मैं अधूरा ही सही...
| -Priyanka Maheshwari - Aug 21 2019 3:47PM

आज मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैं गांव में ही रहता तो ज्यादा अच्छा होता ताकि जो मैं हूं वही रहता। यहां शहरों में नकलीपन ओढ़े  जिंदगी जी रहा हूं। वहाँ गांव में बनावटीपन से दूर रहता। लोगों से जुड़ा रहता, रिश्ते सच्चे और मजबूत होते। आज मुझे रिश्ते को संभालने के लिए बड़ी जद्दोजहद करनी पड़ती है। वैसे मैं शुरू से ही बहुत संकोची स्वभाव का रहा हूं, जल्दी किसी से घुल मिल नहीं पाता, हालांकि अब तो बहुत तब्दीली है मुझमें और बहुत सोशल भी हो गया हूं लेकिन आज भी मेरे मन का कोना खाली है। मैं ढूंढता रहता हूं वो पल या वो हिस्से जो मेरी खाली पड़े कोने को भर सके। हां तो मैं कह रहा था कि मैं शुरू से ही संकोची स्वभाव का था। मैं स्कूल में भी एक जगह बैठ कर सबको खेलते हुए देखता रहता था और मेरे दोस्तों की संख्या बहुत ज्यादा नहीं थी, ज्यादा से ज्यादा दो या तीन। गांव के स्कूल शहरों के स्कूल से बहुत अलग थे आजकल वैसे स्कूल कहानियों में ही मिलते हैं लेकिन मैंने हकीकत में ऐसे स्कूल में पढ़ाई की थी।

