अम्बेडकरनगर : खाद्य सामग्रियों में मिलावट का महाजाल
| Rainbow News Network - Aug 15 2019 2:28PM

साल 2019 का अगस्त महीना कई मामलों को लेकर हमेशा याद किया जाएगा। राष्ट्रीय स्तर पर केन्द्र सरकार द्वारा महत्वपूर्ण कार्य किए गए। मसलन धारा- 370 का समापन और कश्मीर से कन्याकुमारी तक अखण्ड भारत की पूर्व में की गई परिकल्पना साकार हुई। इस महीने में कई नामचीन हस्तियाँ हमारे बीच से ईहलोक गामी हो गईं। इन सबके अलावा देश की स्वाधीनता के 73वें दिन/दिवस अवसर पर भाई-बहन के अटूट प्यार के लिए सेलीब्रेट किया जाने वाला महत्वपूर्ण त्योहार रक्षाबन्धन भी 15 अगस्त को ही पड़ा। इन दोनों महत्वपूर्ण पर्व/त्योहार पर हर्षोल्लास का माहौल रहा।

इस अवसर पर गुड़ में चींटों की तरह लिपटे रहने वाले धनलोलुप व्यवसाइयों की पौबारह रही। तात्पर्य यह कि रक्षा-सूत्र, अक्षत, रोली, तिरंगा झण्डा, बिल्ला, बैज, तिरंगा टोपी और विभिन्न प्रकार की मिठाइयों के दाम जहाँ आसमान पर रहे वहीं इनमें भारी मिलावट होने की वजह से जनस्वास्थ्य के लिए इन्हें हानिकारक भी बताया गया। बड़ा आश्चर्य होता है कि आए दिन खाद्य सुरक्षा महकमा द्वारा प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से अभियान और जन-जागरूकता के बावत खबर प्रकाशित करवाकर उच्चाधिकारियों व शासन को प्रेषित कर स्वयं की पीठ थपथपवा ली जाती है। 

गाँव-गिराँव, कस्बा, शहर की बाजार, हाटों में मिलावटी खाद्य सामग्रियों का निर्माण व बिक्री साल के बारहों महीने की जाती है। पहले इस तरह का कार्य तीज-त्यौहारों एवं अन्य महत्वपूर्ण अवसरों पर ही किया जाता रहा है। दूध से लेकर मिठाइयों में इस्तेमाल किए जाने वाले सभी सामग्री में भयंकर मिलावट होेने से उपभोक्ताओं में जानलेवा व संक्रामक बीमारियाँ फैल रही हैं। समझ में नहीं आता कि सूबे के हर जिले में खाद्य सुरक्षा महकमा और वहाँ तैनात कनिष्ठ से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा किया क्या जा रहा है.........? दिखावे के तौर पर प्रायोजित तरीके से छापामारी अभियान चलाकर चेकिंग करना और नमूना संकलित करके जाँच के लिए भेजना यही एक ऐसा कार्य है जिसे खाद्य सुरक्षा महकमे के ओहदेदार कभी कभार कर लिया करते हैं। दूध से निर्मित पनीर, घी, खोवा आदि के अलावा छांछ, दही, नकली मावा की बिक्री यहाँ आम बात है। रिफाइण्ड तेल, मक्खन के नाम पर महंगे अखाद्य तेल, व मिलावटी मक्खन बेंचे जा रहे हैं। 

उत्तर प्रदेश सूबे के अम्बेडकरनगर जनपद में होली हो, दिवाली हो या अन्य धार्मिक व राष्ट्रीय पर्व/त्योहार हों अब यह कोई मायने नहीं रखते अपितु साल के हर दिन व्यवसायिक प्रतिष्ठानों/केन्द्रों पर निर्मित और बिक्री की जाने वाली खाद्य सामग्रियाँ मिलावटी होती हैं जिनकी बिक्री ऊँचे दामों पर की जाती है। एक तरह से ऐसा करने वाले व्यवसाई ग्राहक उपभोक्ताओं का दोहरा शोषण कर रहे हैं। कीमत अधिक वसूलना ऊपर से मिलावट व मानक विहीन, हानिकारक रसायनों से युक्त रंग बिरंगी खाद्य सामग्रियाँ बेंचना यहाँ के व्यवसाइयों का परम धर्म सा बन गया है। 

