यह नेता हैं या राजनीति पर कलंक?
| -Nirmal Rani - May 8 2019 1:25PM

        भारतीय राजनीति का वह दौर भी देश को याद रखना चाहिए जब पंडित जवाहर लाल नेहरू संसद में अच्छे विपक्षी नेता की मौजूदगी को ज़रूरी समझते हुए डा० राम मनोहर लोहिया के लिए संसद में पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करते थे। जब अटल बिहारी वाजपेयी को यह कहना पड़ा कि आज मैं राजीव गांधी की वजह से ही जि़ंदा हूं। जब संसद पर हमले के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने चिंतित होकर प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से उनका कुशलक्षेम पूछा था। राजनीति में शिष्टाचार व नैतिकता के ऐसे अनेक उदाहरण भरे पड़े हैं परंतु राजनीति का वर्तमान दौर $खासतौर पर राजनैतिक दलों व प्रत्याशियों द्वारा किसी भी तरह से चुनाव जीतने की ललक ने उन्हें किस स्तर तक गिरा दिया है शायद देश कभी इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता। आमतौर पर साधारण लोग जिन भाषाओं का इस्तेमाल करने से परहेज़ करते हैं उस तरह की भाषा देश के जि़ मेदार लोगों द्वारा प्रयोग की जा रही है। आज़म $खान जैसे वरिष्ठ नेता जिनसे तमीज़,तहज़ीब व सुसंस्कारों की उ मीद की जाती है तथा जो नवाबों की सरज़मीं रामपुर से संबंध रखते हैं उन्हें अपनी विरोधी महिला उ मीदवार जयाप्रदा की 'अंडरवियर का रंगÓ सार्वजनिक रूप से बताने की ज़रूरत महसूस होने लगी। कितना शर्मनाक है कि अपने विरोधी महिला उ मीदवार पर इस प्रकार की टिप्पणी की जाए। राजनीति में पुरुष नेताओं को सभी राजनैतिक दलों की महिला नेताओं का स मान करना चाहिए तथा उनपर इस प्रकार की ऐसी कोई टिप्पणी नहीं करनी चाहिए जिससे महिलाएं अपमानित महसूस करें। 
        वर्तमान लोकसभा चुनाव निम्रस्तरीय तथा ओछी $िकस्म की टिप्पणीयों से भरा पड़ा है। पूरे देश में जमकर हिंदू-मुसलमान,शमशान-$कब्रिस्तान,भारत-पाकिस्तान,शरणार्थी समस्या जैसे विषयों को लेकर उकसाऊ व भड़काऊ टिप्पणियां की जा रही है। पिछले दिनों भारतीय जनता पार्टी के नेता तथा बेगूसराय से लोकसभा चुनाव लड़ रहे केंद्रीय मंत्री गिरीराज सिंह ने अपने भाषण में मुस्लिम समुदाय की ओर इशारा करते हुए कहा कि-'जो वंदे मातर्म नहीं कह सकता,जो भारत की मातृभूमि की नमन नहीं कर सकता... अरे गिरीराज के तो बाप-दादा रियासिम घाट में गंगा के किनारे मरे। उस भूमि पर $कब्र भी नहीं बनाई। तु हें तो तीन हाथ की जगह भी चाहिए। अगर तुम (वंदे मातर्म) नहीं कर पाओगे तो देश कभी मा$फ नहीं करेगाÓ। हालांकि मुस्लिम समुदाय विरोधी इस टिप्पणी के लिए बेगूसराय के जि़ला निर्वाचन अधिकारी द्वारा गिरीराज सिंह के विरुद्ध आदर्श आचार संहित उल्लंघन का मामला दर्ज कराया गया। पिछले दिनों इसी मामले में गिरीराज ने अदालत में आत्मसमर्पण किया तथा पांच हज़ार रुपये के दो ज़मानती बांड भरने के बाद उन्हें ज़मानत दे दी गई। गिरीराज सिंह पूर्व में राष्ट्रीय जनता दल में रहते हुए अल्पसं यक समुदाय के 'रहबरÓ के रूप में भी अपनी राजनीति कर चुके हैं। परंतु भाजपा में आते ही उनके सुर तथा विचार कुछ ऐसे बदले कि इन दिनों नरेंद्र मोदी तथा भारतीय जनता पार्टी के हर विरोधी को वे पाकिस्तान का वीज़ा दिए जाने के लिए अपनी पहचान बना चुके हैं। 
        राजनीति की मर्यादा आमतौर पर यही सिखाती है कि उस व्यक्ति पर टीका-टिप्पणी बिल्कुल न की जाए जो व्यक्ति अपना जवाब या स$फाई देने के लिए स्वयं मौजूद न हो। $खासातैर पर किसी नेता के मरणोपरांत उस पर आरोप-प्रत्यारोप करने से कोई भी संस्कारी नेता परहेज़ करता है। परंतु पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को भी नहीं ब$ शा। उन्होंने राजीव गांधी को मिस्टर क्लीन के बजाए एक भ्रष्टाचारी नेता बताया। मोदी के इस बयान की सर्वत्र निंदा की जा रही है। भारतीय जनता पार्टी की ही एक प्रत्याशी प्रज्ञा ठाकुर का कथन है कि-'मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के दौरान शहीद हुए एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे