आओ चलें एक पेड़ लगाएं...  
| -Nirmal Rani - Jul 10 2019 1:20PM

                                      तेज़ रफ़्तार ज़िन्दिगी के इस दौर में हम इतने आगे निकलते जा रहे हैं की ज़िंदिगी  की सबसे महत्वपूर्ण ज़रूरतों को हम न केवल पीछे छोड़े जा रहे हैं बल्कि इन ज़रूरतों की तरफ़ से प्रायः हम अपनी आँखें भी बंद किये बैठे हैं। यह ज़रूरतें भी ऐसी हैं जिनके बिना प्राणी के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इतना ही नहीं बल्कि प्रकृति प्रदत्त इन बेशक़ीमती चीज़ों का कोई दूसरा विकल्प भी नहीं है। क़ुदरत द्वारा अपने प्राणियों को मुफ़्त में दी गई यह अमूल्य नेमतें हैं हवा अर्थात ऑक्सीजन एवं पानी। पृथ्वी की संरचना के समय प्रकृति द्वारा जीवनोपयोगी समस्त तत्वों की पूरी तरह से संतुलित व समीकरण के मुताबिक़ ही उत्पत्ति की गई थी। प्रकृति ने हमें स्वच्छ एवं पर्याप्त जल दिया जिसके बिना हम चंद  दिन भी ज़िंदा नहीं रह सकते। हरे भरे पेड़ों के असीमित जंगल दिए जो हमें ऑक्सीजन भी देते हैं तथा सम्पूर्ण पृथ्वी के लिए सबसे लाभदायक व ज़रूरी, वर्षा कराने में अपनी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। इस प्रकार की और असंख्य चीज़ें क़ुदरत ने हमें अता की हैं जिनका प्रकृति हमसे कोई मूल्य भी नहीं लेती। यह भी कहा जा सकता है कि संसार में सभी कल कारख़ानों में निर्मित होने वाली कोई भी चीज़ ऐसी नहीं जिसकी आधार सामग्री या कच्चा माल क़ुदरत द्वारा अता किया गया न हो। 

                                       हालाँकि प्रकृति अपनी अता की गई नेमतों के बदले में तो हमसे कुछ भी नहीं मांगती परन्तु हम मानव जाति के स्वयंभू "शिक्षित व ज्ञानवान " लोग इन बेशक़ीमती प्रकृतिक चीज़ों की क़ीमत देना या इसके बारे में सोचना तो दूर,हम उस प्रकृति का उसकी असीम कृपा व नवाज़िशों का शुक्र तक अदा करना अपनी झूठी शान के ख़िलाफ़ समझते हैं। बात सिर्फ़ इतनी भी नहीं कि हम क़ुदरत से एहसान फ़रामोशी करते हैं और उसके एहसानों का शुक्र अदा नहीं करते। बल्कि बात तो यहाँ तक पहुँच चुकी है कि विकास,प्रगति,आधुनिकता तथा विज्ञान के नाम पर मची विश्वव्यापी अंधी दौड़ में हम अपने जीवन के लिए जल,वायु तथा वृक्ष की ज़रूरतों की अनदेखी कर जल और वृक्ष दोनों के ही स्वयं दुश्मन बन बैठे हैं। अनावश्यक जल दोहन करना तथा इसे बर्बाद करना तो हमें ख़ूब आता है परन्तु जल संरक्षण करना या जल की अहमियत को समझना हम नहीं जानते। मकानों के निर्माण से लेकर फ़र्नीचर,काग़ज़ व गत्ते आदि बनाने की लिए वृक्षों को काटना तो हमें आता है परन्तु वृक्ष लगाना हम ज़रूरी नहीं समझते। इन सब चीज़ों की बर्बादी का ठेका तो हमने ले रखा है परन्तु जल जंगल के संरक्षण या इसे सुचारु रखने की उम्मीदें हम सरकार से लगाए रहते हैं। गर्मी में धूप से बचने के लिए यहाँ तक कि अपने वाहन को खड़ा करने के लिए,अपनी रेहड़ी दुकान आदि लगाने के लिए हर व्यक्ति छायादार वृक्ष की तलाश करता है।परन्तु छाया ढूंढने वाले इन्हीं लोगों से पूछिए कि इनमें से कितने लोग ऐसे हैं जो वृक्ष लगाकर अपने ही मानव समाज के लिए छाया का प्रबंध करते हैं ?कथित विकास की इस अंधी दौड़ ने केवल मानव का ही नहीं बल्कि पशु पक्षियों का जीवन भी नर्क के सामान बना दिया है। मानवीय ग़लतियों का ही नतीजा है की आज पशु पक्षियों द्वारा इस्तेमाल में लाए जाने वाले तालाब ,झीलें,जोहड़,बड़े बड़े पेड़, घास के मैदान,हरियाली आदि इतिहास की बातें बनकर रह गए हैं। 
