रण और रणनीति बदलती रही सपा
| Santosh Dev Giri - May 8 2019 1:17PM

17 वीं लोकसभा के लिए होने वाले लोकसभा चुनाव-2019 का लगभग आधा सफर पूरा हो चुका है। सात चरणों में से पांच चरणों का मतदान भी पूरा हो चुका है। बचे तीन चरणों के मतदान होने वाले हैं। यूं तो पूरा चुनाव ही बेहद अहम है, लेकिन पांचवें चरण के बाद संपन्न होने वाला मतदान काफी दिलचस्प और मुकाबले से भरा हुआ हैं जिनकी ओर निगाहें सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष की लगी हुई है। इसमें विपक्ष की बौखलाहट और विचलन भी साफ दिखाई दे रही है। विचलन में सर्वाधिक प्रभावित समाजवादी पार्टी दिखाई दे रही है जो अपनी रण और रणनीति दोनों को पल-पल में बदलने के साथ काफी उलझी हुई भी नजर आ रही है। जिसका असर यह है कि समाजवादी पार्टी को अपनों को भी सहेजने में पसीने छूट जा रहे हैं। अपनों की नाराजगी और उनकी चढ़ी हुई त्योरियां सपा को परेशान किए हुए है। गौर करें तो उत्तर प्रदेश के सर्वाधिक चर्चित संसदीय क्षेत्रों में शुमार वाराणसी सीट जहां से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं, को लेकर समाजवादी पार्टी अपनी रण और रणनीति बदलती रही है। उसे पराजय का बराबर डर सताए जा रहा है। यही कारण रहा है कि वह वाराणसी संसदीय सीट पर ठोस डिसीजन लेने में आज भी विफल रही है। अंततोगत्वा उसे शालिनी यादव पर ही भरोसा करना पड़ा है।

शालिनी यादव पर दांव खेल भले ही सपा ने अपनी खींच मिटाने का प्रयास किया है, लेकिन अब उसे अपनों के ही विरोध से दो चार होना पड़ रहा है। समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता तथा पूर्व सिंचाई एवं लोक निर्माण मंत्री सुरेंद्र सिंह पटेल ने शालिनी यादव को लेकर मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि वह शालिनी यादव का कदापि प्रचार नहीं करेंगे इसके लिए वह शहर छोड़ देंगे दूसरों का प्रचार कर देंगे, लेकिन शालिनी यादव का कदापि प्रचार नहीं करेंगे। सुरेंद्र यादव के चेतावनी का असर यह है कि समाजवादी पार्टी नेतृत्व सहज की स्थिति में आ खड़ा हुआ है। खुद सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव निर्णय लेने में अक्षम साबित हो रहे हैं। लोकसभा चुनाव पूर्व बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन कर इतरा रहे समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव को इस बात का जरा भी ध्यान नहीं रहा होगा कि उन्हें चुनाव के अंतिम क्षणों में भी उम्मीदवार चयन को लेकर उलटफेर करना होगा। गठबंधन के बदौलत केंद्र की सत्ता में पहुंचने के सपने संजोए हुए अखिलेश के अरमानों पर ज्यादातर पानी फेरने का काम बसपा सुप्रीमो ने ही कर डाला है।

राजनीति के रणनीतिकारों की मानें तो समाजवादी पार्टी में लोकसभा चुनाव के ऐन वक्त पर जिस ढंग से समाजवादी पार्टी के सभी दिग्गज नेताओं में शुमार रहे लोगों को एक-एक करते हुए उन्हें नजर अंदाज किया गया वह कभी सपने में उन लोगों ने सोचा नहीं होगा। खुद इस उलटफेर से समाजवादी पार्टी के मुखिया पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी ना केवल हतप्रभ है बल्कि अंदर ही अंदर दु:खी भी है। विवशता यह है कि वह चाहकर भी कुछ कर पाने में लाचार हैं। पुत्र मोह में फंसे मुलायम की लाचारी भी किसी से छुपी हुई नहीं है। गौर करें तो लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के  खाटी नेताओं में शुमार बांदा और मिर्जापुर लोकसभा सीट में से किसी एक सीट से दस्यु ददुआ के अनुज बाल कुमार पटेल, जौनपुर लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के मजबूत आधार स्तंभ जिन्हें जौनपुर में लोग मिनी मुलायम सिंह यादव के नाम से जानते हैं पारसनाथ यादव, मछलीशहर लोकसभा सीट से पूर्व सांसद तूफानी सरोज, चंदौली से पूर्व सांसद रामकिशन, गाजीपुर से ओम प्रकाश सिंह, देश की चर्चित सीटों में शुमार वाराणसी लोकसभा सीट से सुरेंद्र सिंह पटेल के चुनाव लड़ने की पूरी संभावना जताई जा रही थी।