को आतंकवादियों ने इसलिए मारा क्योंकि उन्हें मैंने श्राप दिया थाÓ। एक शहीद के लिए किसी चुनाव प्रत्याशी द्वारा इस प्रकार की अपमानजनक टिप्पणी करना भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली बार सुना गया है। हालांकि भारी दबाव के बाद प्रज्ञा ठाकुर को भी अपने इस बयान के लिए मा$फी मांगने पर मजबूर होना पड़ा। उधर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी सर्वोच्च न्यायालय में मा$फी मांगने के बाद ाी अपने सर्वाधिक लोकप्रिय नारे-'चौकीदार चोर हैÓ लगवाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। देश के किसी भी प्रधानमंत्री के विरुद्ध इस प्रकार के लज्जाजनक नारे लगते पहले कभी नहीं सुने गए। 
        इतना ही नहीं बल्कि वर्तमान चुनाव प्रचार के दौरान सोशल मीडिया का भी अत्यधिक दुरुपयोग किया जा रहा है। अनेक झूठी-सच्ची $खबरें तथा मनघड़ंत कहानी-$िकस्से सोशल मीडिया पर वायरल किए जा रहे हैं। किसी भी तरह से स्वयं को राष्ट्रवादी व देशभक्त साबित करने की कोशिश तथा अपने विरोधी को राष्ट्रविरोधी तथा देश के स्वाभिमान को बेच खाने वाला प्रमाणित करने का प्रयास किया जा रहा है। पिछले दिनों हद तो यह हो गई कि दिल्ली की जनता द्वारा लोकतांत्रिक तरी$के से चुने गए मु यमंत्री अरविंद केजरीवाल को एक चुनावी जुलूस के दौरान उनके किसी विरोधी ने थप्पड़ मारने की कोशिश की। इसके पहले भी 'जूता उछाल संस्कृतिÓ के देश की राजनीति में कई बार दर्शन् ाहो चुके हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रकार की हरकतें कर तथा आक्रामक व असंसदीय भाषाओं का इस्तेमाल कर या $फायर ब्रांड सांप्रदायिकतापूर्ण भाषण देकर नेतागण मीडिया में विशेष स्थान हासिल करना चाहते हैं। और अपनी इसी नकारात्मक प्रसिद्धि की चाहत में ही यह लोग तरह-तरह के ऐसे बयान दे डालते हैं जिससे भले ही समाज में व्याकुलता पैदा हो परंतु कम से कम इसके बदले में उन्हें मनचाही शोहरत तो ज़रूर मिल जाती है। हमारे देश में वैसे भी विवाद और शोहरत में परस्पर घना संबंध है। 
        यदि भविष्य में भी राजनैतिक बयानबाजि़यों के गिरते हुए स्तर की यही गति रही तो इस बात का विश्वास किया जाना चाहिए कि शायद कोई भी स मानित,संभ्रांत तथा इज़्ज़तदार परिवार अपने बच्चों को राजनीति में प्रवेश करने के लिए कभी प्रोत्साहित नहीं करेगा। और जब इस प्रकार के गंभीर तथा संस्कारित राजनीति करने वाले लोग राजनीति से अपना मुंह फेर लेंगे तो निश्चित रूप से शेष जगह को भरने के लिए इसी प्रकार के अवांछनीय तत्व तथा $गैर जि़ मेदाराना, भड़काऊ तथा समाज को विभाजित करने वाले लोगों को राजनीति में खुला मैदान मिल जाएगा। उस परिस्थिति में राजनीति की दशा तथा देश की दिशा क्या हो सकती है इस बात का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। भले ही आज हमारे देश का पक्षपाती मीडिया वर्तमान सरकार की तारी$फों के पुल बांधते हुए देश को विश्व का सबसे अग्रणी बनता हुआ देश क्यों न बता रहा हो परंतु ह$की$कत तो यह है कि भारतीय राजनेतआों के बिगड़ते हुए बोलों ने तथा समाज को विभाजित करने वाली उनकी कुटिल चालों ने भारत को पूरी दुनिया में बदनाम कर दिया है। जिस महात्मा गांधी,पंडित जवाहर लाल नेहरू तथा इंदिरा गांधी ने देश के लिए अनेक $कुर्बानियां दीं तथा देश को आगे ले जाने व इसे सुदृढ़ करने के लिए अपना सब-कुछ न्यौछावर कर दिया उन नेताओं के प्रति आज के स्वार्थी,सांप्रदायिक व जातिवादी नेताओं के विचार सुनकर पूरा विश्व हैरान रहता है। हमारे देश में राजनीति में धर्म के खुले हस्तक्षेप से भी विश्व चिंतित रहता है। राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण तथा अपराधियों द्वारा राजनीति पर लगातार किया जा रहा नियंत्रण भी देश व दुनिया के लिए चिंता का विषय है। ऐसे में यह समझ पाना मुश्किल हो गया है कि वास्तव में राजनीति को बदनाम करने वाले ऐसे लोग हमारे देश के नेता हैं या फिर राजनीति पर कलंक?



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