आने वाली पीढियां हमें माफ नहीं करेंगी...
| -Rainbow News Feature Desk - Jun 6 2019 3:29PM

विश्व पर्यावरण दिवस पर आइये अपने आप से कुछ सवाल करें...कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हम कैसी धरती और कैसा पर्यावरण देने जा रहे हैं...यह प्रश्न हमारे सामने यक्षप्रश्न बनकर खड़ा है और जब तक हम साथ मिलकर इसका जवाब ढूंढ नहीं लेते तब तक यह दिवस केवल एक जागरूकता दिवस के रूप में सीमित रहेगा... हम इसे उत्सव की तरह नहीं मना पाएंगे...गंगा समेत देश की विभिन्न नदियों में तमाम उद्योगों और कल कारखानों द्वारा अनेक प्रकार के जहरीले रसायन बेरोकटोक डाले जा रहे हैं। शहरों में नालों का निकास नदियों में कर देना सबसे आसान काम है। महानगरों का सीवर सिस्टम और ड्रेनेज सिस्टम भी आसपास की नदियों को बुरी तरह प्रदूषित कर रहा है।

शहर का सारा कूड़ा कचरा भी नदियों के किनारे डम्प कर दिया जाता है। नगर निकायों को भी कचरे के निष्पादन के लिए नदियों का तटवर्ती क्षेत्र सबसे सुरक्षित स्थान नजर आता है। जीवनदायिनी नदियाँ सिकुड़ती जा रही हैं...कई नदियों का अस्तित्व तो समाप्त होने के कगार पर है...कमोबेश देश के हर छोटे बड़े शहरों में यही तस्वीर दिखाई देती है। जबकि देश की कई बड़ी नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएं चल रही हैं। देश में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय है। केंद्रीय जल आयोग, नदी संरक्षण निदेशालय, राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन भी इसी उद्देश्य के लिए बनाए गए हैं। 'नमामि गंगे' जैसी महत्वाकांक्षी योजना भी है। 

प्रदूषण को रोकने के लिए केंद्र के साथ राज्यों में भी कई विभाग हैं। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगर विकास एवं आवास विभाग, जल संसाधन विभाग (डब्लूआरडी) एवं लोक स्वास्थ्य अभियंत्रण विभाग (पीएचईडी) भी प्रदूषण मामलों के लिए जवाबदेह हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए देश में कानून है जिसका उल्लंघन किये जाने पर दंड का भी प्रावधान है। बगैर ट्रीटमेंट प्लांट लगाये उद्योगों को संचालित करना या अनुपचारित सीवेज को नदी में डालना कानूनन जुर्म है। पर्यावरण संरक्षण के लिए वैश्विक कानून भी है।इन सब के साथ साथ नदियों को बचाने के लिए संघ संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं के द्वारा आंदोलन भी चलते हैं। इन सारे नियम कानून और आंदोलन के बावजूद अनेक औद्योगिक इकाइयां बगैर ट्रीटमेंट प्लांट के संचालित हो रही हैं।

नदियों में प्रदूषण का घनत्व दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। ऐसे में इन सवालों का जवाब भी ढूंढना जरूरी है...क्या नदियों के बगैर हमारा जीवन संभव होगा...क्या हमने नदियों में बढ़ते प्रदूषण के विरोध में कभी कोई कदम उठाया है...क्या हमारा स्वच्छता अभियान केवल हमारे घर तक सीमित है... क्या पर्यावरण से जुड़ी इस समस्या के लिए केवल सरकार या व्यवस्था दोषी है...क्या केवल आज के दिन प्लांटेशन के नाम पर या हाथ में झाड़ू उठाकर गली मोहल्ले की सफाई के नाम पर अपना फोटो सोशल मीडिया में पोस्ट कर देने से कोई बदलाव आएगा...क्या केवल आज की जागरूकता रैली में नारा लगाने से व्यवस्था बदल जायेगी...

बेहद जरूरी है कि यह जज्बा पूरे साल कायम रहे... और सरकार इन मामलों में कारगर कदम उठाये इसके लिए अपने अपने स्तर से हर किसी को संघर्ष के लिए आगे आना होगा...वरना आने वाली पीढियां हमें माफ नहीं करेंगी...और कब तक ये बड़े बड़े उद्योग जन जीवन को संकट में डालकर अपने निजी फायदे के लिए पर्यावरण और प्राकृतिक संपदाओं का दोहन करते रहेंगे...इसका भी हिसाब होना चाहिए...विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर आइए इन विन्दुओं पर सोचें, अपनी छटपटाहट और अपनी पीड़ा को एक दूसरे के साथ साझा करते हुए अपने संकल्प को मजबूत बनायें और अपने इस सरोकार से सरकार को अवगत कराएं... 



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