प्राचीन मान्यताओं पर आधारित है तकनीक के नवीन संस्करण
| Dr. Ravindra Arjariya - Jul 16 2019 1:21PM

सामाजिक प्राणी के रूप में मनुष्य के दायित्वों का अनुशासनात्मक स्वरूप बेहद पेचीदा होता है। व्यक्तिगत रिश्तों से लेकर व्यवसायिक संबंधों तक की दुहाई पर कार्य करने की बाध्यता होती है। समय के विभाजन को लचीला बनाना पडता है। इसी अनुबंध के अनुपालन में मां चंद्रिका महिला महाविद्यालय में आयोजित एक कार्यशाला में उपस्थिति दर्ज करना अनिवार्य थी। संस्था के महाप्रबंधक अरविन्द सिंह कुछवाह तथा कार्यक्रम संयोजक डा. संतोष पटैरिया के आत्मीय आमंत्रण पर निर्धारित समय पर पहुंच गये। महाविद्यालय के निर्देशक अभयवीर सिंह ने मुख्य द्वार पर भावभरी अगवानी करके हमें अतिथि कक्ष तक पहुंचाया जहां कार्यशाला के मुख्य अतिथि प्रो. एस.एम. राव सहित अनेक विशिष्टजन मौजूद थे। श्री कुछवाह ने अन्य अतिथियों से हमारा परिचय करवाया। प्रो. राव की सादगी और उनके परिचय ने हमें खासा प्रभावित किया।

भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र मुम्बई के उल्लेखनीय कार्यकाल से लेकर नासा तक की उपलब्धियों ने उन्हें न केवल परमाणु क्षेत्र का ही नहीं बल्कि तकनीक से जुडे विभिन्न आयामों तक का स्थापित हस्ताक्षर निरूपित कर दिया है। हमने उनसे भू मण्डलीय ताप में निरंतर हो रही वृद्धि के कारण और समाधानों को जानने की कोशिश की। विश्व के विभिन्न शोध संस्थानों के परिणामों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि वैश्विकस्तर पर इस दिशा में केवल चिंता ही नहीं हो रही है बल्कि चिन्तन भी हो रहा है, शोध भी हो रहा है और प्राप्त परिणामों को धरातल पर उतारा भी जा रहा है। कार्बनडाई आक्साइज जैसी हानिकारक गैसों से लेकर घातक कचडे से निजात पाने के उपाय भी खोजे गये हैं। कचडे से विद्युत बनाने की विधि निकाल ली गई है। देश के विभिन्न स्थानों पर इस पद्धति का उपयोग भी शुरू हो गया है।

गोबर सहित अनेक परम्परागत उपयोगी सामग्री से कार्बनडाई आक्साइज के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है। अत्याधुनिक संसाधनों का अंधा अनुशरण भी घातक होता है। हमने बीच में ही उनकी बात को काटते हुए परमाणु विस्फोटों से उत्पन्न होने वाली घातक किरणों से पर्यावरण पर नकारात्मक परिणामों की समीक्षा हेतु निवेदन किया। उनके चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कुराहट फैल गई। परमाणु विस्फोटों के दौरान किये जाने वाले सुरक्षात्मक उपायों की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि ज्यादातर परीक्षण जमीन के नीचे किये जाते हैं। कचडा जमीन के अन्दर ही दफन हो जाता है परन्तु रेडिएशन जरूर सतह पर फैलता है। यह रेडिएशन भी निर्धारित समय में स्वमेव ही समाप्त हो जाता है।

हमने एनटीपीसी के थर्मल पावर प्लांट जैसे उपक्रमों की ओर उनका ध्यानाकर्षित करते हुए जमीनों के बंजर होने, निवासियों के रोगग्रस्त होने तथा पर्यावरणीय संतुलन बिगडे जैसी स्थितियों को रेखांकित किया तो उन्होंने जर्मनी के भूमिगत प्लांटों का उदाहरण देते हुए कहा कि विदेशों में उन्नत तकनीक का उपयोग हो रहा है। जबकि हम अभी भी तकनीक के प्रारम्भिक ढंग पर ही अटके हुए हैं। देश की प्राचीन मान्यताओं पर आधारित है तकनीक के नवीन संस्करण। पशुपालन से लेकर गोबर के उपयोग तक को नये अनुसंधान आवश्यक बताते हैं। मिट्टी के गोल चूल्हों पर छोटी सी लकडी से पूरे परिवार का पौष्टिक भोजन तैयार हो सकता है। अंकुरित अनाजों के सेवन से स्वास्थ्य संवर्धन की संभावना प्रबल होती है। कच्चे रास्तों और नालियों वाले गांवों में जल की समस्यायें कम होतीं है।

धरती में जलस्तर बढाने के लिए बरसात के पानी का अवशोषण आवश्यक है और बरसात के लिए पेडों की उपस्थिति नितांत जरूरी। पौधारोपण और उनके संरक्षण के बिना पेडों संख्या में इजाफा असम्भव है और इसके लिए मानव में प्रकृति मित्र की भावना जागृत होना चाहिए। कुल मिलाकर प्राकृतिक संतुलन के बिना जीवन की स्वस्थ सांसों की कल्पना करना किसी मृगमारीचिका के पीछे भागने जैसा ही है।  चर्चा चल ही रही थी कि महाविद्यालय के प्राचार्य ने सभी अतिथियों से कार्यशाला हेतु सभागार में चलने का निवेदन किया। हमने प्रो. राव से इस विषय पर निकट भविष्य में विचार विमर्श का आश्वासन लेकर बातचीत को अंतिम पायदान पर पहुंचाया और सभी के साथ सभागार की ओर चल पडे। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। जय हिंद।   



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