स्त्री का घर.....
| Rainbow News - Aug 2 2019 12:48PM

ऐसी छोटी छोटी बातें जिनसे स्त्रियों को हर रोज दोचार होना पड़ता है और वो कई बार मनसे टूटती हैं.. "मां बोर्ड की एग्जाम नजदीक आ रही है, एक्स्ट्रा क्लास लगेगी, अब समय जरा ज्यादा देना पड़ेगा ट्यूशन में" विम्मी मां से बोली। "एग्जाम वैग्जाम तो ठीक है अब जरा चूल्हे चौके पर भी ध्यान दिया करो, ससुराल में पढ़ाई नहीं घर के काम ही काम आएंगे।" मां ने जरा समझाने वाले लहजे में कहा। "मैं कहीं नहीं जाऊंगी, मैं बस यही रहने वाली आपके पास"। लाड़ में आकर विम्मी मां के गले में हाथ डाल कर बोली। "अरी लाडो तू तो पराया धन है ससुराल ही तो तेरा घर है और सभी लड़कियों को जाना पड़ता है। देख मैं नहीं आई अपने घर से यहां" मां बोली। "मां ये पराया धन क्या होता है?" विम्मी ने मां से पूछा।  मां को एकदम से कोई जवाब नहीं सूझा। "बहुत सवाल करती है, चल जा तेरी पढ़ाई कर" और मां सब्जी साफ करने में लग गई।

सब्जी साफ करते करते वह खुद से ही बातें करने लगी, "क्या बताऊं बेटा कि पराया धन क्या होता है अपनों को छोड़कर दूसरों को अपना बनाना होता है। इस नई दुनिया में हमें हमारी पहचान बनानी होती है इस नए घर की वंशवेल से लेकर बूढ़ी हड्डियों तक को सहेजना होता है। फिर भी कहीं ना कहीं एक परायापन रह ही जाता है"। "मां मैं ट्यूशन जा रही हूं 7:00 बजे तक आ जाऊंगी। आधा घंटा लेट क्योंकि सर एक्स्ट्रा टाइम ले रहे हैं" विम्मी कहते हुए अपनी साइकिल पर चली गई। विम्मी की आवाज से मां की विचार श्रंखला टूटी "अरे बहुत देर हो गई अभी सब्जी बनानी बाकी है" सोचते हुए वह उठकर किचन में चली गई। विचार फिर से जेहन से टकराने लगे "जो सोच मैं मेरे घर से लेकर आई थी शायद वही मैं मेरी बेटी को भी दे रही हूं मेरी मां कहती थी कि तेरा असली घर तो ससुराल है, आखिर वहीं तुझे रहना है, सारे सुख दुख वहीं उठाने हैं लेकिन इस सुख दुख को उठाने में और लोगों को अपना बनाने में मैं खुद कहीं खो गई थी। 

विम्मी अब बड़ी हो गई है अब उसे भी यह सब जिम्मेदारी समझानी होंगी। वैसे भी आजकल लड़कियां बहस ज्यादा करती हैं और काम कम और ससुराल जाकर माता-पिता का उद्धार करवा देती है सो अलग, खुद भी दुख पाती हैं और परिवार को भी दुखी करती हैं"। सब्जी बनाकर रोटी सेकते हुए विम्मी की मां अपनी इसी उधेड़बुन में लगी हुई थी। थोड़ी देर बाद पति के पास जाकर बोली, "अरे, सुनो जी"। पति टीवी देखने में व्यस्त थे। "हूं" जवाब दिया। पत्नी बोली, विम्मी अब बड़ी हो गई है उसके लिए कोई ढंग का घर बार देखो, सही समय पर शादी ब्याह हो जाना चाहिए नहीं तो बाद में अच्छा लड़का नहीं मिलेगा"। "हूं, एक दो जगह बात की है ढंग का घर मिलते ही सगाई कर दूंगा"। पति ने कहाऔर फिर टीवी देखने में व्यस्त हो गए।

