आखिर पास हो ही गया तीन तलाक बिल 
| Rainbow News Network - Jul 31 2019 1:53PM

30 जुलाई 2019 का दिन इतिहास में दर्ज हो गया। तीन तलाक विधेयक को राज्य सभा ने अपनी मंजूरी दे दी। लोक सभा से इस बिल को पहले ही मंजूरी मिल गयी थी। सचमुच, महिला सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया यह एक अभूतपूर्व कदम है! तुष्टीकरण के चलते जो न्याय पिछली सरकारें शाहबानो को नहीं दे पायीं थी, वह चिरप्रतीक्षित न्याय वर्तमान सरकार ने शाहबानो के हवाले से मुस्लिम महिलाओं को लगभग 34 वर्ष बाद दिला दिया।

कहना न होगा कि वर्तमान सरकार ने लोकसभा चुनावों में किये अहम वादों में से एक ‘तीन तलाक’ बिल को राज्यसभा से आखिर पास करा ही लिया। अब सिर्फ तीन तलाक बिल पर राष्ट्रपति की मुहर का इंतजार है, जिसके बाद यह कानून बन जाएगा। कानून बनते ही तीन तलाक देने वालों को जेल भेजे जाने का रास्ता साफ हो जाएगा। राज्यसभा में तीन तलाक बिल पर जहां 99 वोट पड़े, वहीं विरोध में 84 वोट आए। इस तरह से 15 वोटों से तीन तलाक बिल को राज्यसभा ने मंजूरी दे दी।

विश्व के सब से बड़े प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र में ‘तीन तलाक’ का प्रावधान,सच में, एक बदनुमा दाग था जिसे हमारी दोनों सांसदों ने बहुमत से साफ़ कर दिया।देर आयद,दुरुस्त आयद।तीन तलाक वाले प्रकरण पर पहले भी खूब विचार-मंथन हुआ था। शाहबानो के केस से इस प्रकरण को जोड़ कर देखा जाय तो स्पष्ट होगा कि वर्तमान सरकार ने अपनी दृढ इच्छा-शक्ति के चलते मुस्लिम महिलाओं को इस बिल से बड़ी राहत पहुंचाई है।   

दरअसल,शाहबानो का केस अपनी किस्म का वाहिद ऐसा केस है जहाँ सत्तापक्ष ने उच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय को संविधान-संशोधन द्वारा चुटकियों में बदलवा दिया था। नारी की अस्मिता,आत्म-निर्भरता,स्वतंत्रता और सशक्तीकरण का दम भरने वाले राजपक्ष ने कैसे वोटों की खातिर (राजनीतिक लाभ के लिए) देश की सब से बड़ी अदालत को नीचा दिखाया,यह इस प्रकरण से जुडी बातों से स्पष्ट होता है।बात कांग्रेस के शासन-काल की है जब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री हुआ करते थे।

हुआ यूँ था कि शाहबानो नाम की एक मुस्लिम औरत को उसके शौहर ने 3 बार ‘तलाक़’ ‘तलाक़’ ‘तलाक़’ कहके उससे पिंड छुड़ा लिया था।शाहबानो ने अपने मियाँ जी को कोर्ट में घसीट लिया।ऐसे कैसे तलाक़ दोगे? खर्चा-वर्चा दो। गुज़ारा भत्ता दो। मियाँजी बोले काहे का खर्चा ? शरीयत में जो लिखा है उस हिसाब से ये लो  मेहर की रकम के और चलती बनो।शाहबानो कोर्ट में चली गयी। मामला सर्वोच्च न्यायालय तक चला गया और अंततः सर्वोच्च न्यायालय  ने शाहबानो के हक़ में फैसला सुनाते हुए उनके शौहर को हुक्म दिया कि अपनी बीवी को वे गुज़ारा भत्ता दें। यह सचमुच एक ऐतिहासिक और ज़ोरदार फैसला था। 

भारत के सर्वोच्च न्यायलय ने सीधे-सीधे इस्लामिक शरीयत के खिलाफ एक मज़लूम औरत के हक़ में फैसला सुनाया था।देखते-ही-देखते पूरे इस्लामिक जगत में हड़कंप मच गया। भारत की न्याय व्यवस्था ने शरियत को चुनौती दी थी। उस समय की सरकार के प्रधानमंत्री राजीव गांधी मुस्लिम नेताओं और कठमुल्लाओं के दबाव में आ गए और उन्होंने फटाफट अपने प्रचंड बहुमत के बल पे संविधान में संशोधन कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटवा दिया और कानून बना के मुस्लिम औरतों का हक़ मारते हुए मुस्लिम शरीयत में न्यायपालिका के हस्तक्षेप को रोक दिया।बेचारी शाहबानो को कोई गुज़ारा भत्ता नहीं मिला। आशा की जानी चाहिए कि ‘तीन तलाक’ बिल के कानून बन जाने से सदियों से पीड़ित मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को न्याय मिलने के साथ-साथ उनको उनका हक भी मिल जायगा।

डॉ० शिबन कृष्ण रैणा



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