विधवा
| -Priyanka Maheshwari - May 22 2019 4:22PM

अरी कुलक्षिणी... डायन.... कहां मर गई, दिनभर पड़ी रहती है.... दिन चढ़ आया है और अभी तक बर्तन, कपड़े नहीं धुले। गर्म पिघलते लोहे की तरह यह शब्द मेरे कानों में उतरते गए। मैं हड़बड़ा कर जल्दी से उठ गई, "जी, अम्मा जी, अभी आई" बोलकर सात महीने का पेट लेकर मैं फिर से काम में लग गई। मेरी सास अपने पुत्र वियोग का सारा गुस्सा और दुख मुझ पर ही उतार देती थी। अम्मा का अभी तक जहर उगलना जारी था। "डायन भी एक घर छोड़ देती है और तू तो अपना ही घर उजाड़ बैठी, करमजली अपने ही भतार को खा गई, मेरा बुढ़ापे का सहारा छीन लिया...मेरे बेटे को खा गई" और वो रोने लगीं। कितने दिनों से यही सब सुनते आ रही थी। अक्सर आंखें भर आती थी मेरी... इसलिए नहीं कि अम्मा इतना बुरा भला बोलती थी बल्कि इसलिए कि किसी को मेरे दुख का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था। मैं कितनी अकेली हो गई हूं... ये कोई क्यों नहीं सोच पाता था और राकेश एक जिम्मेदारी मेरे ऊपर छोड़ कर चले गए थे। उसे कैसे निभाऊंगी मैं यही समझ नहीं पा रही थी। अम्मा का बड़बड़ाना अभी भी जारी था।

मुझे आज भी वो दिन नहीं भूलता जब एक दिन राकेश घर जल्दी आ गए थे।  उन्हें अचानक जल्दी आया देख कर मैं बहुत खुश हो गई थी। "हाय राम आज इतनी जल्दी कैसे आ गये" मैंने पूछा। "चलो तैयार हो जाओ बाजार जाएंगे.. तुम्हें कुछ खरीदना हो तो ठीक है नहीं तो चाट खाने जाएंगे। यह लो तुम्हारे जूड़े पर अच्छा लगता है"। गुलाब का फूल मेरी ओर बढ़ाते हुए राकेश ने कहा। मैं उनके करीब आ गई और धीरे से गाल पर एक चुंबन अंकित कर दिया फिर मैं तैयार होने चली गई। "अजी सुनो, कौन सी साड़ी पहनूं? यह गुलाबी वाली पहनूं या ये पीली वाली? या सूट ही पहन लूं मैं?" मैंने पूछा। "अरे, कुछ भी पहन लो तुम पर सब अच्छा लगता है। कहां शहर को दिखाना है मैंने ही तो देखना है"। राकेश चिढ़ाने लगे तो मैंने भी बनावटी गुस्से से कहा, "आपको तो जब भी पूछो बस यही कह देते हो अब बाहर जा रही हूं तो अच्छे से तैयार होकर ही जाऊंगी ना.. आप कभी भी मेरी हेल्प नहीं करते... आपसे तो पूछना ही बेकार है... अच्छा अब बता भी दो कि कौन सी साड़ी पहनूं?" मैंने मुस्कुराते हुए पूछा। राकेश ने हंसते हुए गुलाबी साड़ी की ओर इशारा कर दिया और मैं तैयार होने चली गई। निकलते समय अम्मा का आदेश मिल गया कि समय से घर आ जाना देर मत करना।

