दुर्लभ दस्तावेजों और पुरानी धरोहरों का अद्भुत खज़ाना है 'चम्बल संग्रहालय'
| Rainbow News Network - Aug 14 2019 6:41PM

चंबल की विरासत को अपने आँचल में समेटे अपने ढंग का यह अनूठा चम्बल  संग्रहालय इटावा शहर के चौगुर्जी में स्थित है इटावा रेलवे स्टेशन से मात्र चंद क़दमों पर इस संग्रहालय को भव्य रूप देने का काम  सत्तर वर्षीय कृष्णा पोरवाल जी कर रहे  हैं उनका कहना  है कि संग्रहालय का मकसद चम्बल की उस पहचान को हटाना है जो लोगों के ज़ेहन में नकारात्मक तौर पर बन चुकी है वो मानते हैं कि चम्बल आर्काइव से ना केवल लोगों को चम्बल के क्रांतिकारी इतिहास को जानने समझने का  मौका मिलेगा बल्कि संग्रहालय में सदियों पुराने दस्तावेजों और हज़ारों दुर्लभ किताबों से भी लोग रूबरू हो प्राचीन इतिहास  को अच्छे से जान व समझ सकेंगें!

हाल ही में हम भी इस अजूबे चम्बल संग्रहालय को देखने इटावा पहुंचें ज्यों ही हम स्टेशन पर उतरे चम्बल आर्काइव के जनक  सरल स्वभाव पोरवाल जी ने खैरमकदम करते हुए अपनी गाड़ी पर बैठाया और चौगुर्जी स्थित चम्बल आर्काइव की ओर चल पड़े. कुछ कदम पर ही प्रगतिशील समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल सिंह जी की कोठी थी और उसके अगली सड़क पर ही चम्बल आर्काइव का भवन, बड़ा सा गेट मोटे अक्षरों में चम्बल आर्काइव का लोगो देख मुझे यह आभास हो चला था की हम अपने गंतव्य पर पहुँच चुके हैं. गेट खुलते ही गाड़ी अंदर प्रवेश करती है और फिर हम पोरवाल जी के साथ गाड़ी से उतरते ही चम्बल आर्काइव के वर्कशॉप में प्रवेश कर जाते है जहाँ चारों ओर पुस्तकों का भण्डार होता है.

सत्रहवीं सदी की किताबें और सदियों पुराने दस्तावेज यहाँ बड़े ही सलीके से संगृहित होते हैं ग्यारह साल की आयु से ही पोरवाल जी द्वारा संग्रहीत किये जा रहे करीब पचास हजार डाक टिकट और तमाम पुराने डाक पत्र नमूने और सैकड़ों  हाथ से लिखे पत्रों के साथ ही प्राचीन पेंटिंग-तस्वीरें, प्राचीन मानचित्रों के अलावा राजा भोज के दौर से लेकर अलग-अलग काल के करीब तीन हजार प्राचीन सिक्के, सैकड़ों ग्रामोफोन रिकार्ड और ना जाने क्या क्या यहाँ देखने को मिलते हैं . सदियों पुराने इन दस्तावेजों को देखने के उपरान्त जब हमने पोरवाल जी से चम्बल आर्काइव स्थापित किये जाने  के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बताया की मेरे लिए यह काम आसान नही था  मैने चंबल संग्रहालय के लिए 9 जून 2018 को अन्तर्राष्ट्रीय अभिलेख दिवस के मौके पर जनपद के सभी साहित्यकारों ,प्रबुद्धजनों की बैठक कर उनके सामने यह प्रस्ताव रखा और अपेक्षित सहयोग का आश्वासन पाते ही इसकी स्थापना कर दी।

महान क्रांतिकारी पत्रकार कर्मवीर सुंदरलाल के बारे में पूँछें जाने पर उनसे जुड़े संस्मरण सुनाते हुए पोरवाल जी  ने बताया की वे ना केवल पत्रकार और  सुविख्यात लेखक ही थे बल्कि आजादी के आंदोलन के महान लड़ाका व सांप्रदायिक सद्भाव के प्रबल समर्थक भी थे यही नहीं वे  बहुभाषाविद और दुनियां के तमाम धर्मों के व्याख्याकार भी  थे। विश्व शांति मे गांधी-नेहरू- इंदिरा युग मे पंडित जी अनोखी विभूति थे वे मूलरूप से कायस्थ थे उन्हें पंडित की उपाधि इलाहाबाद विश्व विदयालय द्वारा दी गयी थी। वह हमेशा पद, पैसा और प्रलोभन से दूर रहे। बिट्रिश सरकार की चूले हिला देने वाले सुंदरलाल जी गणेश शंकर विद्द्यार्थी के गुरु ही नहीं बल्कि एक  प्रखर  वक्ता भी थे अपनी इन तमाम विशेषताओं के चलते वे  वर्ल्ड पीस काउंसिल के वाइस प्रेसिडेंट के हैसियत से चीन, वियना, कैरो, मास्को, स्टाकहोम, कोलंबो,बर्लिन, लंदन, टोक्यो, वियतनाम, क्यूबा, सोवियत रुस आदि देशों के राष्ट्र प्रमूखों द्वारा आमंत्रित किये गये यहाँ तक की  हो- चि- मिन्ह, माओ त्से तुंग, फिदेल कास्त्रो, खुश्चोव आदि कर्मवीर सुंदरलाल को अपना बड़ा भाई और आदर्श मानते थे।