थैला लेकर स्कूल चले जाना जहाँ सीटों की भी व्यवस्था नहीं होती थी। सबसे बड़ी बात कि स्कूल से छुट्टी होने के बाद हमें किसी बात का डर नहीं रहता था। हम खेलते रहते थे आम के पेड़ के नीचे, नदी के पास गिल्ली डंडा या ऐसे ही मस्ती करते रहते थे। अक्सर मुझे मेरे दोस्त मेरे स्वभाव के कारण मुझे मीत कुमारी कहकर चिढ़ाया करते थे। ये खुशी ज्यादा दिन तक नहीं टिकी। कुछ समय बाद पिताजी का शहर में आना हो गया और बाद में उन्होंने हम सबको भी अपने पास बुला लिया। गांव की मिट्टी, सोंधी खुशबू, गांव का मंदिर, गांव के लोग और उनका अपनत्व वह मिठास धीरे धीरे धुंधली होते जा रही थी। अब मैं शहर में पल रहा था और मैं इसी शहर की चकाचौंध, चिल्लपौं का हिस्सा बनता जा रहा था। मैं अब स्कूल, स्कूल ड्रेस में जाने लगा था। पढ़ाई और समय दोनों अपनी गति से चल रहे थे और दोनों से ताल मिलाते हुए मैं भी आगे बढ़ रहा था।
जवानी की दहलीज दस्तक देने लगी थी और मैं कुछ जुनूनी और महत्वाकांक्षी बनते जा रहा था। मैं आगे बढ़कर समाज में रुतबा हासिल करना चाहता था लेकिन बड़ा परिवार और पिताजी के कंधों पर जिम्मेदारी का बोझ कुछ ज्यादा था। मैं पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी भी करने लगा। नौकरियां तब भी आसानी से नहीं मिला करती थी। मुझे भी खासी दिक्कत पेश आ रही थी। फिर भी एक महोदय में मेरी लेखन शैली से प्रभावित होकर मुझे मौका दिया। मुझे लिखने का शौक था अक्सर रात में मैं अपनी डायरी में कुछ न कुछ लिता रहता था। मैं प्रेस में काम करने लगा। मैं लोगों के इंटरव्यू, न्यूज़ कवरेज और आर्टिकल तैयार करने लगा था। धीरे-धीरे अखबार से जुड़े कामों को मैं सीखता, समझता गया और उसी में जुड़ता गया।
कहानी में अगर कोई हीरोइन ना हो तो कहानी का मजा नहीं आता है। मेरी जिंदगी में भी एक हीरोइन आ गई थी और वो मेरे साथ ही काम करती थी। स्वभाव से बहुत चंचल थी, मजाक मस्ती उसके स्वभाव में था। गंभीरता उसमें मैंने कभी नहीं देखी। मेरा उसका साथ धीरे-धीरे बढ़ता गया। मैं उसे प्यार करने लगा था। मैं मौका तलाश रहा था कि मैं उससे अपने दिल की बात कह सकूं और एक दिन मौका मिल ही गया। मैं उसे इंटरव्यू लेने के बहाने से साथ लेकर उसे एक पार्क में ले आया और वहां मैंने उससे अपनी दिल की बात कही। मैं जरा अनाड़ी आदमी था रोमांटिक बातें कैसे की जाती हैं इसका इल्म नहीं था। मैंने अनाड़ीपन से ही अपनी बात शुरू की, "देखो मैं तुमसे प्यार करने लगा हूं और अब तुम्हें ही सोचता रहता हूं क्या तुम भी मुझे चाहती हो"। बदले में वह सिर्फ मुस्कुरा दी और उठ कर जाने लगी। मैं भी उसके पीछे हो लिया। उसकी मुस्कुराहट को मैंने उसकी रजामंदी समझा।  अक्सर हममें नोकझोंक, मीठी लड़ाई होते रहती थी। मैं उसके टिफिन में से खाना खा जाया करता था और वह मेरा ध्यान रखकर खाना भी ज्यादा लाती थी। हमारा मिलना, आना जाना, काम करना सब साथ साथ होने लगा था। मगर मेरा नसीब साथ नहीं दे रहा था पता नहीं कैसे रूचि किसी दूसर लड़के की तरफ आकर्षित हो गई।मैंने उससे बात की, "कि तुम मुझसे दूर क्यों जा रही हो"।  उसने स्पष्ट उत्तर दिया,  "देखो मुझे तुम्हारा प्रेस में काम करना पसंद नहीं है इससे जिंदगी नहीं निकलती। इस काम में ज्यादा पैसा नहीं है परिवार नहीं पलता इसमें"। मैं निरंतर हो गया था क्योंकि मेरे पास कोई जवाब नहीं था और ना ही मेरे पास कोई अच्छी नौकरी थी और ना ही मेरे पास कोई अच्छा आर्थिक बैकग्राउंड था। फिर भी मैंने उसे मनाने की बहुत कोशिश की। हालांकि जिस दूसरे लड़के की तरफ वो आकर्षित हुई थी उससे भी जल्दी ही उसका रिश्ता टूट गया लेकिन उसके बाद भी वो मुझसे नहीं जुड़ी। कुछ समय बाद उसकी शादी हो गई।
उसकी शादी से मैं उलझन और डिप्रेशन में चला गया। मैं चाह कर भी रूचि को भुला नहीं पा रहा था। मुझे उसका साथ, उसका एहसास नहीं भूलता था। मैंने शादी के सपने तक देख डाले थे। वो शादी करके दूसरे शहर चली गई पता नहीं क्यों वो इतना बदल गई थी। मैं अभी भी उसका इंतजार कर रहा था। मुझे लगता था कि एक न एक दिन वह मेरे पास वापस आएगी। मैं कई साल तक उसका इंतजार करता रहा। उसके आने की आस में अपने को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा था। डिप्रेशन का असर मुझ पर पड़ने लगा था। मेरा सोना, खाना, काम करना और पढ़ना दूभर हो गया था। मुझे नींद के लिए नींद की गोली लेनी पड़ती थी। यहां तक कि जिस पद की तैयारी मैं कर रहा था उस परीक्षा में भी ऐन टाइम पर मेरी तबीयत बिगड़ गई।  जिसके कारण मैं उसमें पास नहीं हो पाया। अब मेरे सामने चुनौती थी कि या तो मैं डिप्रेशन में मर जाता या फिर सब कुछ छोड़ कर आगे बढ़ जाता। मैंने खड़ा होने की फिर से हिम्मत जुटाई। मैं अपनी पसंदीदा लाइन पर आगे पढ़ने लगा था। मैं लेखन क्षेत्र में आगे और बहुत आगे बढ़ता चला गया। लोगों के बीच मुझे एक सम्मानीय दर्जा मिलने लगा था। मैं अब ज्यादा सोशल होते जा रहा था। थक कर चूर हो जाने के बाद नींद कब अपनी बांहें डाल देती थी मुझे पता ही नहीं चलता था। 
इधर घर में मां शादी के लिए दबाव डाल रही थी लेकिन मेरा मन शादी करने के लिए राजी नहीं था। क्योंकि रूचि अब भी मेरे मन में कहीं न कहीं बसी हुई थी। रूचि जब भी मायके आती थी तो मुझसे जरूर मिलती थी। इस बार वो काफी समय के बाद आई। उसके साथ में नन्हा मेहमान भी था और वह कुछ मोटी भी हो गई थी। बाद में उसने मुझसे कहा कि, "सब बीत गया है, कुछ वापस नहीं आने वाला, आखिर कब तक अकेले रहोगे? अब तुम्हें शादी कर लेनी चाहिए यह तुम्हारे लिए जरूरी है"। मैं कुछ जवाब नहीं दे पाया। फिर कुछ ऐसा इत्तेफाक हुआ कि मैंने शादी के लिए हां कर दी और कुछ समय बाद मेरी शादी भी हो गई लेकिन जैसी पत्नी मैं चाहता था वैसी पत्नी नहीं मिली मुझे। शायद मेरे दिमाग में अभी भी रुचि थी और मैं उसी से अपनी पत्नी की तुलना कर रहा था। मेरी पत्नी एक साधारण घरेलू स्त्री की तरह थी। पहनावे में साधारण, बातचीत में गंवारपन, रहन-सहन में भी कोई विशेष नहीं पर मैंने समझौता कर लिया। अब जो नसीब में था स्वीकार कर लिया लेकिन फिर भी मेरे विचार उसके विचार से मेल नहीं खाते थे। मेरी पत्नी की एक समस्या और भी थी कि वो मेरे लिए पजेसिव बहुत थी। किसी स्त्री से मेरा बात करना उसे बिल्कुल पसंद नहीं था, और ऑफिस में तमाम स्त्रियों से मेरा पाला पड़ता था और इन सब की वजह से मेरी श्रीमतीजी मुझे शक की नजरों से देखा करती थीं।  मैं उन्हें समझा नहीं पाता था कि मेरे और साथियों के बीच मेरा रिश्ता काम तक ही सीमित है। बहरहाल जिन्दगी अपने हिसाब से जियाये जा रही थी और मैं दो बच्चों का बाप बन गया था।  जिम्मेदारी निभाते हुए मैं मशीन बनते जा रहा था। मैं सोच रहा था शायद मैं शहरी बन गया हूं और शहरी पन्नों में खो गया हूं।  
अब भी अक्सर आवारा यादें मुझसे कहती हैं कि मैं अभी अधूरा हूं और मेरा हाल कुछ इस तरह है...

ना खुदा ही मिला न विसाले सनम
इधर के रहे ना उधर के हुए...



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