चुनाव में हिंसा 
| - Om Prakash Uniyal - May 4 2019 1:24PM

हिंसा चाहे किसी प्रकार की हो उसके हमेशा ही दुष्परिणाम निकलते हैं। उसका खामियाजा हमेशा बेकसूरों को ही भुगतना पड़ता है। हिंसक वातावरण बनाने के लिए कोई विशेष भूमिका नहीं रची जाती। समाज के भीतर कुछ असामाजिक तत्व होते हैं जिनका काम हिंसा फैलाना होता है। इस प्रकार के लोग कुछ न कुछ अनर्गल अफवाएं फैलाकर या लोगों को भड़काकर हिंसक वातावरण बनाते हैं। आजकल तो छोटी-छोटी बातों व मुद्दों को लेकर हिंसा का माहौल रचा जाता है।

चुनाव के दौरान छुटपुट हिंसा होना तो साधारण बात होती है। लेकिन जब किसी बात का विरोध उग्र रूप धारण कर लेता है तो वह एक बड़ी हिंसा बन जाता है। जिसमें जनधन की काफी हानि होती है। मतदान के दौरान भी किसी की छोटी-सी गलती या भूल के कारण मतदाता विरोध करने लगते हैं जो कि हिंसक रूप ले लेता है। या विरोधी दल किसी न किसी बहाने को लेकर मुद्दा उछाल देते हैं। चुनावी प्रक्रिया को शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न कराने के लिए सुरक्षा तंत्र का पूरा जाल बिछाया जाता है।

इसके बावजूद भी कुछ मतदान केंद्रों में यदा-कदा हिंसा की घटनाएं घटती हैं तो शासन-प्रशासन पूरी मुस्तैदी से सक्रिय होकर अपनी भूमिका निभाता है। जिससे मतदाताओं के भीतर किसी प्रकार का भय न बैठे और मतदान प्रक्रिया शांतिपूर्वक निबट सके। चुनाव से पूर्व प्रचार के दौरान कभी दो दलों के आपस में भिड़ जाने से माहौल हिंसात्मक हो जाता है। चुनाव प्रक्रिया किसी व्यक्ति विशेष का कार्य नहीं।

यह तो नागरिकों का संवैधानिक अधिकार होता है। जैसाकि, अभी पश्चिम बंगाल में कुछेक जगहों पर मतदान के समय हिंसा की खबरें मिली लेकिन मत-प्रतिशत अच्छा रहा।चुनाव के दौरान अफवाएं फैलाने वालों व भड़काने वालों से बचकर रहना चाहिए। मतदाता ऐसे लोगों को नजरअंदाज करें। हिंसा फैलाने वालों को ऐसा सबक सिखाया जाना चाहिए जिससे भविष्य में सबक ले सकें। 

-ओम प्रकाश उनियाल



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