आखिर वह दिन भी आ ही गया जब विम्मी को देखने के लिए लड़के वाले आए। लड़के लड़की ने एक-दूसरे को पसंद कर लिया और सगाई भी हो गई। लड़की वालों के जाने के बाद विम्मी मां पर भड़क गई, "मां, इतनी जल्दी क्या थी मेरा बी.एड. तो कंप्लीट होने देना था। कहीं पढ़ाई बीच में ही छूट गई तो?" मां ने आश्वासन दिया, "हम तेरी पढ़ाई अधूरी नहीं रहने देंगे और वैसे भी शादी ब्याह समय से हो जाना चाहिए वही सही रहता है"। विम्मी कुछ बोली नहीं लेकिन जरा परेशान हो गई। दूसरे दिन उसने अपने मंगेतर राजन को फोन किया और अपनी परेशानी बताई। "राजन, मेरी पढ़ाई अभी बाकी है एक साल ही बचा है मेरी पढ़ाई को और मुझे वह पूरा करना है"। "तो इस में दिक्कत क्या है?" राजन ने पूछा। "शादी के बाद यह कैसे संभव होगा?" विम्मी ने प्रश्न किया। "एक साल की ही तो बात है, एडजस्ट कर लेंगे तुम्हारी पढ़ाई में रुकावट नहीं आएगी"। राजन ने विम्मी को आश्वस्त किया। कुछ समय बाद दोनों की शादी हो गई और विम्मी एक घर से दूसरे घर में आ गई। नए लोग, नए विचार, नए संस्कार, नया माहौल, रहन सहन अलग, तौर तरीके अलग इन सब से विम्मी को एडजस्टमेंट करना था। शादी के बाद ससुराल में पहले दिन विम्मी जल्दी उठकर नहाकर सास के पास आ गई और उनके पैर छुए। सासूमाँ ने आशीर्वाद दिया और घर के तौर तरीके समझाने लगीं। "देखो बहू, हमारे यहां नाश्ता जरा जल्दी करते हैं और तुम्हारे पापा जी को दो बार चाय की आदत है उन्हें मसाले वाली चाय ही पसंद है। राजन ऑफिस टिफिन ले जाता है उससे पूछ कर ही सब्जी बना लिया करना। मीनू तो दूध और टोस्ट खाकर ही चली जाती है लेकिन घर आते ही भूख - भूख करने लगती है, तो खाना तैयार रखना पड़ता है और देखो बहू कामवाली से ज्यादा बात मत करना यह बहुत जल्दी सिर चढ़ जाती हैं कभी तुमसे पैसे मांगे तो कह देना कि मम्मी जी से बात करो, पैसे का हिसाब किताब वही देखती हैं"। विम्मी को आधा अधूरा समझा लेकिन फिर भी सिर हिला दिया। सासूजी शांत होकर पूजा करने बैठ गई। विम्मी भी सोचने लगी थी क्या एक लड़की एक ही दिन में लड़की से स्त्री बन जाती है या यह मानसिकता है कि एक लड़की शादी के तुरंत बाद सारा घर एक ही दिन में संभाल ले। उसे समझ में नहीं आ रहा था कि काम कहां से शुरू करे। सासूमाँ ने पूजा घर से आवाज लगाई, "अरे बहू पापाजी को चाय दे दे, उनकी चाय का समय हो रहा है"। "जी मम्मीजी"। मैं चाय बनाने लगी।

धीरे-धीरे मैं घर के सारे काम संभालने लगी थी। कभी कभार काम में कुछ गड़बड़ हो जाती तो सासु मां कह देती कि, "तेरी मां ने कुछ सिखाया नहीं तुझे? चीज वस्तु का नुकसान हो यह मुझसे सहन नहीं होता। जरा ध्यान से काम किया करो"। और मैं चुपचाप सब सहेजने लगती। मेरी ननद मीनू कमरे में आती और भाभी भाभी करके मेरा मेकअप का सामान ले जाती। कभी सैंडल, कभी लिपस्टिक या कभी कोई ड्रेस जो भी उसे अच्छा लगता वह ले जाती और मेरे सास खुश होकर कहती "देखो तो ननद भाभी में कैसी बनती है"। उसमें मेरी मर्जी तो देखी ही नहीं जाती थी। मैं बस मुस्कुराकर रह जाती थी। सासूजी अक्सर बात बात में मेरे घर को लेकर  उलाहने दिया करती थीं। हमारे यहां ऐसा होता है, यहां का तो यही रिवाज है जैसी बातें करती थी। मैं भी नई नई थी तो कह देती थी कि अच्छा किया मम्मीजी जो आपने बता दिया। मेरे एग्जाम भी करीब आ रहे थे और तैयारी भी करनी बाकी थी। यहां पर समय मिल नहीं पाता था तो मैंने राजन से घर जाने की बात की। राजन थोड़ा टालमटोल करने लगे। "यहां मम्मी को तकलीफ होगी, उन्हें अब आराम की जरूरत है और वैसे भी तुमने तो घर के सारे काम संभाल लिए हैं और अब पढ़ाई की क्या जरूरत है कोई नौकरी थोड़ी ही करनी है"। मैंने भी कहा, "नौकरी भले ही नहीं करनी है पर मुझे मेरी पढ़ाई पूरी करनी है और कुछ दिन की तो बात है एग्जाम देकर जल्दी वापस आ जाऊंगी"। थोड़ी नानुकुर के बाद राजन मान गए और अपनी मां से बात की। मां ने अनुमति तो दे दी लेकिन बोलीं कि, "अब पढ़ाई का क्या काम है, अपना घर संभाले"। अब मुझसे नहीं रहा गया मैं बोल पड़ी कि,  "मम्मी जी कुछ ही दिन की तो बात है नहीं तो मेरा पूरा साल बर्बाद हो जाएगा बाद में तो घर ही संभालना है"। सास को मेरी बात अच्छी नहीं लगी लेकिन कुछ बोली नहीं सिर्फ इतना ही कहा कि "जब दोनों मन बना बैठे हो तो मुझसे क्या पूछना?" मैंने बहस करना उचित नहीं समझा और मायके जाने की तैयारी करने लगी।

