चरित्रहीन
| Rainbow News - May 12 2019 1:46PM

एक अबोध सुबह बिल्कुल निर्दोष सी जो अभी तक दिन भर की कठोर तपिश से अनजान थी। निश्छल मुस्कुराहट के साथ आने वाले दिन का स्वागत कर रही थी। बस ऐसी ही मासूम सुबह में मेरी आंख खुल गई और मैं उठकर लान में आ गई। हरी हरी घास पर नंगे पैर चलना मन में एक सुखद एहसास भर रहा था। गीली मिट्टी की ठंडक पैरों से होकर हृदय तक पहुंच रही थी लेकिन फिर भी मन अशांत था। सोच रही थी कि अभी कितनी कसौटिया पार करनी बाकी है या अभी खुद को कितना साबित करना बाकी है? मैं मानती हूं कि कामकाजी होने के कारण कहीं ना कहीं मुझसे कुछ ना कुछ छूट ही जाता है। कभी घर अनदेखा हो जाता है, कभी पति की ओर ध्यान नहीं दे पाती, कभी रिश्ते नहीं संभलते।

एक पूरा करने के चक्कर में दूसरा कुछ ना कुछ रह जाता है। रवि और मेरी व्यस्तता कभी कभी हमें एक दूसरे से दूर कर देती थी। जानबूझकर नहीं लेकिन काम की अधिकता ऐसा करने पर मजबूर कर देती थी। रवि एक मल्टीनेशनल कंपनी में ऊंचे ओहदे पर थे और मैं एक कॉलेज में प्रोफेसर थी। हम दोनों की ही व्यस्तता बनी रहती थी। शायद इसकी वजह एक यह भी थी कि मैं अभी तक मां नहीं बन पाई थी। उस कमी को पूरा करने के लिए मैं खुद को व्यस्त रखती थी और शायद रवि भी इसी वजह से मुझसे दूर होने लगे थे। यूं तो रवि बहुत हंसमुख और शालीन स्वभाव के थे मगर स्वभाव में एक उद्दंडता भी थी और दिलफेंक आशिक जैसा स्वभाव था, जो अक्सर खूबसूरत महिलाओं को देखते ही झलक जाता था।

"माया, मुझे लेट हो रहा है जल्दी नाश्ता दो। सुबह सुबह ट्रैफिक भी बहुत होता है। एक घंटा पहले निकलो तब कहीं सही समय पर पहुंचता हूं"। रवि ने तैयार होते होते एक ही सांस में सब कह डाला। "हां, लगा दिया है नाश्ता कर लो मैं भी तैयार होने जा रही कॉलेज का समय हो रहा है और टिफिन याद से लेते जाना। टेबल पर रख दिया है"। इतना कहकर मैं भी तैयार होने चली गई। सुबह का समय बहुत व्यस्तता और तनाव भरा होता था। हम दोनों को ही जल्दी रहती थी। मेरे कॉलेज का रास्ता करीब 15 मिनट का था। गाड़ी चलाते-चलाते मैं बीते दिनों में गुम हो गई। जब रवि मुक्ता नाम की औरत के मोह में बंध गए थे। दिन वार याद नहीं लेकिन हम दोनों कृष्ण मंदिर के दर्शन के लिए गए थे। रवि दर्शन करके बैठ गए और मैं परिक्रमा करने लगी। बस यही से मुक्ता नाम की इस महिला से नजर मिली और उसके बाद ही रवि का मंदिर आना जाना बढ़ गया। शुरू शुरू में मैं भी आती थी लेकिन काम की वजह से मैं ने आना बंद कर दिया। रवि अकेले ही निकल जाते थे। मैंने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया। परेशानी तो तब हुई जब उन्होंने कहा कि मैं मुक्ता से शादी कर रहा हूं। मैंने पूछा कि, "मुक्ता कौन है?"  "मेरी दोस्त है, यहीं बनारस में रहती है।" बाद में पूछताछ करने पर पता चला कि वह दो बच्चों की मां है।