त्योहारों पर मिठाई की मांग ज़्यादा होती है और इसके मुक़ाबले आपूर्ति कम होती है। मिलावटख़ोर मांग और आपूर्ति के इस फ़र्क़ का फ़ायदा उठाते हुए बाज़ार में मिलावटी सामग्री से बनी मिठाइयां बेचने लगते हैं। इससे उन्हें तो ख़ासी आमदनी होती है, लेकिन ख़ामियाज़ा उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ता है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग द्वारा छापेमारी कर और नमूने लेकर ख़ानापूर्ति कर ली जाती है। फिर कुछ दिन बाद मामला रफ़ा-दफ़ा हो जाता है। दरअसल मिलावटख़ोरी पर रोक लगाने के लिए इतनी सख़्ती नहीं बरती जाती जितनी बरती जानी चाहिए। इसलिए यही बेहतर है कि मिठाई, चॊकलेट और सूखे मेवे ख़रीदते वक़्त एहतियात बरतनी चाहिए। साथ ही इनके ख़राब होने पर इसकी शिकायत ज़रूर करनी चाहिए, ताकि मिलावटख़ोरों पर दबाव बने। जागरूक बने, सुखी रहें।

त्यौहार के दिनों मे बाज़ार में नक़ली मावे और पनीर से बनी मिठाइयों का कारोबार ज़ोर पकड़ लेता है। आए-दिन छापामारी की ख़बरें सुनने को मिलती हैं कि फ़लां जगह इतना नक़ली या मिलावटी मावा पकड़ा गया, फ़लां जगह इतना। इन मामलों में केस भी दर्ज होते हैं, गिरफ़्तारियां भी होती हैं और दोषियों को सज़ा भी होती है। इस सबके बावजूद मिलावटख़ोर कोई सबक़ हासिल नहीं करते और मिलावटख़ोरी का धंधा बदस्तूर जारी रहता है। त्योहारी सीज़न में कई मिठाई विक्रेता, होटल और रेस्टोरेंट संचालक मिलावटी और नक़ली मावे से बनी मिठाइयां बेचकर मोटा मुनाफ़ा कमाएंगे.

ज़्यादातर मिठाइयां मावे और पनीर से बनाई जाती हैं. दूध दिनोदिन महंगा होता जा रहा है. ऐसे में असली दूध से बना मावा और पनीर बहुत महंगा बैठता है. फिर इनसे मिठाइयां बनाने पर ख़र्च और ज़्यादा बढ़ जाता है, यानी मिठाई की क़ीमत बहुत ज़्यादा हो जाती है. इतनी महंगाई में लोग ज़्यादा महंगी मिठाइयां ख़रीदना नहीं चाहते. ऐसे में दुकानदारों की बिक्री पर असर पड़ता है. इसलिए बहुत से हलवाई मिठाइयां बनाने के लिए नक़ली या मिलावटी मावे और पनीर का इस्तेमाल करते हैं. नक़ली और मिलावटी में फ़र्क़ ये है कि नक़ली मावा शकरकंद, सिंघाड़े, मैदे, आटे, वनस्पति घी, आलू, अरारोट को मिलाकर बनाया जाता है.

इसी तरह पनीर बनाने के लिए सिंथेटिक दूध का इस्तेमाल किया जाता है. मिलावटी मावे उसे कहा जाता है, जिसमें असली मावे में नक़ली मावे की मिलावट की जाती है.मिलावट इस तरह की जाती है कि असली और नक़ली का फ़र्क़ नज़र नहीं आता.  इसी तरह सिंथेटिक दूध यूरिया, कास्टिक सोडा, डिटर्जेन्ट आदि का इस्तेमाल किया जाता है. सामान्य दूध जैसी वसा उत्पन्न करने के लिए सिंथेटिक दूध में तेल मिलाया जाता है, जो घटिया क़िस्म का होता है. झाग के लिए यूरिया और कास्टिक सोडा और गाढ़ेपन के लिए डिटर्जेंट मिलाया जाता है.

