मानव का रक्त नालियों में नहीं बल्कि मानव की नाड़ियों में बहना चाहिए
| Rainbow News - Jun 17 2019 4:35PM

संयुक्त राष्ट्र संघ की वैश्विक स्वास्थ्य इकाई विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने वर्ष 1997 में 100 फीसदी स्वैच्छिक रक्तदान नीति की नींव डाली और विश्व के सभी देशों में स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने का संकल्प दोहराया। लोगों को रक्तदान के अभियान में शामिल करने के लिए वर्ष 2004 से 14 जून को विश्व रक्तदान दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया गया। रक्तदान का उद्देश्य यह रखा गया कि सुरक्षित रक्त उत्पादों की आवश्यकता के बारे में जागरूकता बढ़ाना और रक्तदाताओं के सुरक्षित जीवन रक्षक रक्त स्वैच्छिक रूप से दान करने के लिए आभार व्यक्त करना है।

-प्रदीप कुमार सिंह 

    विश्व स्वास्थ्य संगठन विश्व के देशों के स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आपसी सहयोग एवं मानक विकसित करने की संस्था है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के 194 सदस्य देश तथा दो संबद्ध सदस्य हैं। इस संस्था की स्थापना 7 अप्रैल 1948 को की गयी थी। इसका उद्देश्य संसार के लोगांे के स्वास्थ्य का स्तर ऊँचा करना है। डब्लूएचओ का मुख्यालय स्विटजरलैंड के जेनेवा शहर में स्थित है। भारत भी विश्व स्वास्थ्य संगठन का एक सदस्य देश है और इसका भारतीय मुख्यालय भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित है।             

    वर्ष 1930 में शरीर विज्ञान में सराहनीय कार्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित विख्यात आस्ट्रियाई जीव विज्ञानी और भौतिकीविद् कार्ल लेण्डस्टाइनर (जन्म- 14 जून 1868 तथा मृत्यु- 26 जून 1943) के जन्मदिवस पर विश्व रक्तदान दिवस मनाया जाता है। आधुनिक ब्लड ट्रांसफ्यूजन के पितामह कहे जाने वाले लेण्डस्टाइनर ने रक्त का अलग-अलग रक्त समूहों ए, बी, ओ में वर्गीकरण कर चिकित्सा विज्ञान में अह्म योगदान दिया था।

    रक्तदान को महादान कहा गया है। बिना किसी आर्थिक लाभ की इच्छा से रक्तदान करने वाले रक्तदाता अत्यधिक सम्मान के पात्र हैं। इन्हें बढ़ावा देकर एचआईवी, हैपेटाइटिस-बी, हैपेटाइटिस-सी व सिफलिस के मामलों में बड़ी मदद मिल सकती है। हमारे देश में बड़े आपरेशनों में 27 प्रतिशत दुर्घटना के कारण होने वाली सर्जरी, 13.5 प्रतिशत कैंसर से जुड़े उपचार और 4.5 प्रतिशत गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताओं में एनीमिया, थैलेसीमिया और हेमोफीलिया के पीडितों को भी नियमित खून चढ़ाए जाने की आवश्यकता होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का उद्देश्य 2020 तक पूरे विश्व में स्वैच्छिक और अवैतनिक रक्त दाताओं द्वारा पर्याप्त रक्त की आपूर्ति प्राप्त करना है। 

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के अन्तर्गत 130 करोड़ जनसंख्या वाले हमारे देश भारत में साल में एक करोड़ यूनिट रक्त की जरूरत होती है लेकिन उपलब्ध 70-75 लाख यूनिट ही एकत्रित हो पाता है। यानी करीब 25-30 लाख यूनिट रक्त के अभाव में हर साल सैंकड़ों मरीज दम तोड़ देते हैं। एक आंकड़े के अनुसार भारत में हर दिन करीब 38,000 लोगों को रक्त की जरूरत पड़ती है। वहीं करीब 12,000 लोगों की खून की कमी के कारण जान चली जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार केवल एक प्रतिशत और अधिक रक्तदाताओं का रक्तदान के लिए आगे आना उनके देश की रक्त की आवश्यकता की पूर्ति कर देती है।

    विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में अभी भी अधिकांश लोग यह समझते हैं कि रक्तदान से शरीर कमजोर हो जाता है और उस रक्त की भरपाई होने में महिनों लग जाते हैं। यहाँ भ्रम इस हद तक फैला हुआ है कि लोग रक्तदान का नाम सुनकर ही घबरा जाते हैं। ऐसी गलत सोच होने से क्या इससे पर्याप्त मात्रा में रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकती है? 