सब ने रवि को समझाया कि सही नहीं है किसी दूसरे के घर की बहू है वो, लेकिन रवि के सर पर मुक्ता का भूत सवार था और फिर एक दिन वह दोनों शहर छोड़ कर भाग गए। मुक्ता के घर वाले परेशान हो गए कि आखिर उनकी बहू कहां चली गई? पता करते करते वह मेरे घर तक आ पहुंचे। मैं पहले ही इन परिस्थितियों से परेशान थी और अब यह नयी परेशानी से मैं घबरा गई। पुलिस वालों की पूछताछ से मैं परेशान होने लगी। बाद में रवि और मुक्ता का पता लगा। मुक्ता के घर वालों ने मुक्ता  को डरा धमका कर, डांटकर, समझा बुझाकर घर वापस ले गये। रवि भी घर वापस आ गए थे लेकिन हमारे बीच बातचीत बंद थी। सब जगह थू थू हो रही थी। कुछ बूढ़ी औरतों का कहना कि,  "एक बच्चा जन देती तो यह परेशानी नहीं आती"। कुछ लोग कहते कि, "दिन भर काम में रहकर पति को इग्नोर करती है"। जितने मुंह उतनी बातें। परेशान हो कर कुछ समय बाद रवि ने घर बदल दिया। धीरे-धीरे दिनचर्या फिर से पटरी पर आने लगी और हमारे बीच बातचीत शुरू हो गई थी। हम दोनों साथ-साथ काम पर निकल जाते थे। बीच बीच में एक आध बार फोन पर बात भी हो जाती।

समय ऐसे ही गुजर रहा था। आज संडे था मैंने रवि को फोन किया, रिंग जा रही थी। रवि ने फोन उठा कर कहा, "हेलो", मैंने कहा, "आज जल्दी घर आ जाओ, मूवी जाएंगे और खाना भी बाहर ही खाएंगे। बहुत दिन हो गए कहीं बाहर घूमने नहीं गए।"  रवि ने कहा, " ठीक है, जल्दी आ जाऊंगा, तुम तैयार रहना"। रवि 6:00 बजे के करीब मूवी की टिकट लेते हुए आए।  मैं तैयार ही थी रवि भी फ्रेश होने चले गए। हम दोनों ने मूवी देखा और डिनर लेकर एक पार्क में घूमने लगे। रवि को बच्चों से बहुत लगाव था और उन्हें बच्चे की कमी बहुत अखरती थी। पार्क में एक दंपत्ति अपने बच्चे के साथ खेल रहे थे। रवि बड़े भाव से पिता पुत्र का प्रेम देख रहा था साथ ही मां का वात्सल्य भी देख रहा था। वो मन ही मन कुंठित हो उठा। मैं कुछ नहीं कर सकती थी, मेरे बस में कुछ भी नहीं था। उदास मन से हम दोनों घर वापस आ गए। फिर से हमारी पुरानी दिनचर्या शुरू हो गई। ऐसा नहीं था कि मैंने प्रयास नहीं किया। कई डॉक्टरों को दिखाया, इलाज करवाया लेकिन मेरी गोद अभी तक सूनी थी। मैं खुद भी तड़पती थी अपने बच्चे के लिए लेकिन कुछ बातें अपने हाथ में नहीं होती है। मैंने फिर से अपने आप को काम में खपा लिया और रवि भी काम में बिजी हो गए। रवि कुछ समय से कटे कटे से रहते थे। मुझसे ठीक से बात नहीं करते,  कुछ पूछो तो उल्टा जवाब मिल जाता था। अक्सर चिढ़ जाते थे।

कई बार कहासुनी भी हो जाती थी। मैं तंग आने लगी थी इस माहौल से। बहुत सोच विचार करके एक दिन मैंने कहा, " रवि तुम दूसरी शादी कर लो,  तुम्हारी बच्चे की इच्छा भी पूरी हो जाएगी"। रवि ने मुझे कुछ जवाब नहीं दिया लेकिन घर में सब लोगों से इस बात की चर्चा की। सभी को लगा कि शायद दूसरी शादी होने से बच्चे की समस्या हल हो जाएगी और रवि का मन भी शांत हो जाएगा। फिर लड़की देखने का सिलसिला शुरू हो गया। आखिरकार गोरखपुर की एक लड़की पसंद आ गई। कविता सुंदर थी मगर तलाकशुदा थी। कविता घर के काम में निपुण और घरेलू स्वभाव वाली थी। रवि को भी कविता पसंद आ गई। आखिर में शादी तय हो गई। रवि की शादी के बाद मैं मायके आ गई। दोनों का वैवाहिक जीवन कुछ समय तो बहुत अच्छा बीता लेकिन बाद में दोनों के अहम टकराने लगे और एक दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाने में दिक्कत होने लगी। आखिर में एक वक्त ऐसा भी आया कि दोनों अलग होने का मन बनाने लगे। रवि के तेजतर्रार स्वभाव को कविता सहन नहीं कर पा रही थी। एक दिन वह अपने मायके चली गई। जब वह गई तब वो प्रेग्नेंट थी। रवि उसके संपर्क में बना रहा सिर्फ इसलिए कि बच्चा उससे हासिल कर ले। अलग होने के बाद कोर्ट ने भी कविता के हक में फैसला दिया। रवि फिर निराश हो गया।

