व्यवस्था के विध्वस से अनभिज्ञ ‘सुलगता बंगाल'
| Dr. Arpan Jain 'Avichal' - Jun 17 2019 11:45AM

एक तरफ बंगाल में चिकित्सक हड़ताल पर है, बीमारी से मरीजों का हाल बेहाल है, इलाज के अभाव में बंगाल की जनता मौत को गले लगा रही है, अभद्र भाषा से मुख्यमंत्री लबरेज है, कही जय श्री राम के नाम पर पाबंधी है, तो कही राजनैतिक खूनी संघर्ष जारी है। आखिर क्या यही बंगाल की हकीकत है? ये बंगाल वो भारतीय बंगाल नहीं है, जो महाकाली का उपासक, तंत्र का गढ़ व अध्यात्म का पुंज हुआ करता था, ये वो बंगाल तो नहीं जो धरा विवेकाननंद के पुरुषार्थ से सिंचित, जहाँ राजा राम मोहन राय ने अस्तित्व बनाया, जहाँ जन्में सुभाष, जहाँ शरदचंद ने कहानी गढ़ी, जहाँ जन्मे गुरूदेव टैगौर, जहाँ महाश्वेता देवी ने भृकुटी तानी, जहाँ डॉ॰ सर जगदीश चन्द्र बसु ने जन्म लिया जहाँ सत्यजित राय ने प्रतिभा पायी, जहाँ बंकिमचंद चटर्जी ने मातृभूमि का वंदन गाया है।

बंगाल वो जहाँ साहित्य पनपा, 'भुखी पीढी आंदोलन' मुकम्मल हुआ जिसने साठ के दशक में पूरे बंगाल में तहलका मचा दिया था, इसके इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में बंगाल पर इस्लामी शासन १३ वीं शताब्दी से प्रारंभ हो कर १६ वीं शताब्दी में मुग़ल शासन में व्यापार तथा उद्योग का एक समृद्ध केन्द्र बन कर उभरा। १५ वीं शताब्दी के अंत तक यहाँ यूरोपीय व्यापारियों का आगमन हो चुका था तथा १८ वीं शताब्दी के अंत तक यह क्षेत्र ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के नियंत्रण में आ गया था। भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का उद्गम यहीं से हुआ। १९४७ में भारत स्वतंत्र हुआ और इसके साथ ही बंगाल, मुस्लिम प्रधान पूर्व बंगाल (जो बाद में बांग्लादेश बना) तथा हिंदू प्रधान पश्चिम बंगाल (भारतीय बंगाल) में विभाजित हुआ। यहाँ की सांस्कृतिक अखंडता और परंपरागत शैली ने बंगाल को वैश्विक पटल तक स्थापित किया। नृत्य, संगीत तथा चलचित्रों की यहां लंबी तथा सुव्यवस्थित परंपरा रही है। दुर्गापूजा यहां अति उत्साह तथा व्यापक जन भागीदारी के साथ मनाई जाती है। क्रिकेट तथा फुटबॉल यहां के लोकप्रियतम खेलों में से हैं। सौरभ गांगुली जैसे खिलाड़ी तथा मोहन बगान एवं ईस्ट बंगाल जैसी टीम इसी प्रदेश से हैं।

आज जो बंगाल बन रहा है या दिख रहा है यह पश्चिम बंगाल का मूल स्वरुप नहीं है। किन्तु प्रश्न तो यह भी है कि आखिर ऐसे क्या कारण रहें जिसने सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और धार्मिक रूप से मजबूत बंगाल में वैमनस्य, खून ख़राबें और अमानवीयता की पराकाष्ठा पर पहुंचना स्वीकार किया जा रहा है। बंगाल में मार्क्स का प्रभाव बढ़ने लगा तभी से बंगाल ने धार्मिकता को धीरे धीरे अस्वीकार करना शुरू किया। यह भी सत्य है कि बंगाल जिस कार्ल मार्क्स और लेनिन की अवधारणा को सहज स्वीकार करने लगा उसी अवधारणा ने रूस के 52 टुकड़े करवा दिया फिर भी स्थापित नहीं हो पाई। हर तीसरे दिन बंगाल में दो दलों के समर्थकों में खूनी संघर्ष होना आम बात हो गई, जय श्री राम के नारे लगते ही वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आँखें तन जाने लग गई, आखिर उनकी व्यक्तिगत विचारधारा का खामियाजा बंगाल की जनता क्यों भुगत रही है यह भी विचार करने का विषय है।