    चिकित्सकों के अनुसार रक्तदान से मनुष्य के शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव निम्न प्रकार हैं :-

1.    मनुष्य के शरीर में रक्त बनने की प्रक्रिया हमेशा चलती रहती है और रक्तदान से कोई भी नुकसान नहीं होता बल्कि यह तो बहुत ही कल्याणकारी कार्य है। 
2.    रक्तदान के सम्बन्ध में डाक्टरों द्वारा कहा जाता है कि कोई भी स्वस्थ्य व्यक्ति जिसकी उम्र 16 से 60 साल के बीच हो, जो 45 किलोग्राम से अधिक वजन का हो और जिसे कोई भी बड़ी बीमारी न हो जैसे एचआईवी, हेपाटिटिस बी या हेपाटिटिस     वह रक्तदान कर सकता है।    
3.     रक्तदाता से एक बार में 350 एमएल माने एक यूनिट रक्त लिया जाता है, उसकी पूर्ति शरीर में चैबीस घण्टे के अन्दर हो जाती है और गुणवत्ता की पूर्ति 21 दिनों के भीतर हो जाती है। दूसरे जो व्यक्ति नियमित रक्तदान करते हैं उन्हें हृदय सम्बन्धी बीमारियां कम परेशान करती हैं।
4.    शाकाहारी तथा मांसाहारी व्यक्ति रक्तदान कर सकते हैं। खून देने पर तकलीफ नहीं होती है सुई की हल्की चुभन के अलावा कोई दर्द नहीं होता। सभी स्वास्थ्य केंद्र खून लेने के मानक तरीके अपनाते हैं। लगभग 30 मिनट में खून देने की प्रक्रिया पूरी हो जाती है।
5.     रक्तदान से दो-तीन घंटे पहले पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं व भरपेट भोजन करें। इससे खून में शुगर की मात्रा स्थिर रहती है। 
6.    रक्त की संरचना ऐसी है कि उसमें समाहित लाल रक्त कोशिकाएँ तीन माह में (120 दिन) स्वयं ही मर जाती हैं, लिहाजा प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति तीन माह में एक बार रक्तदान कर सकता है। जानकारों के मुताबिक आधा लीटर रक्त तीन लोगों की जान बचा सकता है।
7.    चिकित्सकों के मुताबिक रक्त का लम्बे समय तक भण्डारण नहीं किया जा सकता है। 
8.    रक्तदान करने वाले को लगवे की बीमारी नहीं होती है शरीर में ब्लाकेज की संभावना खत्म हो जाती है।
9.    महिलायें रक्तदान नहीं कर सकती यह कहना गलत है। रक्तदान करने से खून पतला रहता है जिससे हृदय आघात में 50 प्रतिशत तक लाभ होता है। लीवर की समस्या कम हो जाती है। शरीर में आयरन की ज्यादा मात्रा है तो वह संतुलित हो जाती है। मोटे लोगों को वजन घटाने में रक्तदान सहायक होता है। रक्तदान करने से लगभग 600-700 तक कैलरी कम हो जाती है। रक्तदान करने से स्फूर्ति तथा मानसिक संतुष्टि प्राप्त होती है। 
10.    रक्त देने से रोगी को नया जीवन मिलता है साथ ही रक्तदाता को भी अनेक फायदे होते हैं। रक्तदान से जीवन और भी स्वस्थ हो जाता है। विषेले पदार्थ शरीर से निकल जाने से की शरीर की सफाई हो जाती है। रक्तदाता का हीमोग्लोबिन लेबिल 12.5 प्रतिशत होना चाहिए। रक्तदान के समय ब्लड प्रेशर सामान्य होना चाहिए। हमें अपना ब्लड़ गु्रप मालूम होना चाहिए। रक्तदान के बाद जूस तथा हरी-सब्जी खानी चाहिए। रक्त कोई औषधी नहीं है। इसे किसी फैक्ट्ररी में नहीं बनाया जा सकता। रक्त प्राप्त करने का एकमात्र स्रोत मनुष्य ही है। जानवर का रक्त किसी मनुष्य को नहीं चढ़ाया जा सकता। रक्तदान नई कोशिकायें बनाने में मदद करता है। शरीर में ब्लड का संचार खून पतला होने से अच्छा होेता है। रक्तदान के बाद रक्त की जांच होती है इससे यदि हमें किसी प्रकार की बीमारी है तो उसका समय से पता चल जाता है। 
11.    रक्तदान एक हानिरहित प्रक्रिया है मानव शरीर में 4 से 5 लीटर तक रक्त होता है। रक्त की एक बूंद भी अनमोल है। स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में 900 एमएल का रक्त रिजर्व में होता है। रक्तदान के समय रिजर्व 900 एमएल में से 350 एमएल रक्त लिया जाता है। रक्त मानव शरीर में कार्य करने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जो इस प्रकार हैं - 1. ऊतकों को आक्सीजन पहुँचाना। 2. पोषक तत्वों को ले जाना जैसे ग्लूकोस, अमीनो अम्ल और वसा अम्ल (रक्त में घुलना या प्लाज्मा प्रोटीन से जुड़ना जैसे- रक्त लिपिड)। 3. उत्सर्जी पदार्थों को बाहर करना जैसे- यूरिया कार्बन, डाई आक्साइड, लैक्टिक अम्ल आदि। 4. प्रतिरक्षात्मक कार्य। 5. संदेशवाहक का कार्य करना, इसके अन्तर्गत हार्मोन्स आदि के संदेश देना। 6. शरीर पी. एच. नियंत्रित करना। 7. शरीर का ताप नियंत्रित करना तथा शरीर के एक अंग से दूसरे अंग तक जल का वितरण रक्त द्वारा ही सम्पन्न होता है।
12.    रक्तकण तीन प्रकार के होते हैं, लाल रक्त कणिका, श्वेत रक्त कणिका और प्लैटलैट्स। लाल रक्त कणिका श्वसन अंगों से आक्सीजन ले कर सारे शरीर में पहुंचाने का और कार्बन डाईआक्साईड को शरीर से श्वसन अंगों तक ले जाने का काम करता है। इनकी कमी से रक्ताल्पता (अनिमिया) का रोग हो जाता है। शरीर में आक्सीजन की पूर्ति रूक जाने का परिणाम मृत्यु है। श्वैत रक्त कणिका हानिकारक तत्वों तथा बीमारी पैदा करने वाले जिवाणुओं से शरीर की रक्षा करते हैं। प्लेटलेट्स रक्त वाहिनियों की सुरक्षा तथा खून बनाने में सहायक होते हैं। 