फूड विशेषज्ञों के मुताबिक़ थोड़ी-सी मिठाई या मावे पर टिंचर आयोडीन की पांच-छह बूंदें डालें. ऊपर से इतने ही दाने चीनी के डाल दें. फिर इसे गर्म करें. अगर मिठाई या मावे का रंग नीला हो जाए, तो समझें उसमें मिलावट है. इसके अलावा, मिठाई या मावे पर हाइड्रोक्लोरिक एसिड यानी नमक के तेज़ाब की पां-छह बूंदें डालें. अगर इसमें मिलावट होगी, तो मिठाई या मावे का रंग लाल या हल्का गुलाबी हो जाएगा. मावा चखने पर थोड़ा कड़वा और रवेदार महसूस हो, तो समझ लें कि इसमें वनस्पति घी की मिलावट है. मावे को उंगलियों पर मसल कर भी देख सकते हैं अगर वह दानेदार है, तो यह मिलावटी मावा हो सकता है.

इतना ही नहीं, रंग-बिरंगी मिठाइयों में इस्तेमाल होने वाले सस्ते घटिया रंगों से भी सेहत पर बुरा असर पड़ता है. अमूमन मिठाइयों में कृत्रिम रंग मिलाए जाते हैं. जलेबी में कृत्रिम पीला रंग मिलाया जाता है, जो नुक़सानदेह है. मिठाइयों को आकर्षक दिखाने वाले चांदी के वरक़ की जगह एल्यूमीनियम फॉइल से बने वर्क़ इस्तेमाल लिए जाते हैं. इसी तरह केसर की जगह भुट्टे के रंगे रेशों से मिठाइयों को सजाया जाता है.

चॊकलेट की लगातार बढ़ती मांग की वजह से बाज़ार में घटिया क़िस्म के चॊकलेट की भी भरमार है. मिलावटी और बड़े ब्रांड के नाम पर नक़ली चॉकलेट भी बाज़ार में ख़ूब बिक रही हैं. इसी तरह जमाख़ोर रखे हुए सूखे मेवों को एसिड में डुबोकर बेच रहे हैं. इसे भी घर पर जांचा जा सकता है. सूखे मेवे काजू या बादाम पर पानी की तीन-चार बूंदें डालें, फिर इसके ऊपर ब्लू लिटमस पेपर रख दें. अगर लिटमस पेपर का रंग लाल हो जाता है, तो इस पर एसिड है. 

चिकित्सकों का कहना है कि मिलावटी मिठाइयां सेहत के लिए बेहद नुक़सानदेह हैं. इनसे पेट संबंधी बीमारियां हो सकती हैं. फ़ूड प्वाइज़निंग का ख़तरा भी बना रहता है. लंबे अरसे तक खाये जाने पर किडनी और लीवर पर बुरा असर पड़ सकता है. आंखों की रौशनी पर भी बुरा असर पड़ सकता है. बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास अवरुद्ध हो सकता है. घटिया सिल्वर फॉएल में एल्यूमीनियम की मात्रा ज़्यादा होती है, जिससे शरीर के महत्वपूर्ण अंगों के ऊतकों और कोशिकाओं को नुक़सान हो सकता है. दिमाग़ पर भी असर पड़ता है.

ये हड्डियों तक की कोशिकाओं को डैमेज कर सकता है. मिठाइयों को पकाने के लिए घटिया क़िस्म के तेल का इस्तेमाल किया जाता है, जो सेहत के लिए ठीक नहीं है. सिंथेटिक दूध में शामिल यूरिया, कास्टिक सोडा और डिटर्जेंट आहार नलिका में अल्सर पैदा करते हैं और किडनी को नुक़सान पहुंचाते हैं. मिलावटी मिठाइयों में फॉर्मेलिन, कृत्रिम रंगों और घटिया सिल्वर फॉएल से लीवर, किडनी, कैंसर, अस्थमैटिक अटैक, हृदय रोग जैसी कई बीमारियां हो सकती हैं. इनका सबसे ज़्यादा असर बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर पड़ता है.

सूखे मेवों पर लगा एसिड भी सेहत के लिए बहुत ही ख़तरनाक है. इससे कैंसर जैसी बीमारी हो सकती है और लीवर, किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है. हालांकि देश में खाद्य पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए कई क़ानून बनाए गए, लेकिन मिलावटख़ोरी में कमी नहीं आई. खाद्य पदार्थो में मिलावटखोरी को रोकने और उनकी गुणवत्ता को स्तरीय बनाए रखने के लिए खाद्य संरक्षा और मानक क़ानून-2006 लागू किया गया है. इसका मक़सद खाद्य पदार्थों से जुड़े नियमों को एक जगह लाना और इनका उल्लंघन करने वालों को सख़्त सज़ा देकर मिलावटख़ोरी को ख़त्म करना है.



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