उस दिन हम बहुत घूमे। रास्ते में मैंने कहा, "सुनो, पास ही दुर्गा जी का मंदिर है अब निकले हैं तो दर्शन कर ले"।  राकेश ने गाड़ी का रुख मंदिर की ओर मोड़ दिया। हम दोनों ने माता जी का दर्शन किया। पास ही में बाजार था थोड़ी बहुत खरीदी करके हम चाट खाने चले गए। "सबसे ज्यादा क्या पसंद है तुम्हें मैथिली? राकेश ने पूछा। मुझे तो सब पसंद है...आलू टिक्की, गोलगप्पे, मटर, खस्ता, दही वड़ा" मैंने कहा। राकेश तुरंत बोल पड़े, "इतना सब खा पाओगी क्या? मैं अभी आर्डर किए देता हूं "। "अरे रुको, रुको आप भी न... पहले ना गोलगप्पे खाते हैं इसके बाद कुछ और खाएंगे"। मैं गोलगप्पे खाने खाने लगी और राकेश मुझे देखते रहे। "अरे तुम क्यों नहीं खा रहे हैं और ऐसे मत देखो मुझे नजर लग जाएगी"। मैंने चिढ़ाते हुए राकेश को कहा। चुहल करते हुए  राकेश बोले, "आज दुकानदार के एक भी गोलगप्पे नहीं बचेंगे... और मेरे खाने का तो नंबर आएगा ही नहीं"। फिर मैंने अपनी प्लेट आगे करते हुए उन्हें गोलगप्पे खिलाए। घूमते घूमते रात के ग्यारह बज गए... घड़ी पर नजर पड़ते ही मैं घबरा गई अम्मा जी की डांट याद आने लगी। "अम्मा गुस्सा करेंगी... चलो घर जल्दी करो"। राकेश ने हामी भरी और हम घर की ओर रवाना हो गए। घर पहुंचते ही अम्मा जी की आवाज सुनाई दी कि "हो गया घूमना या कुछ बाकी रह गया है अब भी? अब घर की याद आई क्या"? मैं चुपचाप अपने कमरे में चली गई। राकेश अम्मा को गाड़ी खराब होने का बहाना बताने लगे, "अम्मा रास्ते में गाड़ी बंद पड़ गई थी। बहुत दूर तक हम खींचते हुए लाये गाड़ी को... बड़ी मुश्किल से चालू हुई"। अम्मा जरा नरम पड़ी बोली, "जा सो जा रात बहुत हो गई है"। राकेश जब कमरे में आये तो मैं कपड़े बदल रही थी। राकेश ने मुझे बाहों में भर लिया। मैं शरमा गई और बोली, "आप इस तरह अचानक से मत आया करो.... मैं घबरा जाती हूं"। "इसमें घबराने की क्या बात है मेरे अलावा तुम्हें भूत ही पकड़ सकता है" राकेश बोले। "देखो, ऐसी बातें नहीं करते रात में मुझे बहुत डर लगता है.. चलो अब सोया जाए बहुत देर हो गई है"। 

सुबह राकेश काम पर जल्दी निकल गए। मैं घर के कामों में व्यस्त हो गई। राकेश का फोन आया "मैथिली मुझे आगरा जाना है मेरे दो जोड़ी कपड़े बैग में डाल दो.. खाना खा कर चला जाऊंगा"। राकेश का बैग पैक करके मैं खाने की तैयारी में लग गई। दो बजे के करीब राकेश आए और खाना खा कर चले गए। वह दिन बड़ा मनहूस दिन था... हमारी खुशियों को किसी की नजर लग गई थी। राकेश गए तो फिर वापस नहीं आए। उनकी गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया और उसी जगह पर उनकी मौत हो गई। यह हादसा मेरे ऊपर पहाड़ गिरने जैसा था... मैं सुध बुध, संयम, समझ सब खो बैठी थी। "अरे महारानी को देखो तो जरा कैसे आराम फरमा रही है। घर बैठे कोई खिलाने आएगा क्या? बाहर जाकर काम करना पड़ेगा"। मैं फिर विचारों से बाहर आ गई। अम्मा की बात कड़वी जरूर थी लेकिन सच्ची थी। कौन कब तक सहारा देता। आखिर नौकरी ढूंढने निकल पड़ी मैं। सिर्फ बीए पास थी मैं। कोई डिग्री या हुनर मेरे पास नहीं था। नौकरी के लिए जगह जगह भटकना शुरू किया मैंने लेकिन कहीं भी कोई आस नहीं बन रही थी। इन दिनों अम्मा जी की तबीयत खराब चलने लगी थी और मेरा भी पैर भारी था।

