वनों में आग, वन्य-प्राणी खतरे में...
| - Om Prakash Uniyal - May 12 2019 2:57PM

गर्मियों का मौसम आते ही वन्य-जीवों पर संकट के बादल मंडराने लगते हैं। हर साल तपती गर्मी में जंगल आग से धधकने लगते हैं। जिसके कारण प्राकृतिक संपदा को तो नुकसान पहुंचता ही है वनों में रहने वाले जीवों को भी। आग के कारण उन्हें अपने डेरे छोड़ने पड़ते हैं। पेट की क्षुधा मिटाने के लिए कुछ नहीं बचता। जिसके कारण ज्यादातर जानवर अपना रुख नजदीकी बस्तियों की तरफ करने लगते हैं। अनेकों तो आग की भेंट चढ़ जाते हैं, आग से झुलस जाते हैं और धीरे-धीरे दम तोड़ देते हैं। आग से मरने वाले छोटे-छोटे कीट-पतंगों की संख्या असंख्य होती है।

पर्यावरण को सुरक्षित रखने एवं  संतुलन   बनाए रखने में जंगली जीवों की भी अहम भूमिका होती है। गर्मियों में जंगलों में उगी घास-फूस, छोटी-छोटी झाड़ियां, बेलें, पेड़ों की पतियां व टहनियां सूख जाती हैं जो कि एक चिंगारी से भी एकदम सुलग जाती हैं। आग कभी अपने आप नहीं लगती। नई घास व झाड़ियां उगाने के लिए कुछ लोग जंगलों में आग लगा देते हैं। बीड़ी- सिगरेट पीने वाले अधजले टुकड़े लापरवाही से फेंक देते हैं जिसके कारण आग लगना स्वाभाविक होता है।

जंगलों के बीच से गुजरती बिजली की तारों में स्पार्किंग होने से भी  यह भयावह स्थिति बनती है। जो कि वन्य-जीवों को काल के मुंह में धकेलती है। ये तमाम लापरवाही मानवजनित होती हैं। वैसे तो वन विभाग के जगह-जगह वनों को आग से बचाने के साईनबोर्ड लगे नजर आएंगे लेकिन विभाग के ही कई कर्मी लापरवाही बरतते हैं। वन-विभाग के पास खासतौर पर भारत में कोई फौरी साधन व आधुनिक सुविधाएं नहीं होती। जैसाकि, पानी का छिड़काव हैलीकाॅप्टर से करना, कम लगी आग पर नियंत्रण पाने के लिए फायर एक्सटिंग्यूसर जैसी सुविधाएं नहीं होती। पहाड़ों में तो आग पर काबू पाना ही बड़ा मुश्किल होता है। जंगलों में ऐसी-ऐसी जगह आग फैलती रहती है कि वहां आसानी से पहुंचना भी मुश्किल होता है।

केवल हैलीकाॅप्टर सेवा से ही काम लिया जा सकता है। वह भी तब जब आसपास पानी की उपलब्धता हो। चाहे नदी हो या तालाब। गर्मियों में तो जंगलों में पानी के स्रोत तो अक्सर सूख जाते हैं या पानी कम हो जाता है। नदियों, तालाबों की भी यही स्थिति होती है। जंगलों की आग बुझाने के लिए नयी तकनीक इजाद करने की जरूरत तो है ही आम नागरिक की जिम्मेदारी भी बनती है कि लापरवाही न बरतें। वरना एक दिन ऐसा आएगा जब प्रकृति का साथ निभाने वाले वन्य जीव केवल यादों तक ही सीमित होकर रह जाएंगे।



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