आखिर में रवि के पास मेरे पास लौटने के अलावा कोई चारा नहीं था। वह फिर से मुझे मनाने आ गया, "मनु चल न,  तेरे अलावा मुझे कोई नहीं समझ सकता और तेरे सिवा मेरा है ही कौन तू ही तो है जो मुझे समझती है" रवि ने मनु को मनाते हुए कहा। उसकी बातें एकदम खोखली थी लेकिन मैं फिर भी उसकी बात मान कर उसके साथ वापस आ गई। हालांकि इतना सब होने के बाद मेरा उसके साथ जाने का बिल्कुल भी मन नहीं था लेकिन घरवालों के बहुत समझाने पर मैं राजी हो गई। लेकिन मैं अंदर से बहुत दुखी और टूटी हुई थी, मैं यह सब पचा नहीं पा रही थी।  कॉलेज में मेरे एक सहयोगी थे जिनसे मेरे विचार मिलते बहुत मिलते थे हमारी अक्सर किसी ना किसी विषय पर चर्चा होती रहती थी। मुझे दुखी देखकर मोहन ने पूछा, " क्या बात है? आज कुछ ज्यादा ही अपसेट लग रही हो?" मैं अंदर से भरी बैठी थी, मैंने मोहन को सब बता दिया। मोहन से मैंने सारी दिल की बातें कह दी। मोहन सहानुभूति जताने लगा लेकिन मुझे नहीं पता था कि मेरी दूसरी सहयोगी पुष्पा हमारी सब बातें सुन रही थी। उसने रवि को जाकर सब बता दिया और हमारे बीच फिर से झगड़े शुरू हो गए। रवि मुझे चरित्रहीन कहने लगे। मैं सब छोड़कर फिर से मायके आ गई। अब मेरा मन कहीं भी नहीं लगता था। ना किसी से बातें करने में और ना ही किसी काम में, भगवान से भी नाराज हो गई थी। भगवान किस बात की सजा दे रहा था यही सवाल बार बार उससे पूछती थी।

दो साल तक रवि ने मेरी कोई सुध नहीं ली फिर एक दिन अचानक मुलाकात हुई। भाभी मुझे जबरदस्ती मंदिर ले गई रवि भी अपने दोस्त के साथ मंदिर आए हुए थे। हम दोनों की नजरें मिली। रवि कमजोर लग रहे थे और परेशान भी। रवि पास आकर बोले, "इतनी कमजोर क्यों हो गई हो ? अब तो मुझसे छुटकारा भी मिल गया है।" मैंने रवि को देखा और मुस्कुराई फिर कहा,"हां"। रवि ने पूछा, "क्या कर रही हो?" "कुछ नहीं, नौकरी छोड़ दी है। मन नहीं लग रहा था" मैंने जवाब दिया। रवि कुछ नहीं बोले। कुछ समय बाद चुप्पी तोड़ते हुए रवि ने कहा, "मनु घर वापस आ जाओ"। मुझे एकदम से गुस्सा आ गया मैंने कहा, "जब मन करता है निकाल देते हो, जब मन करता है बुला लेते हो, क्या समझ रखा है मुझे, मैं तुम्हारे हाथों की कठपुतली नहीं हूं कि जब चाहा अपमान कर दिया, जब चाहा घर में सजा दिया। मेरी भावनाओं की तुम्हें कोई कद्र नहीं। मुझे नहीं आना तुम्हारे घर मैं यहीं पर ठीक हूं"। "अब कुछ नहीं, सब भूल कर एक नई शुरुआत करते हैं हम दोनों"। फिर घर वालों के समझाने और थोड़े दबाव के कारण मैं वापस रवि के पास आ गई। हम दोनों साथ रह रहे थे लेकिन रवि का स्वभाव अभी भी खूबसूरत महिलाओं को देख कर मचल जाता था। समझ में नहीं आ रहा था चरित्रहीन कौन है मैं या रवि?



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