                                       निश्चित रूप से मानव समाज की इन्हीं "कारगुज़ारियों " की वजह से पृथ्वी का तापमान अकल्पनीय रूप से बढ़ता जा रहा है। बुद्धिजीवी वैश्विक समाज ने इसे ग्लोबल वार्मिंग का नाम दिया है। और अब इस ग्लोबल वार्मिंगसे निपटने के लिए आए दिन अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन आयोजित किये जा रहे हैं। इससे बचने व इसे कम करने के उपाए ढूंढें जा रहे हैं। दुनिया के कई "चौधरी" देश ख़ुद तो विकास के नाम पर धुआँ उगलने की रोज़ नई चिमनियां बना रहे हैं,वातावरण को ज़हरीला बनाने वाले शस्त्र निर्मित कर रहे हैं,पहाड़ों को काट काट कर उसका भूगोल बदल रहे हैं,पर्वत की छाती को चीर कर तो कहीं भूतलीय सुरंगों का निर्माण कर रहे हैं। परन्तु जब पर्यावरण के यही दुश्मन विश्व पंचायत में कहीं इकठ्ठा होते हैं तो एक दूसरे को प्रदूषण फैलाने व  ग्लोबल वार्मिंग का ज़िम्मेदार बताते हैं। इन्हीं "विकास दूतों " की विकास की होड़ का नतीजा है कि अब आम लोगों को पानी ख़रीद कर पीना पड़ रहा है। मुंह पर मास्क लगाकर घर से बाहर निकलना मजबूरी बन चुकी है। और तो और स्वच्छ ऑक्सीजन लेने के लिए भी अब "ऑक्सीजन बॉर" खुलने लगे हैं। यानी वह वक़्त भी आ चुका है कि हमें पानी ही नहीं बल्कि सांस लेने के लिए ऑक्सीजन भी ख़रीदनी पड़ेगी। गोया हमारे "विकास" और पर्यावरण के प्रति हमारी नकारात्मक सोच व लापरवाही ने हमें जाने अनजाने उस मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है जहाँ एक घूँट पीने का साफ़ पानी और साफ़ सुथरी एक सांस भी ख़रीदनी पड़ेगी और ख़रीदनी पड़ रही है। 
                                       ज़रा सोचिये जिस देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा दो वक़्त की रोटी ख़रीद कर नहीं खा पाता,जहाँ किसान,ग़रीब मज़दूर सिर्फ़ क़र्ज़ या आर्थिक तंगी के चलते आत्म हत्या करने को मजबूर हो जाते हों जो लोग जंगलों में अपनी विरासत को बचने के लिए दशकों से जूझ रहे हों और बड़े उद्योगपति, सरकार के सहयोग से उनके जल जंगल और ज़मीन पर क़ब्ज़े कर रहे हों वह ग़रीब व आदिवासी क्या पानी की बोतलें ख़रीद कर साफ़ पानी पीने की कल्पना कर सकते हैं ? क्या इनसे ऑक्सीजन बार में स्वच्छ सांस ख़रीदने की उम्मीद की जा सकती है? यदि नहीं तो देश के इस बड़े ग़रीब व असहाय वर्ग का रखवाला कौन है ? औद्योगिक घरानों,राजनीतिज्ञों,धनाढ्य लोगों तथा विकास के स्वप्नदर्शी लोगों ने तो धरती व पर्यवारण का जो सत्यानाश करना था वो कर ही लिया। बल्कि या सिलसिला अभी भी जारी है। पिछले दिनों एक विचलित कर देने वाली यह रिपोर्ट सुनने को मिली कि पूरी पृथ्वी को अकेले ही 20 प्रतिशत ऑक्सीजन देने वाले आमेज़ॉन के जंगल सरकारी संरक्षण में 2000 फ़ुटबाल के मैदान के बराबर प्रतिदिन काटे जा रहे हैं। यह काम भी विकास के लिए और पशुओं के लिए चरागाह बनाने के नाम पर किया जा रहा है। पूरा विश्व तथा पर्यावरण के प्रति चिंता रखने वाले लोग इस ख़बर से बहुत दुखी व परेशान हैं। कहाँ तो पर्यावरण संरक्षण के उपाए किये जा रहे थे तो कहाँ वैश्विक स्तर पर जलवायु को नियंत्रित करने वाला धरती का मुख्य स्रोत यानी अमेज़ॉन के वन ही समाप्त होने जा रहे हैं ?
