महबूबा द्वारा की जा रही यासीन की रिहाई की मांग कहाँ तक जायज...?
| Rainbow News - Apr 29 2019 1:09PM

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती जेकेएलएफ के अलगाववादी नेता यासीन मलिक की जेल से रिहाई के लिए गुहार लगा रही है। (शायद धरने पर भी बैठी है।) यह वही अलगाववादी नेता यासीन मलिक है जिस पर 25 जनवरी 1990 में भारतीय वायुसेना कर्मियों पर आतंकी हमले में शामिल होने का आरोप है। इस हमले में वायुसेना के स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना सहित चार वायुसेना कर्मियों की मौत हो 20 गई थी, जबकि 10 वायुसेना कर्मी जख्मी हो गए थे। और भी कई संगीन आरोप हैं इस अलगाववादी मलिक पर।

-डॉ० शिबन कृष्ण रैणा

गौरतलब है कि जेकेएलएफ 1988 से घाटी में सक्रिय है और कई आतंकी गतिविधियों में शामिल रहा है। संगठन ने1994 में हिंसा का रास्ता छोड़ने का दावा किया लेकिन अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा। माना जाता है कि इस संगठन का मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया के अपहरण में भी हाथ रहा है। इस घटना को दिसंबर 1989 में अंजाम दिया गया था। तब मुफ्ती मोहम्मद देश के तत्कालीन गृहमंत्री थे।  माना यह भी जा रहा है कि यासीन मलिक ही 1989 में घाटी से कश्मीरी पंडितों के पलायन का मास्टर-माइंड था और यही पंडितों के नरसंहार के लिए जिम्मेदार था।  

यासीन मलिक पर कश्मीरी अलगाववादियों और आतंकी समूहों की वित्तीय मदद करने के आरोप में बीते दिनों राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने गिरफ्तार किया था। यों बहुत पहले से जेकेएलएफ पर आतंकी गतिविधियों को समर्थन देने का आरोप लगता रहा है।मगर पिछले सरकारें इस संगठन के विरुद्ध कोई ठोस कारवाई करने से कतराती रही। संभवतः वोट बैंक की राजनीति के चलते उसकी हरकतों को नजरअंदाज किया जाता रहा। इसी का यह परिणाम है कि यासीन जैसे नेताओं के हौसले बुलंद होते चले गए।

यासीन पर यह भी आरोप है कि वह देश के पासपोर्ट पर पाकिस्‍तान जाता और वहां पर देश विरोधी गतिविधि‍यों में लिप्‍त रहता था। पिछले दिनों पुलवामा हमले के बाद केंद्र सरकार ने यासीन मलिक समेत सभी अलगाववादी नेताओं की सुरक्षा वापस ले ली थी और एक कड़ा कदम उठाते हुए सरकार ने जेकेएलएफ को भी बैन कर दिया था। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) भी फेमा अधिनियम का उल्‍लंघन करने के मामले में यासीन मलिक के खिलाफ कानूनी कार्यवाही में जुटा हुआ है। यासीन मलिक पर अवैध रूप से 10 हजार अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा रखने का आरोप है।

ऐसे विध्वंसकारी अपराधी और देश विरोधी मानसिकता रखने वाले अलगाववादी नेता के बचाव में वही उतरेगा जिसकी अलगाववादियों के साथ सहानुभूति ही नहीं, सांठगांठ भी हो। अन्यथा महबूबा को बयान देना चाहिए था कि ज्यूडिशरी अपना काम कर रही है, जो फैसला आएगा वह सर माथे।



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