धार्मिक स्थलों पर हमले, धार्मिक उन्माद
| - Om Prakash Uniyal - Apr 29 2019 1:58PM

कहा जाता है 'मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना', यदि इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो यह उक्ति कहीं भी सटीक नहीं बैठती। वही धार्मिक बैर व उन्माद। जो कि आज के आधुनिक युग में भी अपनी जड़ें जमाए हुए है। एक-दूसरे के मजहब में इतनी कटुता हो चुकी है कि सब एक-दूसरे को काटने पर तुले  हुए हैं। बस मौके की इंतजार में रहते हैं। जरा-सी बात पर धर्म बीच में आ टपकता है। जिसका परिणाम हिंसा होता है। धार्मिक-स्थलों पर हमले किए जाते हैं। एक-दूसरे समुदाय के बीच तलवारें खिंच जाती हैं। किसका हाथ होता है इस प्रकार की हरकतें करने के पीछे। चंद लोगों के कारण यह सब होता है। भारत में तो ऐसे लोगों पर राजनीति का हाथ होता है।

भारत की राजनीति का चरित्र तो इस मामले में इतना गिर चुका है कि जिसके बारे में कुछ बखान करना ही व्यर्थ ही है।  उसकी आड़ लेकर ऐसा कुछ किया जाता है कि दो समुदायों के बीच आग लगी रहे। जहां तक धार्मिक-स्थलों पर आक्रमण की बात है तो भारत में इस्लाम की स्थापना के लिए मुस्लिम आक्रमणकारियों ने क्या कुछ  नहीं किया। हिन्दू, जैन मंदिरों और बौद्ध मठों को तोड़ा गया, लूटा गया। अंग्रेजी शासनकाल में भी धार्मिक स्थलों पर कुठाराघात हुआ।

आज, जबकि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है लेकिन यह प्रक्रिया दूसरे रूप में सक्रिय है। कभी चर्च तोड़-फोड़ का शिकार होते हैं तो कभी अन्य धार्मिक स्थलों पर हमले। विदेशों में भी इस प्रकार की घटनाएं घटती रहती हैं। कहीं ग्रेनेड फेंककर तो कहीं नमाज अता करते लोगों पर बंदूकधारियों द्वारा हमला। बीते साल न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में अल-नूर व एक अन्य मस्जिद में गोलीबारी हुई। जिसमें पच्चास के लगभग लोग मारे गए थे।

हाल ही में अमेरिका के कैलीफोर्निया में एक बंदूकधारी ने यहूदी प्रार्थना सभा में गोलीबारी की। इस प्रकार की घटनाएं कहीं भी घटें धार्मिक उन्माद का परिचायक होती हैं। हम यह क्यों भूल जाते हैं  कि हर किसी को अपने-अपने धर्म का अनुपालन हिंसात्कम रूप से नहीं करना चाहिए। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक का भेदभाव नहीं करना चाहिए। हरेक को समान अधिकार है जीने का। हर धर्म यही सिखाता है कि मानव धर्म सबसे बड़ा है। उसका सम्मान करना सीखो। 



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