अम्मा का इलाज दवाई ठीक से ना होने के कारण कुछ दिन में अम्मा चल बसी। मेरी हालत भी गिरती जा रही थी। मेरे डिलीवरी के दिन नजदीक आ रहे थे। जब मुझे कुछ समझ में ना आया तो मैं मेरे भाई के घर चली गई। कुछ दिन बाद मैंने बेटी को जन्म दिया। उसे देखकर मैं ज्यादा परेशान रहने लगी। इसका पालन पोषण और शिक्षा व्यवस्था कैसे करूंगी? क्या खिलाऊंगी और कैसे पढ़ाऊंगी? यही सवाल बार बार मेरे मन में उठता रहता था। जब तबीयत में थोड़ा सुधार हुआ तो मैंने फिर से नौकरी की तलाश शुरू कर दी... लेकिन कहीं नौकरी नहीं मिल रही थी। मुझे मेरी भाभी के ताने मिलने शुरू हो गए थे कि "कब तक इसे घर बैठा कर खिलाओगे? कब तक इन दोनों का बोझ उठाना होगा? रोज रोज की चिकचिक से परेशान होकर मैं अपने घर वापस आ गई। घर में खाने पीने की चीजों का अभाव होने लगा था। भाई ने भाभी से छुपा कर जो पैसे दिए थे उसी से अनाज लेने मैं किराने की दुकान पर गई। वहां सामान लेते लेते मैंने महसूस किया कि किराण वाला कुछ अजीब नजर से मुझे देख रहा है। हिसाब किताब करते वक्त दुकानदार ने पांच सौ की नोट आगे बढ़ाकर सामान देने लगा। शायद वह मेरी मजबूरी समझ गया था और मैं उसकी आंखों का मतलब समझ गई थी। गली में दबी आवाज़ में मुझे बेहया, गंदी औरत का दर्जा मिल गया था,  लेकिन मैं परवाह नहीं कर रही थी।  मेरे आगे मेरी बच्ची थी और उसकी भूख थी। परिस्थितियों के आगे सर झुका कर मैंने इसी काम को अपना कमाई का जरिया बना लिया। अब मेरी रोजी-रोटी चलने लगी थी लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि जो लोग अंधेरी रातों में अपनी हवस बुझाने आते हैं वही दिन के उजाले में मुझे गंदी औरत की नजर से देखते हैं।

मोहल्ले का ही एक आदमी मेरे पास आया और सौदेबाजी होने के बाद उसने मुझसे पूछा कि "क्यों करती हो यह काम"? मैंने कहा, "साहब, कोई काम दिला दो ऑफिस में.. झाड़ू पोछा करने का हो तो भी चलेगा आजू बाजू कुछ भी काम हो मैं कर लूंगी। वैसे साब मैं बीए पास हूं"। साहब "देखता हूं" बोलकर दोबारा नजर नहीं आए। लोग मेरी बदनसीबी का मजाक उड़ाकर चले जाते थे। गली की एक चौधराइन ने ताना मारा कि, "एक विधवा होकर ऐसा काम करना अपने आदमी के मुंह पर कालिख पोतने जैसा है"। मैंने उसे जवाब दिया, "हां मैं विधवा होकर ऐसा काम करती हूं। क्या आप अपने छोटे बेटे से मेरी शादी करवा सकती हैं? जो मेरा और मेरी बच्ची का पालन पोषण कर सकेगा? क्या आप अपने बड़े बेटे से कह कर मुझे कहीं नौकरी दिलवा सकती हो? या किसी भी काम के लिए कोई मदद कर सकती हैं"? आसपास काफी लोग जमा हो गए थे। धीरे धीरे सब लोग चले गए।  समाज का यह आईना देखकर मेरी आंख भर आई। अब जब भी कोई मेरे काम के बारे में मुझसे सवाल करता है तो मैं खुली आवाज में कहती हूं कि "मेरे काम के विषय में कुछ मत कहना... तुम नहीं आए थे मुझे संभालने या मेरी बेटी की भूख मिटाने... मुझे जो सही लगा वही किया मैंने।  तुम्हें से मेरी कोई मदद कर सकता है तो वह आगे आए। इतना सुनने पर धीरे-धीरे सब चले जाते है। मैं विधवा सामाजिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रही थी और शारीरिक रूप से संघर्षरत थी। मैं लोगों के लिए व्यंगात्मक उपहास का जरिया बन गई थी। 



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