रमिला सिहं अब काँग्रेस उम्मीदवार हैं। वहीं काँग्रेस से 2016 के उपचुनाव में हार का सामना कर चुकीं हिमाद्री सिंह अब भाजपा उम्मीदवार हैं। यकीनन मुकाबला दिलचस्प है और मतदाता दोनों ही दलों के पैराशूट उम्मीदवारों को करीब से जानते हैं। ऐसे में ऊंट किस करवट बैठेगा यह प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं की मेहनत से ज्यादा मतदाताओं के मूड पर निर्भर है क्योंकि शहडोल का मतदाता खामोश कम ऊहोपोह में ज्यादा है। मौजूदा भाजपा सांसद ज्ञान सिंह का टिकट कटना और हिमाद्री को काँग्रेस से भाजपा में एन्ट्री मिलने से पूरा लोकसभा चुनाव एक तरह से यू टर्न जैसी स्थिति में है। भौगोलिक हिसाब से शहडोल,उमरिया,अनूपपुर,कटनी जिले की 8 जिसमें जयसिंहनगर,जैतपुर,मानपुर,बांधवगढ़ में भाजपा जबकि अनूपपुर,कोतमा,पुष्पराजगढ़,बड़वारा में काँग्रेस काबिज है। इसी 23 अप्रेल को राहुल गाँधी की शहडोल के लालपुर हवाई पट्टी पर हुई जनसभा के बाद काँग्रेस उत्साह में जरूर है। लेकिन दोनों ही दलों में जबरदस्त धड़ेबाजी भी कम नहीं है। प्रत्याशियों की अदला बदली पर मतदाता का कैसा रुख रहेगा यह देखना होगा! दलबदल की स्वीकार्यता और पार्टियों के प्रभाव की असल परीक्षा के लिहाज से शहडोल के चुनाव को दिलचस्प माना जा रहा है।
गोंड़वंश की राजधानी रहा मंडला अपनी अलग पहचान के लिए जाना जाता है। मण्डला (अनुसूचित जनजाति) लोकसभा डिण्डोरी और मंडला सहित सिवनी और नरसिंहपुर जिले के कुछ हिस्सों में फैला हुआ है। यहाँ से सबसे ज्यादा 9 बार काँग्रेस 5 बार भाजपा से वह भी फग्गन सिंह कुलस्ते ही जीते हैं। अभी 6 विधानसभा सीटों पर काँग्रेस तो 2 पर भाजपा काबिज है। इस बार मुकाबला मुकाबला फग्गन सिंह कुलस्ते और गोंडवाना पार्टी के राष्ट्रीय संगठन पद को छोड़कर काँग्रेस में आए कमल मरावी के बीच है। 8 विधानसभा सीटों शहपुरा, निवास, लखनादौन, डिण्डौरी, मंडला, गोटेगांव, बिछिया, केवलारी में सिमटा मण्डला सतपुड़ा की पहाड़ियों और वनों से घिरा है। जाहिर है काँग्रेस ने बड़ा दांव खेला है। लेकिन विशुध्द आदिवासी बहुल इस सीट पर मतदाता अलग-अलग क्षेत्रों के है। ऐसे में  खामोशी के बीच सबकी राय बंटी हुई है। नतीजे ही बताएंगे कि ऊंट किस करवट बैठता है। 
मप्र की सबसे चर्चित और हाईप्रोफाइल सीट छिंदवाड़ा (सामान्य) काँग्रेस से लिए अभेद्य रही है। यहाँ पैंतीस सालों से पूर्व केंद्रीय मंत्री और वर्तमान मुख्यमंत्री कमलनाथ जीत दर्ज करवाते आए हैं। बस एक बार सुंदरलाल पटवा से हारे थे। अब मुख्यमंत्री के पुत्र नकुलनाथ लड़ रहे हैं। महाकौशल और विन्ध्य की यह अकेली सीट है जहाँ पर मतदाता खुलकर काँग्रेस के पक्ष में बोल रहा है। यहाँ से भाजपा ने नत्थन शाह को प्रत्याशी बनाया है जो 2013 में जुन्नारदेव सीट से बीजेपी के विधायक चुने गए थे। इसमें सात विधानसभा सीटें है जिसमें से दो सीट सौंसर और पांढुर्णा नागपुर से लगी है जबकि जुन्नारदेव,परासिया, जामई,अमरवाडा और चौरई आदिवासी बहुल हैं। वर्तमान में सभी सीटों पर काँग्रेस का कब्जा है।
वैनगंगा नदी के किनारे दो छोरों में बालाघाट(सामान्य) लोकसभा क्षेत्र फैला हुआ है। खनिज उत्पादन की वजह से खास पहचान वाली बालाघाट-सिवनी लोकसभा सीट पर भाजपा के बागी उम्मीदवार की वजह से मुकाबला रोचक हो गया है। मौजूदा सांसद बोधसिंह भगत का टिकट काटकर ढालसिंह बिसेन को प्रत्याशी बनाया गया जिनका जमकर विरोध हुआ। लेकिन बोधसिंह भगत ने निर्दलीय पर्चा भर दिया। जबकि कांग्रेस ने मधुसिंह भगत को टिकट दिया है जो हाल ही में परसवाड़ा से विधानसभा चुनाव हार चुके हैं। इसमें विधानसभा की 8 सीटें आती हैं जो बैहर, बालाघाट, बरघाट, लांजी, वारसिवनी, सिवनी, पारसवाडा, कटंगी हैं। इनमें 4 पर कांग्रेस, 3 पर भाजपा काबिज है। 1998 में भाजपा ने यहां पर अपना पहला चुनाव जीता और 5 बार से सिलसिला अब तक जारी है। भाजपा की नजर जहां लगातार छठी जीत पर है वहीं काँग्रेस भी पूरे दमखम से जुटी है।  
निश्चित रूप से मप्र में आम चुनाव 2019 का आगाज 6 लोकसभा सीटों से हो रहा है। यह सभी 6 किसी न किसी कारण से विविधताओं से भरी हैं। अब इन पर मतदाता किस तरह से भरोसा जताता है, देखना दिलचस्प होगा। 



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