सियासी मोहल्लों में भटकती बच्चियां...
| -Priyanka Maheshwari - Jun 12 2019 3:33PM

पिछले कुछ समय से देश में लगातार बच्चियों के साथ हैवानियत की घटनाएं घट रही हैं राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक के पास इन बेटियों के दर्द का कोई जवाब नहीं है। दिव्या, आसिफा या ट्विंकल शर्मा हो बस इनके नाम को धर्म से जोड़कर सिर्फ राजनीति की जाती है। यह मासूम बच्चियां है और इसी राजनीति में बच्चियों की जान पिस रही है। ये बात भी कोई मायने नहीं रखती है कि इन मासूमों की जिन्दगी वहशियों के हाथों तबाह हो रही है। क्या यह वही सरकार है जिसने वादा किया था कि बेटियां अब सुरक्षित रहेंगी और सुरक्षित घर से बाहर निकल सकेंगी। "बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ" का नारा नहीं चाहिए हमें। नन्ही बच्चियों को हैवानियत से बचाने वाले कानून का खौफ चाहिए।

अपराधियों में डर नाम की कोई चीज नहीं रह गई है, नहीं तो आए दिन इस तरह की घटनाएं नहीं घटती। पुलिस का रवैया भी बेहद हैरान कर देने वाला है। पहले तो एफआईआर लिखी ही नहीं जाती या फिर बड़ा सुस्त रवैया अपनाती है। ऐसे में पीड़ित व्यक्ति कहां गुहार लगाए? विकृत मानसिकता वाले सभी जगह है, उनके लिए खौफ पैदा करना जरूरी है। कश्मीर से लेकर केरल तक, गुजरात से बंगाल तक बच्चियों के साथ घट रही घटनाएं रोंगटे खड़े कर देने के लिए काफी है। वीभत्सता की सारी हदें पार है। देश में मध्यप्रदेश इस मामले में पहले नंबर पर है। उन्नाव, कठुआ और सीतापुर रेप केस मे किसी महिला नेता ने आवाज नहीं उठाई थी। सासाराम बिहार रेप केस मे 7 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म, कुछ समय पहले सूरत में 11 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म। अगर अपराधिक ग्राफ पर नजर डालें तो यूपी सबसे आगे है और कुछ समय में महिलाओं के प्रति अपराधों की संख्या में इजाफा हुआ है. बनारस, मेरठ, कानपुर ऐसे कई शहर हैं जहा हर रोज इस तरह की घटनाएं घट रहीं हैं। सवाल उठता है कि योगी के एंटी स्कावाड अभियान का क्या हुआ?

दुष्कर्म की घटनाओं के अलावा भी कई ऐसी अपराध हैं जिनमें महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया है. सबसे तकलीफदेह स्तिथि तब होती है जब पुलिस प्रशाशन की तरफ से कोई मदद नही मिलती है. पुलिस प्रशाशन की बेजवाबदारी की वजह से अपराधियों को बढ़ावा मिलता है। इनकी निष्क्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि देश के नम्बर तीन गुडंबा थाने के पुलिसकर्मी चेन लूट की शिकार महिला पर ही भड़क गये, बोले जब गहने संभाल नही सकती तो पहनती क्यों हो? पीड़िता का कहना है कि यूपी की पुलिस से अच्छी मुंबई की पुलिस है जो मदद तो करती है। अपराधियों के हौसले इतने बुलंद होते है कि उन्हें कानून का भी डर नही होता है, उन्नाव में शाम ५ बजे साईकिल से बाजार जा रही युवती को रास्ते में जिन्दा जलाकर मार डाला जाता है। हत्यारों का सुराग नही मिला और मारने की वजह भी पता नही चल सकी। कुछ ऐसा ही मामला बलिया का है जहाँ २० हजार रूपए न चुकाने पर सूदखोरों ने ५० साल की महिला रेशमा को केरोसिन डालकर जला दिया। २० हजार रूपए की कर्जदारी चुकाने के लिए रेशमा ने अब तक २ लाख रूपए चुका दिए थे और सूदखोर रकम की वापसी के लिए दबाव बना रहे थे। एक कर्ज न चुकाने की इतनी बड़ी सजा?

बाराबंकी में एक युवती की हत्या कर उसके टुकड़े टुकड़े करके बैग भरकर आग लगा दी। युवती की शिनाख्त नही हो सकी और हत्या का कारण भी मालूम नही हो सका। अपराधों की श्रंखला में लडकियों की खरीद फरोख्त का धंधा भी खूब फलफूल रहा है. महिलाओं का एक गैंग है जो गरीब युवतियों को बहला फुसला कर बेच देती हैं.  लड़कियों को पकडकर उन्हें नशीले पदार्थ सुंघाकर उनकी दुसरे पुरूषों के साथ शादी करा दी जाती है। आये दिन महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध "बेटी बचाओ" के नारे को झूठा साबित करते हैं. समानता की बात जमीनी स्तर पर कही नही दिखाई देती है. जो दुर्दशा आज स्त्रियों और मासूम बच्चियों की हो रही है उससे मानव समाज को शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है। प्रशासन में कड़े नियम कानून के साथ साथ उनका सख्ती के साथ पालन हो इस बात की भी बहुत आवश्यकता है. खुद प्रशासन को भी सुधरने की जरूरत है ताकि पीड़िता न्याय से वंचित न रह जाये। 

सरकारें आती जाती रहतीं हैं और हमें मतलब है बेटियों की सुरक्षा करने वाले मुखिया से। बेटियों के ऊपर हो रही राजनीति नहीं चाहिए हमें न्याय चाहिए। ये बेटियां किसी राजनीतिक दल को नहीं जानती इन्हें मुद्दा ना बनाया जाए। देश का माहौल इतना खराब है सत्ता में बैठी नेता भी सुरक्षित नहीं है। कुछ समय पहले स्मृति इरानी और  प्रियंका चतुर्वेदी को बेटी के साथ दुष्कर्म करने की धमकी मिली थी।  देश में 48 सांसदों और विधायकों पर महिला अपराध के मुकदमे दर्ज हैं पिछले 5 सालों में बलात्कार के 28 आरोपियों को विभिन्न सियासी दलों ने उम्मीदवार बनाया  यह है भाजपा की महिला सम्मान का परचम? मनुष्य भी इतना संवेदनहीन हो गया है कि वह सिर्फ तमाशा देखता है या फिर आजकल के आधुनिक समय मे वीडियो रिकार्डिंग करता है या फिर मीडिया पर अभद्र टिप्पणी करता है और बेहूदी राजनीति पर उतर आता है। क्या झूठे वादे और फोफसे कानून  बेटियों की सुरक्षा के मापदंड है? सरकार आंख मूंद कर क्यों बैठी है? आए दिन हैवानियत बढ़ती जा रही है और हैवानियत की शिकार बच्चियां आखिर कब तक सियासी मोहल्लों में भटकती रहेगी? हाथों में कैंडल लेकर मार्च या निंदा नहीं चाहिए। 



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