ठाकुर सिंह का इंतजार
| - RN. Network - May 13 2019 4:54PM

ठाकुर सिंह की हवेली बहुत बडी थी क्या नही था उस हवेली के अन्दर, बाहर से किला सा लग रहा था बडे-बडे दरवाजे दूर तक फैली उनकी हवेली मानो अपनी शान खुद बया कर रहा हो। ठाकुर साहब का आकर्षक व्यक्तितव रौबदार रहन शहन उस इलाके में मशहूर तो थी ही उनमें एक खास बात थी जो उन्हें और आकर्षक बनाता वो था उनका दयालु स्वभाव, पर वे अन्याय के खिलाफ रहते थे। एक रात की बात है, काली रात घोर अंधेरा और झमाझम वारिश हो रही थी चारो ओर बादल ही बादल थे जो काली रात को और काला बना रहे थे। साथ में बेंग की टर्र-टर्र की आवाज, इन सब से बेफिक्र ठाकुर साहब, अपनी शयनकक्ष में आराम फरमा रहे थे।

एक चोर जिसका नाम कालू था महल के अन्दर दाखिल हुआ सभी की नजरो से बचता हुआ मेन हाँल की दरवाजे की बायी तरफ से पाईप के सहारे वह शयन कक्ष तक पहुँचने में कामयाब हो गया। शयन कक्ष बहुत ही शानदार और आधुनिक सामानो से भरा था  चोर तो तिजोरी की चाबी खोज रहा था लेकिन वह उसे नही मिल रहा था। ठाकुर साहब ने करवट बदली तो तकिये थोडे खिसक गये चोर ने पाँव दबाकर चलते हुए तकिये के पास आया और तकिया उठाकर देखा तो चाबी मिल गयी। चाबी लेकर वह तिजोरी खोलने लगा तिजोरी ठीक दाहिने तरफ था जिस ओर ठाकुर साहब की पीठ थी तिजोरी तो खुल गयी चोर सबकुछ समेटने लगा जल्दी जल्दी में उसके हाथ ताजोरी के बगल में रखे गुलदस्ता से टकरा गया जो कांच का था गिर गया आवाज जोर की हुई ठाकुर साहब उठकर बैठ गये।

ठाकुर साहब की नजर चोर पर पडी और जोर से बोलते है तू कौन है हुजुर मै एक चोर हूँ चोरी करने आया हूँ। तू इतना हट्ठा कठ्ठा होकर चोरी करते हो वो भी ऐसे कि हमारी नींद खुल गयी। क्या अब भी तुम ये सामान लेकर जा पाओगे चोर ने कहा! हा बिल्कुल वो कैसे चोर जाने कै लिए तैयार हुआ उससे पहले ही ठाकुर साहब उसे पकड लिया और उसे खूब समझाया उन्होने चोर से कहा अगर तुम चोरी करना छोड दो तो मै तुम्हे ये धन ऐसे ही दे दूँगा पर तुम्हें चोरी छोड़नी पडेगी। चोर ने सोचा बात मान लेते है वरना पकडे गये है कुछ भी हो सकता है अतः उसने ठाकुर साहब से कहा ठीक है मै चोरी नही करूँगा और घन लेकर चला गया। ठाकुर साहब ने सोचा चलो थोडे धन से किसी की भलाई हो जाती है और बुरे आदत छुट जाती  है तो अच्छा ही है।

  लघुकथा  

चोर अपने घर जाकर खूब अय्याशी करने लगा। घन का प्रयोग बुरे कार्यो में लगाता कुछ महीनो के पश्चात ही वह फिर से चोरी करने को मजबूर हो गया और चोरी करने लगा।एक रात वह पुनः ठाकुर साहब के घर चोरी करने के लिए वैसे ही पहुँच जाता है पर ये क्या?उस दिन तो एक तिजोरी ही थी और आज तीन! तिजोरी देखकर चोर हतप्रभ सा तीनो तिजोरी खोलने के उपरान्त उसकी आँखे चौधिया जाती है। वह धन समेटता जाता है। ठाकुर साहब की आँख खुल जाती है चोर पर नजर पडते ही वो उसे पहचान लेते है चोर शर्मिन्दा होकर ठाकुर साहब के पास आता है और कहता है हजूर मुझसे पाप हो गयी मै चोर लोभी अनैतिक कार्यो के वश मे था।

आज आपके इन तिजोरियों को देखकर एहसास हुआ कि नेकी से आपकी एक तिजोरी से तीन तिजोरी धन हो गयी आपने हमें एक तिजोरी धन भी दिया लेकिन हम पापी सारा धन पाप के कार्यो मे गँवा दिए। दूसरी तरफ आप है जो हम जैसे चोर पर भी विश्वास करके अपना धन दिए। ठाकुर साहब मुस्कुरा कर बोले! देखो तुम बुरे कार्यो में लिप्त थे आज तुम्हे पश्चाताप हो रहा है पश्चाताप सभी दोषों से मुक्त करता है मनुष्य को इसलिए आज मुझे भी विश्वास है तुम्हारे अंदर की बुराई मर चुकी है तुम चाहो तो मै तुम्हें थोडे से धन कर्ज के तौर पर दूँगा कोई रोजगार करने के लिए जब तुम्हें हो जाए मुझे लौटा देना।

अब कालू एक नेक इन्सान बन चुका था अपनी रोजगार ठीक से करने लगा देखते ही देखते कालू से कालू साहूकार बन गया धन कमाने लगा उसने ठाकुर साहब का धन भी लौटा दिया और एक नेक जिन्दगी जीने लगा ।कहने का तात्पर्य सभी के जीवन में एक ठाकुर साहब जैसे किरदार की जरूरत होती है जो गलतीयो पर भी प्यार और अपनापन से रास्ता दिखलाये तो बूरा से बूरा लोग भी सही रास्ते पर आ जाते हैं उसी तरह एक सिस्टम व्यवस्था चलाने के लिए भी भ्रष्टाचार और घोटाले खत्म करने के लिए भी ठाकुर जैसे किरदार की जरूरत आज हमारे लगभग सभी तंत्र को है जो कालूरूपी चोर की तरह जहाँ देखो पाँव पसारे खडा है चाहे वह सामाजिक राजनीतिक प्रशासनिक पारिवारिक या शैक्षणिक व्यवस्था क्यूँ न हो ठाकुर सिंह का इंतजार सभी को है।



Browse By Tags