बतातें चलें की  इस संग्रहालय में आठ कांड रामायण से लेकर रानी एलिजाबेथ के दरबारी कवि की 1862 में प्रकाशित  किताब भी मौजूद है, यहां दुर्लभ और दुनिया के सबसे पुराने स्टांप, डाक टिकटो के साथ ही  ब्रिटिश काल से लेकर दुनिया भर के कई हजार डाक टिकट व संग्रहालय में करीब तीन हजार प्राचीन सिक्कों का कलेक्शन भी  है। चंबल संग्राहलय को सहयोग और शोध के लिए विदेशों से भी लोग संपर्क कर रहे हैं । यह वाकई सुखद है कि जहां सिर्फ बदहाली और डकैतों के खौफनाक किस्से हैं, उस हिस्से में संग्राहलय बन चुका है। दिन रात संग्रहालय को भव्यता देने में जुटे पोरवाल जी का जूनून देखते बनता है यहाँ संगृहीत हजारो किताबों की बाइंडिंग खुद पोरवाल जी ही किये हुए हैं वो  किताबों की सुंदर बाइंडिंग शादी के कार्डों से करते हैं इसके लिए जनपद के लोग यहाँ पुराने शादी कार्ड दे जाते हैं श्री कृष्णा पोरवाल जी बताते हैं कि संग्रहालय को बेतहर बनाने के लिए हर तरह की  शोध सामग्री तलाश की जा रही है।

कुल मिलाकर इस संग्रहालय के लिए पोरवाल जी तन, मन, धन से समाज में बिखरे अमूल्य ज्ञान स्रोत सामग्री सहेजने के मिशन में पूरी तरह से जुटे है उन्हें जहां से भी बौद्धिक संपदा मिलने की रोशनी दिखती है वो उससे सम्पर्क करने में जुट जाते हैं रेलवे स्टेशन के निकट बैठे मोची से पुराने जूते के फरमों की वे बेझिझक पड़ताल करते हुए जानकारी लेने व संगृहीत करने में कोई संकोच नहीं करते। अब आलम यह है की दुर्लभ दस्तावेज, लेटर, गजेटियर डाक टिकट, सिक्के, स्मृति चिन्ह, समाचार पत्र, पत्रिका, पुस्तकें, तस्वीरें, पुरस्कार, सामग्री-निशानी, अभिनंदन ग्रंथ, पांडुलिपि आदि के गिफ्ट करने के लिए लोग उन्हें  फोन करने लगे  है ऐसे में अब पोरवाल जी पूरी तरह से आश्वस्त हैं और उन्हें विश्वास हो चला है की ज्ञानकोष से चंबल संग्रहालय समृद्ध हो रहा है यहाँ शोधार्थियों का आना जाना शुरू हो गया है शीघ्र ही इसका डिजिटाइजेशन भी होने जा रहा है श्री पोरवाल जी के मुताबिक चंबल संग्रहालय में आठ कांड की रामायण, जिसमें लव कुश कांड भी है।

प्राचीन गीता, संस्कृत और उर्दू में साथ-साथ लिखी दुर्लभ मनुस्मृति तो है ही वर्ष 1913 में छपी ए.ओ. ह्यूम की डायरी, प्रभा पत्रिका के सभी अंक, चांद का जब्तशुदा फांसी अंक और झंडा अंक, गणेश शंकर विद्यार्थी जी द्बारा अनुदित बलिदान और आयरलैण्ड का इतिहास पुस्तक जिसे  पढ़कर नौजवान क्रांतिकारी बनने का ककहरा सीखते थे की मूल प्रति सहित  तमाम गजेटियर, क्रांतिकारियों के मुकदमें से जुड़ी फाइलों के अलावा देश और विदेश की 18वी और 19वी शताब्दी के हर मुद्दों की दुर्लभ किताबों का जखीरा यहाँ मौजूद है, सरस्वती, माधुरी, विश्वमित्र, कादम्बिनी ,चांद, प्रभा, सुधा, विश्व मित्र, सुकवि, उनके साथ इस संग्रहालय में मैंने खुद देखा की नवजीवन, विशाल भारत, हंस, सारिका, धर्मयुग, दिनमान, साप्ताहिक हिन्दुस्तान आदि सहित देश-विदेश की सात हजार दुर्लभ पत्रिकाओं  के अलावा यहाँ प्रमूख साहित्यकारों की दुर्लभ कृतियां मौजूद  हैं।

आजादी आंदोलन के दौरान के तमाम साहित्य का जखीरे के साथ यहाँ विभिन्न पत्रिकाओं के प्रवेशांक भी मौजूद है। संग्रहालय में करीब तीन हजार प्राचीन सिक्कों का कलेक्शन भी मौजूद है।कहना ना होगा अपने आप में अद्भुत तरीके के इस संग्रहालय को भव्य रूप देने में कृष्णा पोरवाल जी का श्रम और जूनून काबिले तारीफ है उसी का नतीजा है की आज इस संग्रहालय की चर्चा देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक जा पहुंची है मात्र एक साल में इस संग्रहालय को क्षितिज तक ले जाने में पोरवाल जी की तपस्या भी सच में अद्भुत ही  है!



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