मोदी सरकार के निर्णय का समर्थन मायावती को पड़ सकता है भारी
| -Dr. Bhupendra Singh Gargvanshi - Aug 8 2019 5:22PM

वर्ष 2019 का अगस्त महीना कई मामलों को लेकर लम्बे समय तक याद किया जाएगा। मामले तो बहुत से हैं परन्तु 5 अगस्त 2019 दिन सोमवार को केन्द्र में मोदी सरकार द्वारा लिया गया वह निर्णय जिसमें जम्मू-कश्मीर से धारा 370 व 35ए समाप्त कर उसे केन्द्र शासित राज्य बना दिया गया ऐतिहासिक व सर्वाधिक चर्चा में है। मोदी सरकार के इस निर्णय का जहाँ अधिसंख्य लोगों ने स्वागत किया वहीं कई राजनैतिक दल व उनके समर्थकों तथा मुस्लिम समाज के लोगों में आक्रोश भी देखा जा रहा है। वोट बैंक सुरक्षित रखने वाले कई दलों को मुस्लिम समाज के कोप का भाजन भी बनना पड़ रहा है। 

इस समय जम्मू-कश्मीर से धारा 370 व 35ए समाप्त किए जाने पर मोदी सरकार की तरफदारी करने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती को फजीहतों का सामना करना पड़ रहा है। उनसे सवाल किए जा रहे हैं कि मोदी सरकार (भाजपा) ने अपने वोटबैंक को खुश करने के लिए ऐसा कदम उठाया है मगर मायावती ने जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर किसको खुश करने के लिए मोदी सरकार का साथ दिया। कहने वालों का कहना है कि मायावती ने स्वयं और अपने भाई को जेल जाने से बचाने के लिए ऐसा किया है। मायावती ने आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में भाई आनन्द सहित जेल जाने से बचने एवं हाल ही में उनके भाई के लगभग 4 सौ करोड़ रूपए के जब्त किए गए बेनामी प्लाट्स को वापस हासिल करने के लिए यह कदम उठाया है। 

दूसरी तरफ राजनीति के अन्य जानकार यह कहते हैं कि बसपा की राष्ट्रीय अध्यक्ष कुमारी मायावती भाजपा की पुरानी समर्थक हैं। उन्होंने गुजरात में भाजपा का साथ दिया। बीते लोकसभा चुनाव 2019 में हुए गठबन्धन में कांग्रेस को शामिल न करने के लिए मायावती ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को मजबूर कर दिया था, जिसका फायदा भाजपा को मिला। जानकारों का कहना है कि भाजपा के दबाव में मायावती ने यह कदम उठाया था और अन्य प्रान्तों में गैर भाजपाई वोटों को बांटने के लिए उन्होंने अपने वोट कटवा कैन्डीडेट्स को चुनाव मैदान में उतारा था। फलतः मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस के प्रत्याशी कम अन्तर से चुनाव हार गये थे। जानकारों की चर्चा में यह भी कहा जा रहा है कि मायावती ने पहले भी भाजपा के सहयोग से उत्तर प्रदेश में सरकार बनाया था और एक बार फिर वह केन्द्र में कोई महत्वपूर्ण पद चाहती है। 

कहने वालों के अनुसार बसपा के मुस्लिम नेता इस समय काफी दबाव में हैं। उन पर बसपा छोड़ने का जबरदस्त दबाव भी पड़ रहा है ऐसा इसलिए कि अधिसंख्य मुसलमानों को यह बात गंवारा नहीं है कि बसपा सुप्रीमों भाजपा की तरफदारी करें। जानकारों के अनुसार उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभा उपचुनाव में बसपा अपने प्रत्याशी उतारने की घोषणा भी कर चुकी है। उसके इस फैसले को भी भाजपा की मदद करने वाला बताया जा रहा है।  सपा के प्रबल समर्थकों द्वारा यह कहा जा रहा है कि यदि सपा के साथ गठबन्धन तोड़ने वाली एवं आजम खाँ पर हमला बोलने वाली मायावती अपने सांसदों से इस्तीफा दिलवाकर चुनाव का सामना करे तो पता चल जाएगा कि मायावती का राजनैतिक वजूद क्या है? 

अब तो यहाँ तक चर्चा है कि बसपा के टिकट पर अगला विधानसभा चुनाव लड़ने का सपना देखने वालों ने भी अपने निर्णय बदलने की सोच लिया है। बाहुबली, धन्ना सेठ व दूसरी तरह के समाजसेवी भी बसपा कैन्डीडेट नहीं बनना चाहते क्योंकि उनका मानना है कि खलनायक बनकर हारने से बेहतर है कि चुनाव से ही दूर रहा जाए। मुस्लिम नौजवान व महिलाओं का बसपा के प्रति नजरिया ही कुछ दूसरा है। कहते हैं कि उन्हें तो बसपा कभी नहीं पसन्द थी, बीते चुनाव में उसे वोट इसलिए दिया गया क्योंकि उसने सपा के साथ गठबन्धन किया था। 

बहरहाल! कुछ भी हो मोदी सरकार द्वारा लिए जा रहे निर्णय से सभी पार्टियों के समर्थक भले ही एक सोच के न हों परन्तु उनके प्रमुखों द्वारा दिए जाने वाले वक्तब्य उन्हें अवश्य ही सोंचने पर विवश कर रहे हैं। मायावती द्वारा मोदी सरकार के समर्थन में दिया गया वक्तब्य उनके लिए आत्मघाती बन सकता है। यह बात दूसरी है कि इससे वह अरबों की अवैध सम्पत्ति प्रकरण में खुद व अपने भाई को जेल जाने से बचा लेंगी किन्तु उनके द्वारा मोदी सरकार का किया गया समर्थन मुस्लिम मतदाताओं में भय और आशंका का कारण बन गया है। लब्बो-लुआब यह कि इसका असर बसपा की राजनैतिक स्थिति पर अवश्य ही पड़ सकता है।  



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