मायके पहुंचकर विम्मी मां से नाराजगी भरे स्वर में बोली, "कहा था न मैंने कि पढ़ाई पूरी कर लेने दो फिर शादी करना पर मेरी सुनी कहां आपने"। मां ने समझाने वाले लहजे में कहा, "फिर अच्छा घर हाथ से निकल जाता"। मैं कुछ नहीं बोली और अपने कमरे में चली गई। अपने कमरे में से अपनी चीजों को गायब पाकर मां को आवाज दिया, "मां मेरे कपड़े कहां रख दिये तुमने और मेरा बैग, मेरा स्पीकर, लैपटॉप कहां रख दिया सब?" मां बोली, "अब तू अपने घर चली गई तो फिर इन चीजों की देखभाल कौन करता? धूल खा रही थी तो सब पलंग के अंदर रख दिया है। अब यहां पर रवि पढ़ाई करता है"। "मतलब अब यह कमरा मेरा नहीं रहा?" विम्मी चिढ़ सी गई थी। "तू जब तक है यहीं रह किसी ने मना थोड़ी किया है"। मां बोली और बाहर चली गई। छोटा भाई रवि चिढ़ाते रहता यह मेरा कमरा है, गंदा मत करो, यह इधर नहीं इधर रखो और हंसते रहता। मैं भी मजाक समझ कर हंस देती। कुछ दिन बाद परीक्षा देकर वापस ससुराल आ गई। कमरे में देखा कि कई चीजें गायब थी, कबर्ड बिखरी हुई थी और कई ड्रेस भी गायब थी। मैंने राजन से नाराजगी भरे स्वर में कहा, "मीनू को समझा दो न कि मेरा सामान मुझसे पूछे बिना हाथ न लगाया करें सब अस्त-व्यस्त कर देती है"। राजन बोले, "अरे ठीक है अभी छोटी है और एक दो चीज ले भी ली तो क्या दिक्कत है? कुछ दिन बाद अपने घर चली जाएगी तब तक शौक पूरे कर लेने दो।" मेरे मन में तुरंत सवाल आया कि क्या यह घर भी उसका नहीं है?  फिर दिमाग को झटक कर अलमारी सही करने लगी और उसमें ताला लगा दिया और घर के कामों में लग गई।