समाजवादी पार्टी और बसपा का गठबंधन होने के बाद भी इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि इन दिग्गज नेताओं को समाजवादी पार्टी गठबंधन के बैनर तले निश्चित ही मैदान में उतारेगी, लेकिन जैसे ही सीटों और उम्मीदवारों के नाम पर सहमति बना एक एक कर गठबंधन के सीटों और उम्मीदवारों के नामों की घोषणा होनी शुरू हुई। वैसे ही एक-एक कर समाजवादी पार्टी के दिग्गजों का किला ना केवल ढहना शुरू हो गया, बल्कि वह भी अपने राजनैतिक कैरियर को संवारने के लिए दूसरे दलों की ओर रुख करना शुरू कर दिए। इनमें समाजवादी पार्टी के ठोस किले में के रूप में शुमार दस्यु ददुआ के अनुज बाल कुमार पटेल तथा उनके बेटे व प्रतापगढ़ के सरा जिला अध्यक्ष राम सिंह ने भी समाजवादी पार्टी से नाता तोड़ लिया है। समाजवादी पार्टी से नाता तोड़ बाल कुमार पटेल ने कांग्रेस का हाथ थाम बांदा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। इसी प्रकार समाजवादी पार्टी गठबंधन ने बलिया लोकसभा सीट से पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह के बेटे नीरज शेखर को किनारे करते हुए सनातन पांडेय को मैदान में उतार दिया है। इससे बलिया में पार्टी उम्मीदवार को लेकर खासकर नीरज शेखर को नजर अंदाज किए जाने को लेकर चंद्रशेखर को मानने वाले लोगों में आक्रोश है। आजमगढ़ लोकसभा सीट से खुद अखिलेश यादव उम्मीदवार हैं जिनके सामने भी कई चुनौतियां हैं। जिन्हें भोजपुरी अभिनेता दिनेश लाल यादव निरहुआ भाजपा की ओर से टक्कर देते नजर आ रहे हैं। इस सीट से मुलायम सिंह यादव 2014 का लोकसभा चुनाव लड़े थे जिन्होंने लोकसभा चुनाव जीतने के बाद पलट कर इधर झांकना भी मुनासिब नहीं समझा। जिसका दर्द यहां के लोगों को आज भी है। बात करें वाराणसी से सटी हुई लोकसभा सीट मिर्जापुर लोकसभा सीट की तो यहां भी गठबंधन दल उम्मीदवार को लेकर मामला अभी भी उलझा हुआ है।

समाजवादी पार्टी ने भले ही गठबंधन के तौर पर पूर्व में घोषित अपने उम्मीदवार उद्योगपति राजेन्द्र श्यामलाल बिंद को किनारे करते हुए जौनपुर जिले की मछलीशहर लोक सभा सीट से भाजपा के सांसद रामचरित्र निषाद जिन्होंने अपना टिकट कटने पर भाजपा छोड़ समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया है को मिर्जापुर लोकसभा सीट से गठबंधन ने उम्मीदवार बना दिया है। लेकिन इतने के बाद भी समाजवादी पार्टी की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। यहां भी समाजवादी पार्टी खेमे में कई गुट बने हुए हैं जो अपनी डफली अपना राग अलाप रहे हैं। जाहिर है इससे पार्टी संगठन का कितना भला होगा यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। मिर्जापुर लोकसभा सीट पर समाजवादी पार्टी में भले ही गठबंधन के तौर पर रामचरित्र निषाद को मैदान में उतार अपनी जीत मान रही है लेकिन टिकट कटने से आहत पूर्व घोषित उम्मीदवार राजेन्द्र एस बिंद अभी भी तलवारें ताने हुए हैं। वह स्थानीय जिला इकाई पर धन उगाही और चुनाव जिताने के नाम पर फॉर्च्यूनर गाड़ी, नगदी का मांगने का आरोप लगाते हुए समाजवादी पार्टी सहित पूरे गठबंधन दल को कटघरे में खड़ा कर दिए हैं। जिस से गठबंधन दल असहज की स्थिति में यहां नजर आ रहा है।

समाजवादी पार्टी की सर्वाधिक बुरी गत वाराणसी संसदीय सीट पर हो रही है जहां प्रत्याशी चयन में उसे पल पल पर अपनी राय और रणनीति बदलनी पड़ी है। अपितु उसे इसका खामियाजा अपनों के विरोध से भी झेलना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के चर्चित संसदीय सीटों में से वाराणसी संसदीय सीट जहां से प्रधानमंत्री सांसद होने के साथ ही साथ 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं। सपा बसपा गठबंधन ने यहां सेे अपना प्रत्याशी शालिनी यादव को बनाया था। बीते 22 अप्रैल को शालिनी यादव को वाराणसी संसदीय सीट से गठबंधन का उम्मीदवार घोषित किया गया था। शालिनी यादव कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे तथा राज्यसभा के पूर्व उपसभापति श्याम लाल यादव की पुत्रवधू हैं। कांग्रेसी से वाराणसी नगर निकाय चुनाव में महापौर उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ वह दूसरे नंबर पर रही हैं। नगर नगर निकाय चुनाव में महापौर पद के लिए चुनाव में मिली पराजय के बाद इनका कांग्रेस से मोहभंग हो गया था। सो इन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लोकसभा चुनाव में वाराणसी संसदीय सीट से देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टक्कर देने का मन तो जरूर बनाया लेकिन ऐन नामांकन के वक्त समाजवादी पार्टी ने गठबंधन उम्मीदवार के तौर पर सेना से बर्खास्त किए गए तेज बहादुर का नामांकन करा सभी को असमंजस में डाल दिया था खुद समाजवादी पार्टी खेमा भी अचंभित दिखलाई दिया है।

