संगीत से मानवीय संवेदनाओं को उभारकर हृदय परिवर्तन सम्भव
| Rainbow News - May 21 2017 1:15PM

सहज संवाद

श्रृष्टि की उत्पत्ति का कारक नाद और नाद का अस्तित्व ध्वनि तरंगों से स्थापित किया जाता रहा है। ध्वनि तरंगों में सामान्य ध्वनि, कर्णप्रिय ध्वनि, घातक ध्वनि जैसे अनेक वर्गीकरण है। इस विभक्तिकरण के उपभागों में संवाद से लेकर संगीत तक को संजोया गया है। संगीत को व्यक्ति की संवेदनाओं से जोडकर रागात्मक अभिव्यक्तियों के रूप में परिभाषित करना, हमारे विचार से अतिशयोक्ति नहीं थी। स्वर को लय, ताल और छंद के अनुशासन में बांधकर प्रस्तुत करना सहज नहीं होता। इसी असहज कार्य को लेकर उधेडबुन चल रही थी कि फोन की घंटी ने वीडियो काल की सूचना दी। सम्पर्क स्थापित होते ही दूसरी ओर से देश के जाने माने संगीतकार गिरीश चन्द्र का चेहरा उभरा। कानों में लगे इयरफोन में उनके अभिवादन भरे स्वर गूंजने लगे। हमने भी स्वागत भरे शब्दों का उच्चारण किया। बातचीत के मध्य पता चला कि वे इन दिनों पूना में ही है और हम भी आफीसियल कार्य से यहां आये थे। सो दो दिन बाद की मुलाकात का निर्धारिण कर लिया गया। निर्धारित स्थान और समय हम आमने सामने थे। कुशलक्षेम जानने-बताने के बाद बातचीत का सिलसिला चल निकला। हमने उनकी संगीत साधना के वर्तमान सोपान जानने की गरज से प्रश्न दाग दिये। अंतरिक्ष को घूरते हुए वे अतीत की गहराइयों में डूबते चले गये।

स्वाधीनता के ठीक पहले का वर्ष और 6 वर्ष की उम्र के बाल स्वर में गूंजता खटलवाडा ( सूरत ) का वैष्णव मंदिर। श्रद्धालुओं की तालियां पहली बार स्वयं के लिए महसूस करने के बाद उत्साह ने दिन दूनी रात चौगुनी गति से बढना शुरू किया। प्रकृति प्रदत्त प्रतिभा ने संगीत के सामाजिक अनुशासन में बंधने की ठानी। ग्वालियर घराने के पंडित ओंकारनाथ ठाकुर की विधिवत शिष्यता ग्रहण की। बडा ख्याल, छोटा ख्याल, ठुमरी सहित संगीत के विभिन्न आयामों से जुडी बारीकियों पर साधना का क्रम चलने लगा। इष्ट की कृपा, गुरू की आशीष और स्वयं के परिश्रम ने संगीत की तप स्थली से निकलकर व्यवहारिक परीक्षा हेतु मायानगरी पहुंचा दिया। उस समय के ख्याति प्राप्त गायक मन्ना डे के माध्यम से संगीतकार मदन मोहन तक पहुंचने वाले ने फिर पीछे मुडकर नहीं देखा। लम्बी चुप्पी देखकर हमने उन्हें एक बार फिर झकझोरा। अतीत के अंधे कुंये से निकलकर उन्होंने वर्तमान की रोशनी से साक्षात्कार किया और इस व्यवधान के लिए क्षमा मांगी। प्रश्न यथावत था। सो उन्होंने संगीत की अंतहीन श्रंखला का उल्लेख करते हुए कहा कि इस विधा में पूर्णता का दावा करना नितांत मूर्खता है। हम कल भी विद्यार्थी थे और आज भी हैं। यह अलग बात है कि तब के संगीत अनुशासन शास्त्रीय विधा पर परिणाम सहित उद्देश्यों को स्थापित करते थे जब कि वर्तमान में संगीत का अर्थ पाश्चात्य देशों की भौडी नकल करने तक ही सीमित होकर रह गया है।

कथित आधुनिक वर्ग की पेचैंदगी भरी जिन्दगी को आत्मसात करने का प्रचलन चल निकला है। हम आज भी अपनी शास्त्रीय विधा के साथ जुडे परम्परागत अनुशासन में नित नये प्रयोग कर रहे हैं, जिन्हें सराहा भी जा रहा है। हमने उन्हें सन् 1992 में  अमेरिका के नईजर्सी शहर में बिना रुके २५ घण्टे एक मिनिट तक निरंतर गाते रहने का रिकॉर्ड दर्ज करने की याद दिलाती और कुछ नया करने की दिशा बढ रहे कदमों पर जानना चाहा। उनका चेहरा गम्भीर हो गया। मुस्कान कहीं लुप्त हो गयी। चिंता की लकीरें माथे पर चुगली करने लगीं। देश के वर्तमान हालातों की समीक्षा करते हुए उन्होंने कहा कि आज आतंकवाद का जहर पूरी दुनिया में फैल चुका है। जिसका तत्काल समाधान युद्ध के अलावा दिखाई नहीं दे रहा है। ऐसे में संगीत से मानवीय संवेदनाओं को उभारकर हृदय परिवर्तन सम्भव है। भजन, सूफियाना, प्रार्थना, शबद, कीर्तन, प्रेयर जैसे साश्वत प्रयोगों से वातावरण को पवित्र, समाज को हितकारी और व्यक्ति को उदार बनाया जा सकता है। हम इन्हीं प्रयोगों पर काम कर रहे हैं। अनेक देशों के ख्याति प्राप्त संगीतज्ञों से चर्चा चल रही है। अधिकांश लोग मिलकर इस दिशा में काम करने की सहमति दे चुके हैं। हमें विश्वास है कि व्यक्ति के रागात्मक पक्षों को उजाकर करके परम सत्य को प्रकृति के साथ जोड कर प्रस्तुत करने से आतंकवाद जैसी विभीषिका से निपटा जा सकता है। लोगों के मन में भरी क्रूरता समाप्त की जा सकती है। बातचीत चल ही रही कि हमारे फोन की घंटी बज उठी। हेड आफिस से रिपोर्ट मांगी जा रही थी। सो स्थानीय कार्यालय जाकर भेजने की बाध्यता थी। तत्काल शीतल पेय मंगाया और उसे सार्थकता की भेंट चढाकर दूसरे दिन सुबह साथ चाय पीने के वायदे के साथ उनसे विदा ली। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।  

 

 



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