"मम्मीजी शाम को क्या बनाना है?" मैंने पूछा। "देख तेरे पापा जी को ठीक नहीं है तो उनके लिए थोड़ी सी खिचड़ी बना ले और बाकी सब के लिए आलू के पराठे की तैयारी कर ले" सासूमाँ बोलीं। काम निपटा कर मैं अपने कमरे में आराम करने आ गई कॉलेज की बातें सोचते सोचते आंख लग गई मालूम ही नहीं पड़ा कि कब शाम के 6:00 बज गये।  मैं हड़बड़ा कर उठ गई और जल्दी से चाय बनाने के लिए किचन में गई तो देखा कि चाय तो बनी हुई है। मम्मी पापा जी चाय पी रहे थे। मम्मी जी ने एक नजर देखा और फिर चाय पीने लगी उनके चेहरे पर नाराजगी के भाव साफ दिख रहे थे। मैंने सफाई दी कि पता नहीं कैसे ज्यादा सो गई। टाइम मालूम ही नहीं पड़ा और रात के खाने की तैयारी में लग गई। शाम को राजन जब घर आए तो गजरा और एक अंगूठी मेरे लिए लेकर आए। कमरे में मैं जब पानी लेकर गई तो बाहों में भर कर उन्होंने मुझे किस किया और दोनों चीजें मेरे हाथों पर रख दी। मैं बहुत खुश हो गई और बोली, "सुनो रात में कहीं बाहर घूमने चलेंगे। ऐसे ही कहीं चक्कर मार कर आएंगे"। राजन बोले "देखता हूं, जल्दी फ्री हो गई तो चलेंगे"। मैं जल्दी जल्दी काम निपटाने लगी। सबको खाना परोस रही थी कि गलती से गरम पराठा मम्मी जी के हाथ पर गिर गया और उनके हाथ में चटका लग गया। नाराज होकर वो बोली, "क्या बात है बहू काम में मन नहीं लग रहा है क्या? पापा जी की खिचड़ी भी ज्यादा पतली कर दी है और चटनी मे मिर्च ज्यादा हो गयी है। मुझे बोल देती है मैं कर लेती"। मैं कुछ बोल नहीं पाई। राजन सब देख सुन रहे थे बोले, "विम्मी जरा ध्यान रखा करो मम्मी पापाजी को ज्यादा तीखा नहीं चलता है तुम्हें तो पता है ना और पराठे में कम तेल लगाओ मम्मी को एसिडिटी हो जाती है"। मेरा मन खराब हो गया कि अब राजन भी शुरू हो गए। काम निपटा कर कमरे में आ गई। आंख में आंसू आ गए। इतना खराब भी नहीं बना था कि खाया न जा सके और फिर मम्मी जी ने तो दो बातें सुना ही दी थी फिर राजन को बोलने की क्या जरूरत थी। मन ही मन गुस्सा आने लगा था राजन पर। फिर गजरा और अंगूठी बाजू में रख दिए और चुपचाप सो गई खाना खाने का मन नहीं था।

धीरे-धीरे समय बीत रहा था एक नन्हे मेहमान की आहट सुनाई देने लगी थी, मन खुश रहने लगा। मम्मी जी बस एक ही गाना गाती थी कि पोते का मुंह देख लूं फिर सब इच्छा पूरी हो गई मेरी। इन दिनों मेरी तबीयत खराब रहने लगी थी। पेट में पानी भी नहीं टिकता था ऊपर से घर के कामकाज अलग। सासू जी राजन के सामने कहा करती थी, "हमने भी यही दिन निकाले हैं ऐसे ही थोड़े न बच्चे हो गए पर आजकल की लड़कियों के नखरे ही बहुत है। मां बाप के घर नखरे चल जाते हैं लेकिन ससुराल में तो घर के काम संभालना ही पड़ता है। मैं राजन की तरफ देखती लेकिन उन पर कुछ असर नहीं होता। अब मैं धीरे-धीरे थोड़ी जबर हो गई थी। कभी-कभी मम्मीजी के बोलने पर उनको प्रत्युत्तर भी दे देती थी। फिर भले ही राजन नाराज हो जाते थे। अक्सर घर में तनाव हो जाता था। मम्मीजी का गाना चलते रहता था कि बहूरानी आराम कर रही है जब उठेंगी तब चाय देंगीं, अभी मंदिर गई है घर में सब काम पड़े हैं। मुझे अब आदत हो चली थी इस सबकी मैं अनदेखा और अनसुना करने लगी थी लेकिन मन परेशान हो जाता था। घर में मीनू भी थी कुछ काम उससे क्यों नहीं करवा लेती थी एक दिन चिढ़कर मैंने कह दिया कि, "कुछ काम मीनू से भी करवा लिया करें ससुराल में काम आएगा"। सासूमां गुस्से से भर गई और बोली, "तू चिंता मत कर मैं जिंदा हूं अभी, जो सुख है थोड़े बहुत मायके में उठा लेने दे बाद में तो सर पर जिम्मेदारी ही आनी है तू तेरा काम कर"। मैं काम पर अपना गुस्सा निकाल लेती थी। इसी दिनचर्या के चलते वो समय भी नजदीक आ गया जब शिवम का जन्म हुआ। शिवम के जन्म के समय समय मैं मायके में थी तो आराम ही था। आराम से उठना, खाना समय पर मिल जाना और किसी काम की चिंता नहीं और शिवम पर ध्यान दे लेती थी सुकूंन से दिन गुजर रहे थे। दो महीने बाद जब घर पहुंची तो सास बहुत खुश थी। पोते की बलाएं उतारी और मेरी भी नजर उतारी फिर घर में आने दिया। मैं भी खुश थी मम्मी जी शिवम के पास हर वक्त रहती थी। उसकी छी छी साफ करना, कपड़े बदलना, नहलाना, मालिश सारे काम उन्होंने अपने जिम्मे ले लिए थे। मैं भी निश्चिंत हो गई थी लेकिन अब काम की जिम्मेदारी बढ़ गई थी। मैं सब जगह नहीं पहुंच पाती थी। कभी राजन को नाश्ता देने में देरी हो जाती तो कभी पापा जी की चाय तो कभी शिवम से जुड़े काम में दिक्कत होती थी। मम्मी जी का बोलना जारी रहता। सबके मूड संभालना मुश्किल हो रहा था। घर में खुद को पूरी तरह समर्पित कर देने के बाद भी ताने मिल ही जाते थे और कभी कभी खुद को इस घर में अजनबी की तरह महसूस करने लगती थी। कोई ऐसा नहीं था जहां मैं मन की बात कर सकूं। अपनापन महसूस नहीं कर पाती थी। कभी-कभी मैं ज्यादा परेशान तब हो जाया करती थी जब हर बात का हिसाब देना पड़ता था कहां जा रही हो, किस से मिलने जा रही हो, कब तक आओगी, क्या गिफ्ट लेकर जा रही हो जैसे सवालों से परेशान हो जाती थी। मतलब हर बात में पूछताछ और मेरे अपने निर्णय कुछ मायने नहीं रखते थे। जब कभी बहुत थक जाती तो राजन से कहती कि आज बहुत थक गई हूं थकान सी लग रही है तो राजन बोलते घर में काम ही क्या रहता है बाई तो होती ही है। खाना बनाना, साफ सफाई कोई बड़ा काम थोड़े ही है। मैं दुखी हो जाती। मैं कैसे गिनाती वह काम जो गिनती में नहीं आते हैं। खाना खाते हुए एक दिन महसूस हुआ कि जितनी रोटी खातीं हूँ उतना काम तो मैं कर ही लेती हूं। कभी कभार कोई गलती हो जाती या वार त्यौहार पर मायके से फोन नहीं आ पाता तो मायके वालों का भी उद्धार हो जाता, साथ में मुझे भी नीचा देखना पड़ता था। बस मन ही मन भगवान से प्रार्थना करती कि मायके वालों से संबंध अच्छे बने रहे ताकि मैं शांति से रह सकूं और रिश्तेदारों के सामने इज्जत बनी रहे। कभी-कभी लगता था कि मुझ से अच्छी तो नौकरानी है जो काम करके चली जाती है। मैं घर में सजी धजी नौकरानी थी जिसे उफ करना भी मना था।