हालांकि तेज बहादुर के साथ शालिनी यादव ने भी अपना नामांकन किया इसके पीछे जानकार बताते हैं कि समाजवादी पार्टी ने जानबूझकर ऐसा दांव खेला उसे भय था कि कहीं पर्चा निरस्त हो जाने की स्थिति में वह मैदान से बाहर ना हो जाए तो उसने शालिनी यादव और तेज बहादुर दोनों पर दांव लगाया। उस की आशंका भी सच साबित हुई सेना से बर्खास्त किए गए तेज बहादुर का पर्चा त्रुटि पूर्ण होने के कारण निरस्त कर दिया गया। ऐसी स्थिति में अंततोगत्वा शालिनी यादव को ही समाजवादी पार्टी गठबंधन उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारने के सिवा कोई चारा नहीं बचा। लेकिन अब यहां समाजवादी पार्टी को अपनी रणनीति में भले ही कामयाबी मिल गई है लेकिन अब उसे अपने ही रणबांकुरे से दो चार होना पड़ रहा है। वह यह है कि पूर्व में समाजवादी पार्टी की सरकार में लोक निर्माण एवं सिंचाई राज्य मंत्री रहे वाराणसी निवासी सुरेंद्र सिंह पटेल ने शालिनी यादव के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए किसी भी सूरत में उनका प्रचार ना करने का दो टूक चेतावनी पार्टी नेतृत्व को दे दिया है। उन्होंने कहा है कि वह किसी भी कीमत पर शालिनी यादव का प्रचार कदापि नहीं करेंगे। उन्होंने यहां तक कह दिया है कि वह शालिनी यादव का प्रचार करने की अपेक्षा वाराणसी शहर छोड़ दूसरे शहरों में जाकर पर पार्टी का प्रचार कर लेंगे किंतु शालिनी यादव का प्रचार कदापि नहीं करेंगे उनके इस खड़े चेतावनी भरे संदेश से समाजवादी पार्टी असहज की स्थिति में आ खड़ा हुई है। कहां उसने यह सोच रखा था कि वह गठबंधन के बैनर तले भाजपा उम्मीदवार तथा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टक्कर देगी लेकिन उसे यहां अपनी से ही मिल रही चेतावनी ने घनचक्कर में डाल रखा है। उसके समक्ष एक तरफ कुआं तो एक तरफ खाई की स्थिति साफ दिखाई दे रही है।

.... तो क्या चुनाव बाद ढह जाएगा गठबंधन?

लोकसभा चुनाव के दौरान सपा बसपा के हुए बेमेल गठबंधन को लेकर भले ही लोगों की जुबान पर इसे वक्त का तकाजा बताया जा रहा है। लेकिन बहुतेरे लोग ऐसे भी हैं जो इस गठबंधन को लेकर अभी भी सशंकित हैं उनकी माने तो चुनाव बाद हो ना हो यह गठबंधन टूट कर बिखर भी सकता है।  राजनीतिक जानकारों की माने तो एक भी सांसद न होने के बावजूद भी 5 सांसद वाले मुलायम परिवार को अपनी शर्तों पर झुका अभी तक मायावती ने जो चाहा है वही होता आया है। ऐसे में पूरी समाजवादी पार्टी खुद इसके मुखिया अखिलेश यादव बसपा सुप्रीमो मायावती के इशारों पर नाचते नजर आ रहे हैं। समाजवादी पार्टी के कर्मठ और जुझारू नेताओं में पहचान रखने वाले समाजवादी पार्टी के ऐसे ही एक दिग्गज नेता जो अब पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। वह कहते हैं कि समाजवादी पार्टी मायावती के जेब की पार्टी बन कर रह गई है खुद पार्टी मुखिया अखिलेश यादव स्वयं और स्वविवेक से निर्णय नहीं ले पा रहे हैं उनके सारे निर्णय पर आखरी फैसला मायावती की मुहर लगने के बाद होता है। ऐसे में खाटी समाजवादी कार्यकर्ता नेता अपने आप को उपेक्षित महसूस कर रहा है। 

-संतोष देव गिरि 

9455320722
 



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