रे मन तू काहे न धीर धरे....
| -Priyanka Maheshwari - Jun 6 2019 12:20PM

कहते हैं कि मन सुंदर होना चाहिए सूरत नहीं जो व्यक्ति मन से सुंदर होता है वह सहज ही दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है लेकिन ये मन भी बड़ा अजीब होता है अगर किसी पर आ जाए तो उसका बुरा नहीं देखता और अगर किसी से दिल उतर जाए तो उसका अच्छा नहीं देख पाता। मन में एक समान भाव का मिलना बहुत मुश्किल है और यही मन हमारे सुख दुख का कारण भी है। मन की चंचलता वो घटक है जो व्यक्ति को स्थिर नहीं रहने देती, बेचैनी उस पर हावी रहती है।

बात या समस्या कुछ भी हो हर वक्त वो अपने उसी बिंदु पर केंद्रित रहता है जब तक कि वह उससे बाहर नहीं आ जाता, फिर चाहे वह बच्चे का परीक्षाफल हो फिर प्रेमी जोड़ों का विरह या फिर किसी का स्कूल से देर पहुंचना, घर से देर से निकलना कोई भी समस्या हो जब तक हम अपनी समस्या या बेचैनी से बाहर नहीं आते तब तक हमारा मन उसी में उलझा रहता है। सबसे ज्यादा आकर्षित करने वाली बात प्रेम में चंचलता है। हम अपनी बातों से,  हाव-भाव से, श्रृंगार से अपने प्रिय को लुभाते हैं। यही चाहते हैं कि वह हमारे इर्द-गिर्द घूमता रहे, उसका केंद्र बस मैं ही रहूं।

चंचलता कई तरह की गतिविधियों में  बांध कर रखती है। यही चंचलता व्यक्ति को एक दूसरी दुनिया में ले जाती है जहां वह अपनी सोच के आगे बढ़ ही नहीं पाता है। मन की कल्पनाओं का एक अलग ही रैन बसेरा है जहां सब कुछ उसके मन के हिसाब से घटित होता है और बस यही से मन और उन्मुक्त होने लगता है। बंधन बर्दाश्त नहीं होते, रोक टोक, आलोचनाएं सहन नहीं होती। उन्मुक्त मन आसमान छूने की चाहत रखता है साथ ही यह भी भाव पनपने लगता है कि मैं सही हूं। मुझे मेरी राह पर चलने की आजादी चाहिए। यूं देखा जाए तो उन्मुक्तता की भी एक सीमा होनी चाहिए। अति तो किसी भी चीज की अच्छी नहीं। मन की उन्मुक्तता और मन की निरंकुशता में ज्यादा फर्क नहीं है। निरंकुश मन बस अपनी ही कहना सुनना  और करना जानता है जो सारी हदें तोड़ देना चाहते हैं।

हालांकि मन का मर्यादाओं में होना बहुत जरूरी है। मन की एक खास बात यह है कि वह स्वयं से झूठ नहीं बोल पाता, जो सत्य होता है वह उसे स्वीकार कर लेता है। इसी वजह से वह शक्तिशाली भी होता है। निर्णय लेने में सक्षम होता है। चंचल मन बिल्कुल पानी की तरह है अगर उसे बांधना है तो एक दायरा बांधना पड़ता है, जहां मन स्थिर हो सके और यदि वेग के साथ बहने देना है तो बिना किसी बंधन के, बिना किसी प्रयास के उसे बहने दिया जाए हां अगर ऊपर की ओर बाहर करना है अर्थात लक्ष्य भेदना है या निर्धारित करना है तो एक सीमित दायरे से लक्ष्य की ओर प्रवाहित करना पड़ता है।

जल और मन में बस यही समानता है हालांकि एक तथ्य और भी है कि जब हमारा मन अशांत होता है और हम उसे शांत करना चाहते हैं तो जब तक वह चीज हमारे लिए गौण नहीं हो जाती, उसके प्रति जो आकर्षण वो खत्म नहीं हो जाता है तब तक हमारा मन उससे बाहर नहीं आता। इसलिए जहां तक निरंकुश मन को शांत करने की बात है तो सबसे पहले आप उस वस्तु को गौण बनाना होगा जिससे हमारा मन बेचैन है। हालांकि बहुत मुश्किल है क्योंकि मन चंचल होता है।



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