    देश में एक केंद्रीय रक्त बैंक की स्थापना की जानी चाहिए जिसके माध्यम से पूरे देश में कहीं पर भी रक्त की जरूरत को पूरा किया जा सके। इण्टरनेट के युग में हुए विकास के बाद निजी तौर पर वेबसाइट्स के माध्यम से ब्लड बैंक व स्वैच्छिक रक्तदाताओं की सूची को बनाने का कार्य आरंभ हुआ है। आजकल कई ब्लड बैंक हैं जो आनलाइन सुविधाएं भी दे रहे हैं। ये पूरी तरह सुरक्षित प्रक्रिया है। विश्व भर में रेडक्रास संस्था रक्तदान को स्वैच्छिक बनाने की दिशा में अच्छा कार्य कर रही है। विश्व की सरकारों और विभिन्न स्वयं सेवी संगठनों को ब्लड कैंप और मोबाइल कैंप लगा कर लोगों को रक्तदान के लिए प्रेरित करना चाहिए। देश की अधिकांश गांव में निवास करने वाली जनता को रक्तदान की महिमा समझाई जाए ताकि वे किसी की जान बचाने की संवेदना तथा नाजुक स्थिति को समझ सकें और जब भी जरूरत हो इस पुनीत कार्य से पीछे ना हटें। 

    झारखंड सरकार ने अपने कर्मचारियों के बीच स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने के क्रम में कामकाजी दिवस पर स्वेच्छा से रक्तदान करने वाले कर्मचारियों के लिए चार दिन के विशेष आकस्मिक अवकाश (सीएल) देने का निर्णय लिया है। इसी तरह के प्रयास राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्र तथा राज्य सरकारों तथा निजी संस्थाओं को देशवासियों को स्वैच्छिक रक्तदान के लिए प्रेरित करने के लिए करना चाहिए। स्कूल, कालेज तथा विश्वविद्यालयों को अपने प्रांगण में रक्तदान शिविर लगाकर युवा पीढ़ी को रक्तदान के लिए प्रेरित करना चाहिए। रक्तदाता को प्रोत्साहन देने के लिए प्रशंसा प्रमाणपत्र जारी करना चाहिए। अन्त में हमारा सुझाव है कि सम्पूर्ण स्वस्थ जीवन जीने के लिए विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को योग, आसन तथा व्यायाम को अपनी दिनचर्या में विशेष स्थान देना चाहिए। प्रातःकाल जल्दी उठकर आसपास के पार्क में जाकर भरपूर आक्सीजन लेनी चाहिए। जीवन के प्रति सदैव सकारात्मक तथा न्यायपूर्ण दृष्टिकोण रखना चाहिए। विश्वव्यापी स्वरूप धारण कर चुकी संतुलित शिक्षा (भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक तीनों तरह की शिक्षा) तथा योग दो ऐसे सशक्त माध्यम हैं जो तन से, मन से, अर्थ से तथा आत्मा से सम्पूर्ण स्वस्थ विश्व का निर्माण कर सकते हैं। 

    अब 21वीं सदी में लोकतंत्र को देश की सीमाओं से निकालकर प्रत्येक विश्व नागरिक को वैश्विक लोकतांत्रिक व्यवस्था के गठन के बारे में सोचना तथा कार्य करना चाहिए। तभी हम अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, परमाणु शस्त्रों को होड़ तथा युद्धों की तैयारी में होने वाले खर्चें को बचाकर उस विशाल धनराशि को विश्व के प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ, सुखी तथा समृद्ध बनाने में नियोजित कर सकेंगे। हमें यह मानव जीवन किसी का खून बहाने के लिए नहीं, वरन् रक्तदान करके जीवनदान करने के महान उद्देश्य के लिए मिला है। अब मानवता के मंच पर एकजुट होकर कर दे ऐलान कि मानव का रक्त नालियों में नहीं बल्कि मानव की नाड़ियों में बहना चाहिए।



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