इतने साल बीत जाने के बाद भी घर की दीवारें अपनी नहीं लगती थी। मुझे मेरी खुशियां छुपानी पड़ती थी। मुझे याद है कि मेरी सहेली का जन्मदिन था उसने मुझे बुलाया था। मैंने उसे मना कर दिया और आने में असमर्थता जताई। फिर उसने कहा कि सभी सहेलियाँ इकट्ठा हो रहीं हैं, तू भी आजा और मैं सबसे मिलने का लोभ छोड़ ना पाई और मंदिर जाने का बहाना करके घर से निकल गई। बस कुछ इसी तरह बहाने बनाकर कभी मंदिर, कभी मूवी का बहाना करके मैं घर से निकल जाती थी। सोचती हूं कि घर कि लोगों से छिपाकर खुशी मनाना कितना अजीब है। अगर थोड़ी सी आजादी दे दी होती तो कुछ छिपाना ही नहीं पड़ता। ऐसे ही कुछ परेशानियाँ मेरी सहेलियों की भी थी जो अपने घरों में किसी न किसी वजह से परेशान थी। कोई बड़ी ननद से परेशान था कोई सास और ससुर से परेशान था तो कोई रिश्तेदारियों से परेशान तो कोई देवरानी से परेशान था। सब इसी तरह मिलकर थोड़ा समय हंसने और मौज मजे में गुजार लेती थी। जब कभी दोस्तों के बीच राजन ड्रिंक करके आते थे तो मेरी उनसे बहस हो जाती थी और गुस्से में उनका जवाब होता था कि तेरे को ज्यादा तकलीफ है तो तू तेरे मायके चली जा। घर की लोगों के सामने ही डांट देते थे, सबके सामने ही बेइज्जती कर देते थे। मैं अकेली बैठी यही सब बातें याद कर रही थी और सोच रही थी कि एक ओर जहां मैं पैदा होकर बड़ी हुई थी वो घर अपना नहीं और वहाँ मैं "परायाधन" थी और ये घर जहां मुझे पूरा जीवन गुजारना था लेकिन उस घर में मैं कहाँ बसर कर रही थी मुझे ही नहीं मालूम था? एक सवाल मन में उठ रहा था कि मेरा घर कहां है?



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