हाल ही में मुर्शिदाबाद में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हुई है, इसमें टीएमसी के तीन कार्यकर्ताओं की मौत हो गई है। बीते दिनों आम चुनाव के दौरान भी कई दफा हुई हिंसा, झड़प, संघर्ष में कई लोगों को मौत नसीब हो गई, किन्तु क्या यह विचारधारा का संघर्ष है या फिर व्यक्तिगत अहम की टकराहट। बंगाल की राजनीतिक बिसात पर खेलने वाले मोहरों की व्यक्तिगत लड़ाई और सम्प्रभुता का दोगला चेहरा भी बंगाल की हवा को ख़राब करके जनसामान्य को इस आग में झोंक रहें है। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस समेत तमाम राजनीतिक दलों ने राजनीतिक शतरंज की बिसात पर गोटियां बिछाने की कवायद तेज़ करके जनता को मरने पर मजबूर कर दिया। वैसे बंगाल में जुबानी जंग का तो इतिहास रहा है, वर्ष 1952 से ही राज्य में होने वाले हर चुनाव का अभिन्न हिस्सा यही जुबानी जंग रही है, दीवारों पर ऐसे-ऐसे चुभते नारे लिखे जाते थे जो आम लोगों की जुबान पर चढ़ जाते हैं और इसका परिणाम जनता को भड़का कर हमेशा राज्य की शांति को कमजोर किया गया है।

सत्ता की प्रतिध्वनियाँ सदा से ही बंगाल में जहर बो रही थी, आज भी हालात वैसे ही है। आखिर क्या बंगाल के भाग्य में यही लिखा है कि सत्ता हमेशा अपने फायदे के लिए जनमत का इस्तेमाल करेगी। आज सत्तासीन दल जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों पर चोट कर रही हैं। टीएमसी द्वारा अपने भाजपा विरोधी एजेंडे के चलते जनता को जय श्री राम तक कहने पर पाबन्दी का फरमान सुनाना शुरू कर दिया, जो राज्य की राजनीति में नया तो है ही, साथ ही राष्ट्रविरोधी भी है। क्योंकि जनता का संवैधानिक अधिकार है उसका धर्म, विचार, मौलिकता, चयन आदि। इन सभी तमाम विवादों की वजहें राजनीति की बिसात पर चल रहे शह और मात के खेल में वह रणनीति है जिसमें जनता कहीं शामिल नहीं बल्कि राजनैतिक लोगों के अहम की पराष्ठा सर्वोपरि है।

आज के हाल में जिस तरह से तृणमूल जो बंगाल के साथ बचपना कर रही है वो बंगाल के भविष्य के लिए खतरा है। जैसे एक व्यक्ति से बुराई करने, व्यक्ति की बुराई करने से उस व्यक्ति की छवि का नुकसान होता है वैसे ही यही सन्दर्भ किसी राज्य के परिपेक्ष में लिया जाए  तो इन हालातों का असर राज्य के व्यापार, व्यवस्था, शिक्षा, प्रगति आदि पर सीधे तौर पर पड़ता है। उदाहरण के लिए 'कश्मीर' हमारे सामने मुहँ बाहें खड़ा है। कश्मीर की आय का मुख्य स्त्रोत पर्यटन है और कश्मीर के हालातों, पत्थरबाजों की करतूतें, आतंक का समर्थन या सेना का विरोध अमूमन देश के पर्यटकों को कश्मीर की तरफ आकर्षित तो नहीं कर रहा बल्कि दूर कर रहा है, उन्हें डरा भी रहा है। जिसका सीधा असर कश्मीर की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।

यही हाल अब बंगाल के साथ होते जा रहा है, रोहिंग्या का खेल, बांग्लादेशियों को पनाह देना, राज्य में राजनैतिक खून-ख़राबा होना, धार्मिक विरोध, धार्मिकता का कुत्सित प्रयास जो चेहरा बंगाल का बनता जा रहा है, वो जनता के लिए तकलीफदेह होगा। जनता का काम प्रभावित होगा, देश के अन्य राज्यों से व्यापार,पर्यटन, शिक्षा आदि सब प्रभावित होगा। न केवल प्रभावित होगा बल्कि बंगाल को राष्ट्र से अलग-थलग करके कमजोर कर देगा। इसलिए जनता को समझना होगा कि किस तरह से राजनीती जनता का उपयोग करके उनका तो स्वार्थ सिद्ध कर ही रही है, साथ ही राज्य को तहस-नहस कर देगी। जनता को समझदारी से राजनीती के प्रभाव से बाहर निकल कर पुनः बंगाल के गौरव की स्थापना करना होगी अन्यथा राज्य भी कमजोर और राजनीती भी दुराग्रही हो जाएगी।   



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