                                         उपरोक्त हालात में एक बात तो स्पष्ट दिखाई दे रही है कि सरकारों या दुनिया चलाने वाले दूसरे तंत्रों के भरोसे पर स्वयं हाथ पर हाथ रखकर बैठने से पर्यावरण का संरक्षण क़तई नहीं होने वाला। इनकी पहली प्राथमिकता ही औद्योगीकरण,विकास,कंक्रीट के जंगल बनाना,बेदर्दी से जल दोहन करना तथा जंगल व पहाड़ की बर्बादी है। वृक्षारोपण करना या इसके लिए चिंतित होना तो शायद दिखावा मात्र है। इसलिए यह हम साधारण मध्य व निम्न वर्ग के लोगों का ही न केवल कर्तव्य बल्कि हमारा धर्म भी है कि हम में से प्रत्येक व्यक्ति स्वयं अपने प्रयासों से वृक्षारोपण करे। जिस प्रकार हम लंगरों,भंडारों व धार्मिक समागमों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते हैं उसी जोश जज़्बे और हौसले के साथ हम वृक्षारोपण की भी मुहिम शुरू करें और इसमें हिस्सा लें। पिछले दिनों इसी तरह का जज़बा रखने वाले सिख समाज के भाइयों का एक अनूठा लंगर देख कर आत्मा भी प्रसन्न हुई और उम्मीदें भी जगीं । पंजाब में सिख भाइयों द्वारा लंगर में बड़ी तादाद में लोगों को प्रसाद के रूप में पौधे वितरित किये गए।और लोगों द्वारा बड़े हर्ष व उत्साह के साथ इन पौधों को स्वीकार किया गया। देश व दुनिया के हर समाज सेवी व निजी संगठनों को यही करना चाहिए। एक वक़्त की रोटी खिलाकर पुण्य कमाने की मनोकामना करने के बजाए हमें जलवायु संरक्षण के लिए तथा पृथ्वी व अपनी नस्लों को बचने के लिए पौधों का दान लेना व देना चाहिए। इस मुहिम को चलाने के लिए इंतेज़ार करने का अब वक़्त बिलकुल नहीं रहा। बल्कि हमें इस दिशा में क़दम बढ़ाने में काफ़ी देर हो चुकी है। आइये मानसून के इसी मौसम में हम संकल्प लें और अपने जीवन में जब और जहाँ भी संभव हो हवादा, फलदार और छायादार दरख़्त की पौध ज़रूर लगाएं। धरती के स्वयंभू ठेकेदारों की प्राथमिकताएं हथियारों का उत्पादन, सामाजिक विभाजन, दंगा फ़साद झूठ, भ्रष्टाचार, धर्म व जाति के नाम पर विभाजन व पाखंड करना, पर्यावरण को नुक़्सान पहुँचाना व अपने उद्योगपति आक़ाओं को लाभ पहुँचाना है। यह पृथ्वी हमारी है, हमें ही इसे बचाना चाहिए और हम ही इसे बचा भी सकते हैं। इसलिए आओ, जीवन दायिनी पृथ्वी को बचाएं। आओ चलें एक पेड़ लगाएं।  



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